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लेखक सुरेंद्र हालसी
स्वतंत्र पत्रकार
नई दिल्ली। उत्तराखंड राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। इस दौरान राज्य ने कई मुख्यमंत्री देखे, सत्ता भाजपा और कांग्रेस के बीच बदलती रही, अनेक राजनीतिक प्रयोग हुए, लेकिन एक प्रश्न आज भी राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में बना हुआ है क्या उत्तराखंड को कभी पहला दलित मुख्यमंत्री मिलेगा?
2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की लगभग 19 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जाति वर्ग से संबंधित है। यह उत्तराखंड का एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली सामाजिक वर्ग है। राज्य की सामाजिक संरचना में परंपरागत रूप से राजपूत, ब्राह्मण और दलित समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वहीं हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में मुस्लिम समुदाय भी चुनावी दृष्टि से उल्लेखनीय प्रभाव रखता है।
राज्य निर्माण के बाद समय-समय पर दलित नेतृत्व को शीर्ष पद पर अवसर दिए जाने की चर्चा अवश्य हुई, लेकिन यह चर्चा कभी राजनीतिक निर्णय का रूप नहीं ले सकी। राजनीतिक गलियारों में अक्सर यह प्रश्न उठता रहा है कि जब दलित समाज राज्य की आबादी का लगभग पांचवां हिस्सा है, तो उसे अब तक मुख्यमंत्री पद पर प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिला।
भाजपा और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दलों ने अब तक किसी दलित नेता को मुख्यमंत्री पद तक नहीं पहुंचाया है। भाजपा में वर्तमान समय में ऐसा कोई सर्वस्वीकार्य दलित चेहरा दिखाई नहीं देता, जिसे मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार माना जा सके। दूसरी ओर कांग्रेस में एक ऐसा नाम अवश्य है जिसकी चर्चा राजनीतिक विश्लेषकों और पर्यवेक्षकों के बीच समय-समय पर होती रही है यशपाल आर्य।
यशपाल आर्य उत्तराखंड की राजनीति का एक अनुभवी और स्थापित चेहरा हैं। वे उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य भी रह चुके हैं तथा उत्तराखंड में मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर अपनी भूमिका निभा चुके हैं। कांग्रेस संगठन में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है और विभिन्न सामाजिक वर्गों में उनकी स्वीकार्यता भी व्यापक है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस मजबूत स्थिति में आती है और सत्ता के करीब पहुंचती है, तो मुख्यमंत्री पद की संभावित दौड़ में यशपाल आर्य का नाम प्रमुखता से सामने आ सकता है। उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत यह मानी जाती है कि वे अपेक्षाकृत कम विवादित नेता हैं और संगठन के भीतर भी उन्हें व्यापक सम्मान प्राप्त है।
यशपाल आर्य के समर्थक उन्हें उत्तराखंड के विकासोन्मुख नेताओं में गिनते हैं। उनके प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहने के दौरान पार्टी ने राज्य की सभी पांच लोकसभा सीटों पर विजय प्राप्त की थी। संगठन और प्रशासन दोनों क्षेत्रों में उनके लंबे अनुभव को उनकी प्रमुख राजनीतिक पूंजी माना जाता है।
हालांकि उत्तराखंड की राजनीति केवल जातीय समीकरणों से संचालित नहीं होती। क्षेत्रीय संतुलन, संगठनात्मक शक्ति, केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकताएं, चुनावी परिणाम और राजनीतिक परिस्थितियां भी मुख्यमंत्री चयन में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। इसलिए केवल सामाजिक प्रतिनिधित्व के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
फिर भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि राज्य गठन के 25 वर्षों बाद क्या उत्तराखंड की राजनीति सामाजिक प्रतिनिधित्व के एक नए अध्याय की ओर बढ़ेगी? क्या दलित समाज को पहली बार मुख्यमंत्री पद का अवसर मिलेगा? और यदि ऐसा होता है, तो क्या यह केवल प्रतीकात्मक राजनीति होगी या सामाजिक समावेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा?
इन प्रश्नों के उत्तर भविष्य की राजनीति तय करेगी। लेकिन इतना स्पष्ट है कि उत्तराखंड में दलित नेतृत्व का मुद्दा अब केवल सामाजिक विमर्श तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि धीरे-धीरे मुख्यधारा की राजनीतिक चर्चा का भी महत्वपूर्ण विषय बनता जा रहा है।
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