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“भारतीय भाषाओं की समरसता एवं बहुलता का स्वरूप” विषय पर आयोजित बारह दिवसीय पुनश्चर्या कार्यक्रम संप

वरिष्ठ पत्रकार सी एम पपनै

श्रीनगर (उत्तराखंड)। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय, श्रीनगर उत्तराखण्ड के यूजीसी-एम.एम.टी.टी.सी.केद्र के अंतर्गत 20 जुलाई 2026 से 1 अगस्त 2026 तक आयोजित “भारतीय भाषाओं की समरसता एवं बहुलता का स्वरूप” विषय पर बारह दिवसीय पुनश्चर्या कार्यक्रम विधिवत संपन्न हुआ।

समापन दिवस के प्रथम सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर दर्शन पांडे द्वारा “भारतीय साहित्य में राष्ट्रीय सांस्कृतिक भावाभिव्यक्ति” विषय पर व्याख्यान दिया गया। उन्होंने भारतीय साहित्य की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय एकता तथा भारतीय जीवन-मूल्यों पर प्रकाश डालते हुए व्यक्त किया, भारतीय साहित्य विविधताओं में एकता का सशक्त माध्यम है तथा राष्ट्रीय अस्मिता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आयोजित द्वितीय सत्र में कुमाऊँ विश्वविद्यालय डी.एस.बी. परिसर हिन्दी विभाग प्रोफेसर चंद्रकला रावत द्वारा “उत्तराखण्ड की भाषा बहुलता : चुनौतियाँ एवं संभावनाएं” विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया गया। उत्तराखण्ड की भाषाई एवं सांस्कृतिक समृद्धि का उल्लेख करते हुए उन्होंने स्थानीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के संदर्भ में उनकी उपयोगिता पर विस्तार से चर्चा की। साथ ही बदलते सामाजिक परिवेश में स्थानीय भाषाओं के समक्ष उपस्थित चुनौतियों तथा उनके समाधान पर भी विचार व्यक्त किए।

आयोजित तृतीय सत्र में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान के भारतीय भाषा केन्द्र अध्यक्ष प्रोफेसर सुधीर प्रताप सिंह द्वारा “भारतीय भाषाओं की समरसता और बहुलता” विषय पर व्याख्यान दिया गया। कहा गया, भारतीय भाषाओं की विविधता भारत की सांस्कृतिक शक्ति है। विभिन्न भाषाएं एवं बोलियां अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखते हुए राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक समन्वय तथा भावात्मक एक सूत्रता को सुदृढ़ करती हैं। उन्होंने अपने व्याख्यान में भारतीय भाषाओं के पारस्परिक सम्मान, संवाद तथा संरक्षण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया।

समापन समारोह में कार्यक्रम समन्वयक प्रोफेसर गुड्डी बिष्ट पंवार द्वारा विश्वविद्यालय कुलपति प्रोफेसर श्रीप्रकाश सिंह के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा, माननीय कुलपति महोदय के कुशल मार्गदर्शन एवं संरक्षण में यह पुनश्चर्या कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कहा गया, कुलपति महोदय का भारतीय भाषाओं एवं साहित्य के प्रति विशेष अनुराग इस कार्यक्रम की सफलता का प्रमुख आधार रहा। प्रो. गुड्डी बिष्ट पंवार द्वारा सभी आमंत्रित वक्ताओं, प्रतिभागियों, आयोजन समिति तथा सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा गया , इस पुनश्चर्या कार्यक्रम ने प्रतिभागियों को भारतीय भाषाओं, साहित्य, संस्कृति तथा समकालीन विमर्शों के अनेक महत्वपूर्ण आयामों से परिचित कराया और उनके शिक्षण एवं शोध कार्यों को नई दिशा प्रदान की।

समापन समारोह मुख्य अतिथि प्रोफेसर सुधीर प्रताप सिंह द्वारा अपने संबोधन में कहा गया, राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के परिप्रेक्ष्य में इस प्रकार के पुनश्चर्या कार्यक्रम शिक्षकों के ज्ञान-विस्तार, शैक्षणिक उन्नयन तथा अनुसंधान क्षमता के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। मुख्य अतिथि द्वारा कार्यक्रम की विषय-वस्तु को समसामयिक, सारगर्भित एवं उपयोगी बताते हुए सभी प्रतिभागियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना की गई।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कला, संचार एवं भाषा संकाय संकायाध्यक्ष प्रोफेसर डी. एस. कैंतुरा द्वारा पुनश्चर्या कार्यक्रम की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा, इस प्रकार के शैक्षणिक आयोजन शिक्षकों में नवीन ऊर्जा एवं अकादमिक दृष्टि का संचार करते हैं। उन्होंने यूजीसी-एम.एम.टी.टी.सी. केंद्र तथा कार्यक्रम समन्वयक प्रोफेसर गुड्डी बिष्ट पंवार के कुशल नेतृत्व एवं अथक परिश्रम की सराहना करते हुए इसे विश्वविद्यालय की एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक उपलब्धि बताया।

