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Amar sandesh नई दिल्ली। देश में छात्रों के मुद्दे को लेकर चल रहा आंदोलन अब केवल सड़कों तक सीमित नहीं रह गया है। इसकी गूंज संसद के भीतर भी साफ सुनाई दे रही है। एक ओर संसद परिसर में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के सांसदों ने छात्रों के समर्थन में प्रदर्शन करते हुए सरकार से देश के छात्रों से माफी मांगने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेने की मांग की, वहीं दूसरी ओर जंतर-मंतर पर हजारों छात्र अपनी मांगों को लेकर लगातार डटे हुए हैं।
संसद परिसर में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव सहित कई विपक्षी नेताओं ने सरकार पर छात्रों की आवाज अनसुनी करने का आरोप लगाया। विपक्ष ने मांग की कि सरकार छात्रों की चिंताओं को गंभीरता से ले, उनसे सार्वजनिक रूप से माफी मांगे और पूरे मामले की नैतिक जिम्मेदारी तय करे।
उधर, जंतर-मंतर का दृश्य आंदोलन का दूसरा चेहरा दिखा रहा है। यहां छात्र केवल धरना नहीं दे रहे, बल्कि एक-दूसरे का सहारा भी बन रहे हैं। जो लोग आंदोलन स्थल तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, वे ऑनलाइन माध्यम से भोजन, पानी और अन्य जरूरी सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं। उमस भरे मौसम में छात्र और स्वयंसेवक एक-दूसरे को हाथ के पंखों से हवा कर रहे हैं, कोई पानी पिला रहा है, कोई भोजन बांट रहा है तो कोई दवाइयों की व्यवस्था कर रहा है। यह आंदोलन सामाजिक सहयोग और मानवीय संवेदनाओं की भी एक तस्वीर पेश कर रहा है।
प्रदर्शनकारी छात्रों का आरोप है कि उनकी मांगों पर सीधे संवाद करने के बजाय प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था के माध्यम से स्थिति संभालने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि यदि सरकार समाधान चाहती है तो उसे अपने जिम्मेदार मंत्री या वरिष्ठ अधिकारियों को वार्ता के लिए भेजना चाहिए था। प्रदर्शनकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ स्थानों पर छात्रों के साथ पुलिस का व्यवहार कठोर रहा और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो विपक्ष इस मुद्दे को संसद के भीतर पूरी मजबूती से उठा रहा है, जबकि जमीनी स्तर पर छात्रों का आंदोलन लगातार जनसमर्थन प्राप्त करता दिखाई दे रहा है। कई युवा बिना किसी राजनीतिक संगठन से जुड़े स्वतः आंदोलन में पहुंच रहे हैं और सहयोग कर रहे हैं। इससे यह संदेश भी निकलकर सामने आ रहा है कि यह मुद्दा केवल एक संगठन या दल तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक युवा वर्ग की चिंता का विषय बनता जा रहा है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या सरकार आंदोलनकारी छात्रों से सीधे संवाद का रास्ता अपनाएगी या टकराव की स्थिति आगे भी बनी रहेगी। लोकतंत्र में किसी भी विवाद का सबसे प्रभावी समाधान बातचीत और विश्वास निर्माण से ही निकलता है। आने वाले दिनों में सरकार का रुख और छात्रों के आंदोलन की दिशा तय करेगी कि यह आंदोलन समाधान की ओर बढ़ता है या और व्यापक रूप लेता है।
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