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-डॉ झिलिक सोम
कूच बिहार (Cooch Behar), जिसका अर्थ है वह भूमि जहाँ से ‘कोच’ राजा भ्रमण किया करते थे या विचरण करते थे (‘बिहार’)” भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित एक प्रमुख जिला और ऐतिहासिक शहर है। उत्तर बंगाल की हरियाली, शांत वातावरण और ऐतिहासिक विरासत के बीच बसा कूचबिहार केवल एक जिला नहीं, बल्कि भारतीय राजशाही, स्थापत्य कला और धार्मिक परंपराओं का जीवंत संग्रहालय है। कभी कोच राजवंश की राजधानी रहा यह नगर आज भी अपने भव्य महलों, मंदिरों और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से अतीत की गौरवगाथा सुनाता है। कूचबिहार की पहचान दो प्रमुख धरोहरों से जुड़ी है कूचबिहार राजबाड़ी (Cooch Behar Palace) और मदनमोहन मंदिर (Madan Mohan Bari)। एक ओर राजबाड़ी शाही वैभव और यूरोपीय स्थापत्य का अद्भुत उदाहरण है, तो दूसरी ओर मदनमोहन मंदिर इस क्षेत्र की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक जीवन का केंद्र है।
कूचबिहार: इतिहास की सुनहरी पृष्ठभूमि
कूचबिहार का इतिहास लगभग पाँच सौ वर्षों पुराना है। यह क्षेत्र कोच राजवंश के शासन का केंद्र रहा, जिसकी स्थापना महाराजा विश्वसिंह ने की थी। बाद में महाराजा नर नारायण और उनके उत्तराधिकारियों ने इस राज्य को राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से समृद्ध बनाया। उन्नीसवीं शताब्दी में महाराजा नृपेन्द्र नारायण के शासनकाल में कूचबिहार आधुनिक शिक्षा, प्रशासन और स्थापत्य कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय रूप से विकसित हुआ। इसी काल में राजबाड़ी और मदनमोहन मंदिर जैसी भव्य संरचनाओं का निर्माण हुआ।
कूचबिहार राजबाड़ी: यूरोपीय भव्यता और भारतीय शाही संस्कृति का संगम
कूचबिहार राजबाड़ी, जिसे विक्टर जुबिली पैलेस भी कहा जाता है, उत्तर बंगाल की सबसे भव्य ऐतिहासिक इमारतों में से एक है। इसका निर्माण महाराजा नृपेन्द्र नारायण ने वर्ष 1887 के आसपास कराया था। लाल ईंटों से निर्मित यह महल ब्रिटिश पुनर्जागरण (Italian Renaissance) शैली से प्रेरित है और इसकी भव्यता पहली ही दृष्टि में पर्यटकों को आकर्षित करती है। राजबाड़ी का भवन 4,700 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला है। महल की लंबाई उत्तर से दक्षिण तक 120 मीटर और चौड़ाई पूर्व से पश्चिम तक 90 मीटर है। लगभग 51 मीटर ऊँचा केंद्रीय गुंबद इस महल का सबसे आकर्षक भाग है। जिसके केंद्र में एक उभरा हुआ बरामदा (पोर्च) है, जो दरबार हॉल के प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता है। इस हॉल के ऊपर सुंदर आकार का धातु से निर्मित गुंबद है, जिसके शीर्ष पर बेलनाकार लूवर (झरोखा-प्रकार) का वेंटिलेटर बना हुआ है। यह गुंबद भूमि से 124 फीट (38 मीटर) की ऊँचाई पर स्थित है और पुनर्जागरण (रेनेसां) स्थापत्य शैली में निर्मित है।