एम.एम.टी.टी.सी. निदेशक प्रोफेसर डी. एस. नेगी द्वारा कार्यक्रम के सफल आयोजन हेतु कार्यक्रम समन्वयक, सभी संसाधन से जुड़े जनों तथा प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया। आयोजन के इस अवसर पर विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों द्वारा अपने अनुभव साझा करते हुए कार्यक्रम को अत्यंत ज्ञानवर्धक, प्रेरणादायी एवं उपयोगी बताया गया। उत्तराखण्ड से डॉ. अनूप सेमवाल एवं डॉ. अजीत सिंह तौमर, पांडिचेरी विश्वविद्यालय से डॉ. राघवेंद्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉ. चाइना मीणा, डॉ. पूजा रानी एवं डॉ. भावना सिंह द्वारा अपनी प्रतिपुष्टि प्रस्तुत की गई।

कार्यक्रम समन्वयक प्रोफेसर गुड्डी बिष्ट पंवार द्वारा बारह दिवसीय पुनश्चर्या कार्यक्रम की विस्तृत प्रस्तुति देते हुए अवगत कराया गया, आयोजित पाठ्यक्रम में भारत के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों द्वारा सहभागिता की गई। बारह दिनों में कुल 48 अकादमिक सत्र सफलतापूर्वक आयोजित किए गए, जिनमें देशभर से आमंत्रित 34 संसाधन व्यक्तियों द्वारा भारतीय भाषाओं की समरसता एवं बहुलता से संबंधित विविध विषयों पर व्याख्यान दिए तथा प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं का समाधान किया। प्रतिभागियों ने इस पुनश्चर्या कार्यक्रम को अनुशासित, सौहार्दपूर्ण, प्रेरणादायी एवं अत्यंत ज्ञानवर्धक बताते हुए इसे अपने शैक्षणिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अनुभव माना।

आयोजित पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का उद्देश्य भारतीय भाषाओं की अंतर्निहित एकात्मता, सांस्कृतिक बहुलता तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा को उच्च शिक्षा के विमर्श के केंद्र में स्थापित करना तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के अनुरूप भारतीय भाषाओं में ज्ञान-सृजन की दृष्टि को सुदृढ़ करना रहा।

कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों के विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से जुड़े शिक्षकों एवं शिक्षाविदों द्वारा सहभागिता की गई। हिन्दी सहित अनेक भारतीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतिभागियों द्वारा व्याख्यानों, प्रश्नोत्तर सत्रों, समूह-चर्चाओं तथा सतत अकादमिक संवाद के माध्यम से भारतीय भाषाओं की अंतर्निहित एकता, साझा सांस्कृतिक विरासत एवं ज्ञान-परंपरा का व्यापक बोध प्राप्त किया। सहभागितापूर्ण विमर्श द्वारा भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन तथा उच्च शिक्षा में उनके प्रभावी उपयोग के प्रति प्रतिभागियों की प्रतिबद्धता को और अधिक सुदृढ़ किया।

पाठ्यक्रम के अंतर्गत भाषा-विज्ञान, समाज भाषा विज्ञान, भारत-बोध, लोकसाहित्य, अनुवाद अध्ययन, हिमालयी एवं जनजातीय भाषाएं, राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020, भाषा-प्रौद्योगिकी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे समकालीन विषयों पर देश के प्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा व्याख्यान दिए गए। उक्त विमर्शों ने भारतीय भाषाओं को केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि ज्ञान-निर्माण, सांस्कृतिक निरंतरता एवं राष्ट्रीय एकात्मता के आधार के रूप में स्थापित किया। साथ ही तुलनात्मक भाषा-अध्ययन, अंतर्विषयक अनुसंधान तथा भारतीय भाषाओं के अध्ययन के प्रति वि-औपनिवेशिक दृष्टि को भी सुदृढ़ करने का किया।

