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बिष्णुपुर का टेराकोटा मंदिर: भारतीय कला और स्थापत्य का अद्भुत उदाहरण                  

-डॉ. झिलिक सोम

बिष्णुपुर (पश्चिम बंगाल), 2 अगस्त: पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले में स्थित मंदिरों का नगर बिष्णुपुर अपनी समृद्ध विरासत, गौरवशाली संस्कृति, अद्भुत वास्तुकला, प्रसिद्ध टेराकोटा मंदिर और ऐतिहासिक महत्व के कारण देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करता है। विष्णुपुर के इन मंदिरों का निर्माण 17वीं और 18वीं शताब्दी में मल्ल राजाओं द्वारा कराया गया था जो अपनी समृद्धि, वैभव और आध्यात्मिक-सांस्कृतिक पहचान के लिए प्रसिद्ध थे। कोलकाता से लगभग 152 किमी दूर यह ऐतिहासिक नगर कला, वास्तुकला और वैष्णव संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र है। प्राचीन काल में समुद्र गुप्त सहित विभिन्न हिंदू शासकों ने इस क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। बाद के समय में मुगल शासन के प्रभाव और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के कारण विष्णुपुर का महत्व धीरे-धीरे कम होने लगा। ब्रिटिश शासन के दौरान भी इसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को पर्याप्त हद तक संरक्षित रहने का अवसर मिला, जिसके कारण इसकी विशिष्ट पहचान आज भी कायम है।

इतिहास और वास्तुकला

आदि मल्ल ने मल्ल वंश की स्थापना की थी। मल्ल वंश के दसवें शासक जगत मल्ल ने अपनी राजधानी को बिष्णुपुर स्थानांतरित किया। बंगाल में पत्थरों की कमी होने के कारण पकी हुई मिट्टी की ईंटों का उपयोग पत्थरों के विकल्प के रूप में किया जाने लगा। बंगाल के शिल्पकारों और वास्तुकारों ने इसी से प्रेरित होकर एक अनुपम कला शैली विकसित की, जिसे ‘टेराकोटा कला’ के नाम से जाना जाता है।

17वीं शताब्दी के दौरान टेराकोटा कला अपने उत्कर्ष पर पहुँची। राजा जगत मल्ल और उनके उत्तराधिकारियों ने टेराकोटा तथा पत्थर की उत्कृष्ट शिल्पकला से सुसज्जित अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण कराया। लाल पकी हुई मिट्टी (टेराकोटा) से बने इन मंदिरों की दीवारों पर रामायण, महाभारत और भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, तथा तत्कालीन समाज के दैनिक जीवन, संगीत, नृत्य, शिकार और लोक संस्कृति के दृश्य अत्यंत सुंदर नक्काशी किया गया है। यह कला न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाती है, बल्कि उस समय के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी महत्वपूर्ण दस्तावेज प्रस्तुत करती है। इनकी कलात्मक नक्काशी उस समय की संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक जीवन की झलक भी प्रस्तुत करती है।

बिष्णुपुर के प्रमुख मंदिरों में रासमंच, श्याम राय मंदिर, जोर बंगला मंदिर, मदन मोहन मंदिर, राधा माधव मंदिर और लालजी मंदिर विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।रासमंच का निर्माण लगभग 1600 ईस्वी में राजा बीर हम्बीर ने कराया था और इसकी अनोखी पिरामिड जैसी संरचना इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती है। वहीं श्याम राय और जोर बंगला मंदिर अपनी उत्कृष्ट टेराकोटा सजावट के कारण भारतीय स्थापत्य कला की उत्कृष्ट कृतियों में गिने जाते हैं।

रसमंच: इसका निर्माण 1600 ईस्वी में राजा बीर हम्बीर ने कराया था। यह पिरामिड के आकार का एक अनूठा मंच है।

श्याम राय मंदिर: यह पंचरत्न शैली का सुंदर मंदिर है, जिसकी दीवारों पर बेहद बारीक नक्काशी की गई है।

जोर बंगला मंदिर: यह मंदिर दो झोपड़ीनुमा संरचनाओं को जोड़कर बनाया गया है, जो टेराकोटा कला का बेहतरीन नमूना है।

मदन मोहन मंदिर: राजा दुर्जन सिंह देव ने वर्ष 1694 में भगवान मदन मोहन के नाम पर इस मंदिर की स्थापना की थी। यह मंदिर आज भी एक सक्रिय एवं पूजनीय मंदिर है, जहाँ नियमित रूप मल्लसे पूजा-अर्चना की जाती है।इसे ईंटों और सुंदर नक्काशीदार पैनलों से बनाया गया है।

मृन्मयी मंदिर: मृन्मयी मंदिर, वर्ष 997 ईस्वी में राजा जगत मल्ल द्वारा स्थापित किया गया था। स्थानीय इतिहास के अनुसार, माँ मृन्मयी ने राजा को स्वप्न में दर्शन देकर इस मंदिर के निर्माण का आदेश दिया था। यहाँ देवी दुर्गा की पूजा माँ मृन्मयी के रूप में की जाती है। यद्यपि समय के साथ इस मंदिर का पुनर्निर्माण करना पड़ा, फिर भी गंगा की पवित्र मिट्टी से निर्मित देवी की मूल प्रतिमा आज भी वही है।

पर्यटन का महत्व और विशेषताएं

हाल के वर्षों में यहाँ आने वाले पर्यटकों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। ASI आंकड़ों और पर्यटन वृत्तियों के अनुसार, बांकुरा जिले और विष्णुपुर के विभिन्न संरक्षित मंदिरों (जैसे रासमंच, श्याम राय, और जोरबांग्ला मंदिर) में औसतन 1 लाख से अधिक (विभिन्न वर्षों में लगभग 1 से 2 लाख के बीच) घरेलू और विदेशी पर्यटक आते हैं। स्थानीय प्रशासन और पुरातत्व विभाग इन ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और रखरखाव के लिए विभिन्न योजनाएँ चला रहे हैं। साथ ही, स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए जाने वाले टेराकोटा शिल्प और प्रसिद्ध बालूचरी साड़ियों की भी पर्यटकों के बीच अच्छी माँग है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल रहा है।

बिष्णुपुर केवल मंदिरों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी बालूचरी साड़ियों, टेराकोटा हस्तशिल्प, और डोकरा शिल्प कला और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी प्रसिद्ध है। यह नगर आज भी कला प्रेमियों, इतिहासकारों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। बिष्णुपुर के मंदिरों को भारत के राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों में शामिल किया गया है तथा इन्हें यूनेस्को की विश्व धरोहर की संभावित सूची (Tentative List) में भी स्थान मिला है। इनके संरक्षण और प्रचार-प्रसार से आने वाली पीढ़ियाँ भी इस अनमोल विरासत का आनंद ले सकेंगी।

लेखिका– रिसर्चर एवंं

समााजसेवीे हैंं तथा इन्होंंनेे

पर्ययटन मेंं पीएचडी करी है।

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