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“दिल्ली से उठी पहाड़ बचाने की हुंकार!”उत्तराखंड सदन में गूंजा ‘अपनी गणना, अपने गाँव’ का आह्वान, प्रवासी समाज ने लिया प्रतिलोम पलायन का संकल्प
अमर चंद्र
नई दिल्ली।देवभूमि उत्तराखंड की संस्कृति, गांवों की पहचान, पलायन की पीड़ा और भविष्य की दिशा को लेकर राजधानी दिल्ली के उत्तराखंड सदन में एक भव्य विचार गोष्ठी “अपनी गणना, अपने गाँव, परिसीमन एवं प्रतिलोम पलायन” का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम सार्वभौमिक सोशल एजुकेशन चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली, मां ज्वालपा शारदीय महोत्सव एवं जयंती फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुआ, जिसमें प्रवासी उत्तराखंडी समाज की बड़ी भागीदारी देखने को मिली।
कार्यक्रम में पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन, खाली होते गांव, जनगणना में घटती संख्या और परिसीमन पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे गंभीर विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि यदि प्रवासी समाज अपनी जड़ों से जुड़ा रहेगा और अपनी जनगणना अपने गांवों में सुनिश्चित करेगा, तभी उत्तराखंड की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान मजबूत बनी रहेगी।
गोष्ठी में दिल्ली प्रवास की अनेक सामाजिक संस्थाओं के अध्यक्ष, महासचिव, पदाधिकारी एवं कार्यकर्ताओं की विशेष भागीदारी रही। प्रमुख रूप से श्रीमती संयोगिता ध्यानी, श्रीमती रोशनी चमोली, श्रीमती कुसुम बिष्ट, योगेश भट्ट, प्रताप थलवाल सहित कई गणमान्य सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे, जिन्होंने उत्तराखंड के गांवों को पुनर्जीवित करने और प्रवासी समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने के अभियान को मजबूत बनाने पर जोर दिया।
कार्यक्रम के दौरान समाजसेवा, सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक जागरूकता में योगदान देने वाले कई व्यक्तियों एवं संगठनों को सम्मानित भी किया गया।
सम्मानित वक्ताओं में जोत सिंह बिष्ट, मथुरादत्त जोशी, अजय सिंह बिष्ट, रोशनी चमोली और प्रेम बहुखंडी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि आज पहाड़ अपनी पहचान और अपने लोगों को पुनः बुला रहे हैं। ऐसे समय में प्रवासी समाज की भूमिका केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
मंच संचालन सुभाष गुस्साई ने प्रभावशाली अंदाज में किया। उन्होंने कहा कि “मूल की पुकार” केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, संस्कृति और गांवों को बचाने का जनआंदोलन है।
कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने एक स्वर में संकल्प लिया कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने, उत्तराखंड की संस्कृति को जीवित रखने और गांवों को पुनः आबाद करने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाएंगे। साथ ही राजधानी दिल्ली में रह रहे उत्तराखंड के प्रवासियों से विशेष आह्वान किया गया कि वे अपनी जनगणना अपने मूल गांवों में अवश्य कराएं, ताकि भविष्य के परिसीमन और विधानसभा क्षेत्रों में उत्तराखंड की वास्तविक जनभागीदारी सुनिश्चित हो सके।
कार्यक्रम का समापन उत्तराखंड के उज्ज्वल भविष्य, सांस्कृतिक संरक्षण और सामूहिक चेतना के संकल्प के साथ हुआ।
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