प्रशिक्षण के दौरान मातृभाषा-आधारित शिक्षा, भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा, मशीन अनुवाद, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल कॉर्पस तथा भाषिणी’ जैसे नवाचारों पर गंभीर विचार-विमर्श किया गया। किए गए विचार विमर्शों से स्पष्ट हुआ, आधुनिक तकनीक के साथ भारतीय भाषाओं का समन्वय ज्ञान-विस्तार, अनुसंधान एवं नवाचारपरक अध्यापन के नए आयाम खोल सकता है। हिमालयी एवं जनजातीय भाषाओं पर केंद्रित व्याख्यानों ने भाषाई विविधता को भारत की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में रेखांकित करते हुए उनके संरक्षण, दस्तावेजीकरण तथा अकादमिक अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित माइक्रो-टीचिंग सत्र ने प्रतिभागियों को शिक्षण-कौशल, विषय-प्रस्तुतीकरण तथा संवादपरक अध्यापन का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया गया। विशेषज्ञों के रचनात्मक मार्गदर्शन से प्रतिभागियों में प्रभावी शिक्षण, अकादमिक अभिव्यक्ति तथा नवाचारपरक अध्यापन के प्रति आत्मविश्वास का विकास हुआ।

प्रोफेसर गुड्डी बिष्ट पंवार द्वारा कहा गया आयोजित पुनश्चर्या पाठ्यक्रम भारतीय भाषाओं की समरसता, बहुलता एवं भारतीय ज्ञान-परंपरा को उच्च शिक्षा के केंद्र में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण अकादमिक पहल है। कहा गया, विभिन्न भाषाई क्षेत्रों से आए प्रतिभागियों के मध्य स्थापित अकादमिक संवाद ने भारतीय भाषाओं के प्रति साझा उत्तरदायित्व एवं राष्ट्रीय दृष्टि को और अधिक सुदृढ़ किया है। उनके अनुसार इस प्रशिक्षण से प्राप्त अनुभव देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन, अनुसंधान तथा गुणवत्तापरक अध्यापन को नई दिशा प्रदान करेंगे।

निष्कर्ष स्वरूप पुनश्चर्या पाठ्यक्रम भारतीय भाषाओं के उन्नयन, संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में एक प्रभावी अकादमिक पहल सिद्ध हुआ है। इसने उच्च शिक्षा से जुड़े शिक्षकों एवं शोधकर्ताओं में भारतीय भाषाओं के प्रति वैज्ञानिक दृष्टि, सांस्कृतिक संवेदनशीलता तथा राष्ट्रीय उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करते हुए भारतीय ज्ञान-परंपरा आधारित उच्च शिक्षा की अवधारणा को व्यावहारिक आधार प्रदान किया गया। आयोजित कार्यक्रम भारतीय भाषाओं को भविष्य की ज्ञान-व्यवस्था, अनुसंधान एवं नवाचार के केंद्रीय माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

आयोजित पुनश्चर्या कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से साठ प्रतिभागियों द्वारा सहभागिता की, जिनमें हिन्दी, संस्कृत, बंगला, गुजराती तथा उर्दू विषयों के शिक्षक एवं शिक्षाविद शामिल हुए थे। सभी प्रतिभागियों द्वारा विश्वविद्यालय, यूजीसी- एम.एम.टी.टी.सी. केंद्र तथा कार्यक्रम समन्वयक प्रोफेसर गुड्डी बिष्ट पंवार के प्रति सफल एवं उत्कृष्ट आयोजन के लिए आभार व्यक्त किया गया।

समापन समारोह में एम.एम.टी.टी.सी. केंद्र के अधिकारी, कर्मचारी तथा सभी प्रतिभागियों की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही। आयोजित कार्यक्रम संचालन डॉ. सोमेश थपलियाल एवं डॉ. कविता भट्ट द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। धन्यवाद ज्ञापन उप निदेशक डॉ. राहुल कुंवर सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया।

संपूर्ण बारह दिवसीय पुनश्चर्या कार्यक्रम को संचालन की दृष्टि से अति प्रभावी व सफल बनाने हेतु समन्वयक प्रोफेसर गुड्डी बिष्ट पंवार के सानिध्य में हिन्दी विभाग के शोधार्थियों राकेश सिंह, कोमल, तुषार माहन, शुभम थपलियाल, कुमारी शिवानी, अनूपा, मुरारी कुमार गुप्ता एवं शालिनी गुसाईं द्वारा सक्रिय भूमिका का निर्वाह किया गया।

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