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512 वर्षों की अटूट आस्था और सामाजिक क्रांति का गवाह बना ऐतिहासिक रामकेली मेला

लेखिका -डा.झिलिक सोम

भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित मालदा जिले का ऐतिहासिक गाँव गौर (रामकेली) पिछले सप्ताह एक बार फिर इतिहास और भक्ति के अनूठे रंग में सराबोर नजर आया। आज से ठीक 512 वर्ष पूर्व, प्रेमावतार श्री चैतन्य महाप्रभु ने वैष्णव धर्म और प्रेम का संदेश फैलाने के लिए इस पवित्र भूमि पर अपने कदम रखे थे। महाप्रभु की इसी दिव्य स्मृति को जीवंत रखते हुए यहाँ हर वर्ष ऐतिहासिक ‘रामकेली मेले’ का आयोजन किया जाता है। यह पारंपरिक मेला और धार्मिक उत्सव पिछले सप्ताह पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ, जिसके दौरान पूरे गौर क्षेत्र में जनसैलाब उमड़ पड़ा था। मालदा जिले के स्थानीय निवासियों के अलावा, देश-विदेश से आए लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं, साधु-संतों और तीर्थयात्रियों ने इस पावन भूमि पर आकर महाप्रभु को नमन किया और आध्यात्मिक पुण्य लाभ कमाया। नाजुक और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में, नादिया जिले में श्री चैतन्य महाप्रभु का प्राकट्य हुआ, जिन्होंने रूढ़िवादिता की बेड़ियों को तोड़ते हुए ‘जीवे दया, नामे रुचि’ यानी सभी जीवों पर दया और हरिनाम से प्रेम का क्रांतिकारी उपदेश दिया। उनके इस सरल और समावेशी मार्ग ने समाज के वंचित वर्ग को गरिमा और सर्वोच्च सम्मान दिलाया, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोग पुनः सनातन धर्म की ओर आकर्षित हुए ।

इसी दौरान वृंदावन की पावन यात्रा पर निकलते हुए महाप्रभु उपदेश देते और हरिनाम संकीर्तन करते हुए मालदा के गौर क्षेत्र में पहुँचे थे, जहाँ उन्होंने धर्म, जाति और वर्ग की सीमाओं को मिटाकर सभी को एक सूत्र में पिरोया और ब्राह्मणवाद की कट्टरता व जबरन धर्मांतरण के खिलाफ एक वैचारिक व आध्यात्मिक अलख जगाई।

इसी रामकेली प्रवास के दौरान इतिहास की एक अभूतपूर्व घटना घटी, जब सुल्तान हुसैन शाह के दरबार के दो अत्यंत शक्तिशाली, विद्वान और उच्च पदस्थ मंत्री—दबीर खास और साकर मलिक—महाप्रभु के दिव्य प्रेम और भक्ति से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तात्कालिक वैभव, सत्ता और राजसी सुखों को तिनके के समान त्याग दिया। उन्होंने महाप्रभु से दीक्षा ग्रहण की और आगे चलकर वैष्णव समाज के महान मार्गदर्शक ‘रूप गोस्वामी’ और ‘सनातन गोस्वामी’ के रूप में अमर हुए। रामकेली केवल भजनों और संकीर्तन की भूमि नहीं रही, बल्कि यह तात्कालिक सामाजिक क्रांति की भी गवाह बनी, जहाँ समाज से जातिवाद और छुआछूत को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए महाप्रभु की प्रेरणा से मेला परिसर में ही इतिहास का पहला ‘हिंदू सामूहिक विवाह’ आयोजित किया गया था। जाति-पाति और ऊंच-नीच के भेदभाव को भुलाकर समाज के विभिन्न वर्गों के बीच वैवाहिक संबंध स्थापित करना, उस युग की रूढ़िवादिता और कट्टरता के खिलाफ महाप्रभु का एक मौन लेकिन बेहद कड़ा प्रहार था।

हर वर्ष ज्येष्ठ संक्रांति के पावन अवसर पर शुरू होने वाला यह ऐतिहासिक रामकेली मेला इस वर्ष सफलतापूर्वक अपने 512वें वर्ष के पड़ाव को पार कर चुका है। यह मेला केवल एक मनोरंजन या व्यापार का साधन नहीं है, बल्कि यह भारत की उस गौरवशाली विरासत का प्रतीक है जिसने कठिन समय में भी अपनी संस्कृति, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों को बचाए रखा। इस वर्ष भी रामकेली की पवित्र मिट्टी में महाप्रभु के पैरों की धूल और हरिनाम की वो दिव्य गूंज साफ महसूस की गई, जो सदियों बाद आज भी लाखों दिलों को आपस में जोड़ रही है।

लेखिका– रिसर्चर एवं समाजसेवी हैं तथा इन्होंने पर्यटन में पीएचडी हासिल करी है।

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