दिल्लीहमारी संस्कृति

डिजिटल युग में खोता बचपन

मोबाइल की कैद में बचपन! स्क्रीन की चमक में खो रही नई पीढ़ी

लेखक -संजीत कुमार 

निदेशक गांधी स्मृति और दर्शन समिति 

आज का युग विज्ञान और तकनीक का युग है। स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने हमारे जीवन को अत्यंत सरल और सुविधाजनक बना दिया है। किंतु इन सुविधाओं के साथ कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी सामने आई हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण है बच्चों का मोबाइल फोन और डिजिटल उपकरणों पर बढ़ता निर्भरता। यह स्थिति धीरे-धीरे बचपन की सहजता, रचनात्मकता और सामाजिकता को प्रभावित कर रही है।

एक समय था जब बच्चे अपने मित्रों के साथ मैदानों में खेलते थे, पेड़ों पर चढ़ते थे, पतंग उड़ाते थे, कबड्डी, खो-खो, गिल्ली-डंडा और क्रिकेट जैसे खेलों में घंटों व्यस्त रहते थे। इन खेलों से न केवल उनका शारीरिक विकास होता था, बल्कि टीम भावना, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक व्यवहार का भी विकास होता था। आज वही स्थान मोबाइल गेम्स, सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म ने ले लिया है।

मोबाइल फोन का अत्यधिक उपयोग बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आँखों की समस्या, सिरदर्द, नींद की कमी और मोटापे जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। इसके साथ ही बच्चों में चिड़चिड़ापन, एकाग्रता की कमी और सामाजिक अलगाव भी देखने को मिल रहा है। कई बच्चे वास्तविक दुनिया की अपेक्षा आभासी दुनिया में अधिक समय बिताने लगे हैं, जिससे उनके व्यक्तित्व विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल तकनीक ने अनेक सकारात्मक परिवर्तन किए हैं, लेकिन इसका संतुलित उपयोग आवश्यक है। यदि मोबाइल केवल अध्ययन और ज्ञानवर्धन के लिए उपयोग किया जाए तो यह एक प्रभावी साधन बन सकता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब मनोरंजन और सोशल मीडिया का अत्यधिक आकर्षण बच्चों को अपने नियंत्रण में ले लेता है।

अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए, उन्हें खेल-कूद, पुस्तक पठन और रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रेरित करना चाहिए। बच्चों के स्क्रीन समय पर उचित नियंत्रण और डिजिटल अनुशासन भी आवश्यक है। परिवार में संवाद और सामूहिक गतिविधियों को बढ़ावा देकर बच्चों को वास्तविक जीवन के अनुभवों से जोड़ा जा सकता है।

महात्मा गांधी ने कहा था, “शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण करना है।” आज आवश्यकता इस बात की है कि तकनीक का उपयोग बच्चों के विकास के साधन के रूप में हो, न कि उनके बचपन को सीमित करने वाले माध्यम के रूप में।

डिजिटल क्रांति के इस दौर में हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आधुनिक तकनीक और पारंपरिक मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन बना रहे। तभी हम आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित कर सकेंगे। बचपन केवल जीवन का एक चरण नहीं, बल्कि भविष्य की नींव है; इसे सुरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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