गुंबद के भीतरी भाग पर सीढ़ीनुमा नक्काशी की गई है तथा कोरिंथियन शैली के स्तंभ गुंबद के आधार (कपोला) को सहारा देते हैं। इससे पूरे आंतरिक भाग में विविध रंगों और आकर्षक डिज़ाइनों की सुंदरता दिखाई देती है। विशाल बरामदे, संगमरमर की सीढ़ियाँ, लंबे गलियारे और संतुलित स्थापत्य इसे किसी यूरोपीय राजमहल जैसा स्वरूप प्रदान करते हैं। कहा जाता है कि इसकी वास्तुकला पर ब्रिटेन के प्रसिद्ध बकिंघम पैलेस का प्रभाव देखा जा सकता है।
महल में अनेक हॉल और कक्ष हैं, जिनमें ड्रेसिंग रूम, शयनकक्ष (बेडरूम), ड्रॉइंग रूम, भोजन कक्ष (डाइनिंग हॉल), बिलियर्ड हॉल, पुस्तकालय (लाइब्रेरी), तोशाखाना (treasure house), महिला दीर्घा (लेडीज़ गैलरी) तथा वेस्टिब्यूल (प्रवेश कक्ष) शामिल हैं। इन कमरों और हॉलों में कभी रखी जाने वाली बहुमूल्य वस्तुएँ और कीमती सामग्री अब लुप्त हो चुकी हैं।
संग्रहालय का आकर्षण
आज राजबाड़ी का एक बड़ा भाग भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा प्रबंधित एक संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया है। यहाँ राजपरिवार के चित्र, दुर्लभ फोटोग्राफ, शाही पोशाकें, प्राचीन फर्नीचर, सिक्के, दस्तावेज तथा विभिन्न कलाकृतियाँ प्रदर्शित हैं। संग्रहालय इतिहास के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए विशेष महत्व रखता है।
मदनमोहन मंदिर: श्रद्धा और संस्कृति का केंद्र
राजबाड़ी से कुछ ही दूरी पर स्थित मदनमोहन मंदिर कूचबिहार की धार्मिक पहचान है। सफेद रंग से निर्मित यह भव्य मंदिर अपनी सादगी, सुंदरता और आध्यात्मिक वातावरण के कारण दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
इस मंदिर का निर्माण महाराजा नृपेन्द्र नारायण ने 1885 से 1889 के बीच कराया। इसका औपचारिक उद्घाटन वर्ष 1890 में हुआ। मंदिर कोच राजवंश के कुलदेवता भगवान मदनमोहन (भगवान कृष्ण का स्वरूप) को समर्पित है। परिसर में माँ काली, माँ तारा और माँ भवानी की प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं।
मंदिर की विशेषताएँ
मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सफेद वास्तुकला और शांत वातावरण है। मुख्य गर्भगृह में भगवान मदनमोहन की अष्टधातु से निर्मित प्रतिमा स्थापित है। परंपरा के अनुसार यहाँ भगवान की पूजा विशेष राजसी विधि से की जाती रही है। इस मंदिर का संबंध कोच राजवंश की धार्मिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।
मदनमोहन मंदिर के प्रधान देवता हैं और उनकी मूर्ति मंदिर के मध्य कक्ष में स्थापित है, जिसकी छत को सफेद कमल के आकार में अत्यंत सुंदर ढंग से तराशा गया है। मदनमोहन की दो मूर्तियाँ चार स्तंभों वाले चौडोला (पालकीनुमा आसन) पर विराजमान हैं। बड़ी मूर्ति को “बड़ा मदनमोहन” तथा छोटी मूर्ति को “छोटा मदनमोहन” कहा जाता है।
श्रद्धालु प्रतिदिन बड़ा मदनमोहन के दर्शन कर सकते हैं, जबकि छोटा मदनमोहन वर्ष में केवल तीन दिनों के लिए ही भक्तों को दर्शन देते हैं। मदनमोहन की प्रतिमा अष्टधातु से निर्मित है और उस पर स्वर्ण का लेप किया गया है।
