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सिद्धांतों के प्रति अटूट निष्ठा: देश की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को सहेजती इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के संरक्षण प्रयोगशाला की देशव्यापी एक अनूठी पहल

-डॉ. के सी पांडेय

 

नई दिल्ली। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (IGNCA) के संरक्षण प्रभाग का गठन वर्ष 2003 में बुनियादी सुविधाओं के साथ किया गया था। अपने सफर में इस प्रभाग ने कला और संस्कृति के संरक्षण में कई नए आयाम स्थापित किए हैं। वर्तमान में इस प्रभाग को परिरक्षात्मक संरक्षण, संरक्षण प्रशिक्षण, पुस्तकों, प्राचीन पाण्डुलिपियों, उत्कृष्ट चित्रकला और विभिन्न ऐतिहासिक वस्तुओं के संरक्षण में विशेष महारत हासिल है। चाहे वह धातु हो, काष्ठ (लकड़ी) की वस्तुएं हों या मानव जाति विज्ञान से संबंधित दुर्लभ सामग्रियां यह प्रभाग सभी के वैज्ञानिक और कलात्मक बचाव में अग्रणी है।

अनुसंधान और आधुनिकीकरण पर विशेष बल

यह प्रभाग न केवल भौतिक संरक्षण करता है, बल्कि ढलवां लोहे की वस्तुओं और जंग परिवर्तकों (Rust Converters) के क्षेत्र में विशेष शोध एवं प्रलेखन परियोजनाएं भी चला रहा है। पिछले 10 वर्षों से केन्द्र अपनी इस संरक्षण प्रयोगशाला के आधुनिकीकरण के लिए लगातार प्रयासरत है। इसके तहत अत्याधुनिक अवसंरचना, उन्नत उपकरणों और मानव संसाधन के प्रशिक्षण पर विशेष निवेश किया गया है। वर्तमान में इस प्रयोगशाला के पास देश के सबसे योग्य और कुशल संरक्षक हैं, जो राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान, राष्ट्रीय सांस्कृतिक संपदा संरक्षण अनुसंधानशाला, दिल्ली इंस्टीट्यूट ऑफ हेरिटेज रिसर्च एंड मैनेजमेंट तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े रहे हैं।

सिद्धांतों के प्रति अटूट निष्ठा

यह प्रयोगशाला वैश्विक और सुस्थापित संरक्षण सिद्धांतों के पालन के प्रति बेहद सतर्क है। यहां की जाने वाली सभी प्रक्रियाएं न्यूनतम हस्तक्षेप (Minimum Intervention) एवं प्रतिवर्त्यता (Reversibility) के सिद्धांत पर आधारित हैं, ताकि कलाकृतियों के मूल स्वरूप को कोई नुकसान न पहुंचे। अनेक भारतीय और विदेशी संस्थाओं के साथ सक्रिय सहयोग के चलते आज इसे देश की सबसे उत्कृष्ट संरक्षण प्रयोगशाला (Center of Excellence) माना जाता है।

दिल्ली से देश के कोने-कोने तक फैला नेटवर्क

दिल्ली स्थित मुख्य मुख्यालय से शुरू होकर अब इस प्रभाग ने देश के विभिन्न ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों पर अपनी अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं (कंजर्वेशन लैब्स) स्थापित कर दी हैं। इस श्रृंखला में मध्य प्रदेश के लालबाग (इंदौर), ओरछा के लक्ष्मी मंदिर, जहांगीर महल और राजा का महल जैसे महत्वपूर्ण धरोहर स्थल शामिल हैं, जहां संरक्षण कार्य तेजी से जारी है। इसके अतिरिक्त, ग्वालियर के ऐतिहासिक मोती महल में भी एक विशेष कंजर्वेशन लैब बनाई गई है।

ऐतिहासिक संग्रहालयों और अभिलेखागारों का कायाकल्प

बिहार की राजधानी पटना में पटना संग्रहालय की लगभग 17,000 दुर्लभ कला वस्तुओं के संरक्षण का विशाल कार्य चल रहा है, जिसके लिए केन्द्र ने वहां एक स्थायी लैब का निर्माण किया है। वहीं, सुदूर लद्दाख के आर्काइव्स में मौजूद अत्यंत विशेष आर्काइव पेपर्स और पाण्डुलिपियों को सुरक्षित करने के लिए भी एक समर्पित लैब कार्यरत है। गुजरात के बड़ौदा में बड़ौदा म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के साथ मिलकर काम चल रहा है और भविष्य में महाराजा फतेह सिंह म्यूजियम की कला वस्तुओं के लिए भी लैब बनाने की योजना है। अहमदाबाद के संस्कार म्यूजियम में भी निर्माण कार्य अंतिम चरण में है, जिससे वहां की कलाकृतियों को नया जीवन मिलेगा। देश की राजधानी दिल्ली में स्थित राष्ट्रीय रेल संग्रहालय (रेलवे म्यूजियम) के ऐतिहासिक अभिलेखागारों को सहेजने का काम भी इसी प्रभाग के जिम्मे है।

धार्मिक और ऐतिहासिक केंद्रों में विशेष पहल

सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण नगरी अयोध्या के अंतरराष्ट्रीय राम कथा संग्रहालय में भी इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र द्वारा एक आधुनिक लैब स्थापित की गई है। इस लैब का शुभारंभ श्री चंपत राय जी और श्री नृपेंद्र मिश्रा जी के कर-कमलों द्वारा किया गया था, जहां अब संग्रहालय की बहुमूल्य कलाकृतियों का संरक्षण किया जा रहा है। इसके अलावा, राजस्थान के भरतपुर आर्काइव्स में भी लैब बनाकर काम किया जा रहा है। जयपुर के आमेर किले में स्थित बेशकीमती और ऐतिहासिक चित्रों के संरक्षण की एक अनूठी पहल वर्ष 2002 में शुरू की गई थी, जिसने 2009 में एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रयोगशाला का स्वरूप ले लिया।

आज ये सभी प्रयोगशालाएं अपने सबसे उन्नत और आधुनिक रूप में देश की विरासत को सुरक्षित करने के महायज्ञ में जुटी हुई हैं।

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