इस प्रतिमा का मूल निर्माण भगवान शिव के भक्त महाराजा नर नारायण द्वारा कराया गया था। वे असम के प्रसिद्ध वैष्णव संत एवं प्रचारक श्रीमंत शंकरदेव से अत्यंत प्रभावित थे। शंकरदेव ने महाराजा को मदनमोहन की उपासना का उपदेश दिया, किंतु उनकी शिक्षाओं में राधा का उल्लेख या पूजा शामिल नहीं थी। यही कारण है कि मंदिर के मुख्य गर्भगृह में राधा की कोई प्रतिमा या विग्रह स्थापित नहीं है। यहाँ केवल मदनमोहन की अकेली प्रतिमा विराजमान है, जो अधिकांश राधा-कृष्ण मंदिरों की परंपरा से भिन्न और इस मंदिर की एक विशिष्ट विशेषता है।
रास मेला: आस्था और लोकसंस्कृति का महोत्सव
मदनमोहन मंदिर का सबसे प्रसिद्ध आयोजन रास मेला है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित यह मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उत्तर बंगाल की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
सैकड़ों वर्षों से आयोजितइस मेले मेंलाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं।
लोक संगीत एवं लोकनृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं।
पारंपरिक हस्तशिल्प और स्थानीय व्यंजनों की दुकानें सजती हैं।
धार्मिक शोभायात्राएँ और सांस्कृतिक कार्यक्रम वातावरण को उत्सवमय बना देते हैं।
इसी प्रकार रथयात्रा भी यहाँ अत्यंत श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाई जाती है।
राजबाड़ी और मंदिर: विरासत और आस्था का अद्भुत संतुलन
यदि राजबाड़ी कूचबिहार की शाही शक्ति और स्थापत्य कौशल का प्रतीक है, तो मदनमोहन मंदिर इस क्षेत्र की आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है। एक पर्यटक जब राजबाड़ी की भव्यता से प्रभावित होता है, तो मंदिर पहुँचकर उसी भूमि की धार्मिक आत्मा का अनुभव करता है।
दोनों धरोहरें मिलकर यह संदेश देती हैं कि किसी भी सभ्यता की वास्तविक पहचान केवल उसके महलों से नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, परंपराओं और आस्था से भी होती है।
पर्यटन की दृष्टि से महत्व
आज कूचबिहार पश्चिम बंगाल के प्रमुख विरासत पर्यटन स्थलों में गिना जाता है। इतिहास प्रेमी, स्थापत्य विशेषज्ञ, फोटोग्राफर और धार्मिक पर्यटक बड़ी संख्या में यहाँ आते हैं। सुव्यवस्थित सड़कें, स्वच्छ वातावरण, संग्रहालय, मंदिर और आसपास के प्राकृतिक दृश्य इस नगर को एक आदर्श पर्यटन गंतव्य बनाते हैं।
कूचबिहार राजबाड़ी और मदनमोहन मंदिर केवल ऐतिहासिक स्मारक नहीं हैं; वे उस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के जीवंत प्रतीक हैं जिसने सदियों से उत्तर बंगाल की पहचान को आकार दिया है। राजबाड़ी की भव्य दीवारें जहाँ शाही इतिहास की कहानियाँ सुनाती हैं, वहीं मदनमोहन मंदिर की आरती और घंटियों की ध्वनि श्रद्धा, शांति और आध्यात्मिकता का अनुभव कराती है।
यदि भारत की विविध सांस्कृतिक धरोहरों को समझना हो, तो कूचबिहार की यात्रा अवश्य करनी चाहिए। यहाँ इतिहास, स्थापत्य, धर्म और लोकसंस्कृति एक साथ मिलकर ऐसा अनुभव प्रदान करते हैं जो लंबे समय तक स्मृतियों में बना रहता है।
लेखिका– रिसर्चर एवंं
समााजसेवीे हैंं तथा इन्होंंनेे
पर्ययटन मेंं पीएचडी
हाासिल करी हैै।
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