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उत्तराखंड के 21वे स्थापना दिवस पर शिलान्यास व लोकार्पण के भव्य आयोजन

सी एम पपनैं

नई दिल्ली। उत्तराखंड राज्य के 21वे स्थापना दिवस के अवसर पर प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी व उपराष्ट्रपति एम वेन्कैया नायडू सहित केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह, सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावेडकर, दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व देश के अन्य राजनेताओ द्वारा, राज्य के जनमानस को, राज्य स्थापना दिवस के शुभ अवसर पर, बधाई प्रेषित की गई है।

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी द्वारा ट्वीट कर उत्तराखंड के निवासियो को, राज्य के स्थापना दिवस की हार्दिक बधाई देने के साथ-साथ, राज्य के प्रगति के पथ पर अग्रसर होने, प्राकृतिक संपदा और नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर, प्रदेश के विकास की नई ऊचाईयों को छूने की कामना की गई है।

राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत द्वारा, रविवार को स्थापना दिवस के अवसर पर, टिहरी मे बहुप्रतिक्षित डोबरा-चांठी पुल का लोकार्पण किया गया। इसके साथ ही कुल चार अरब, तिरहत्तर करोड़, आठ लाख, छप्पन हजार की विभिन्न 60 योजनाओ का शिलान्यास एव लोकार्पण किया गया।

स्थापना दिवस के अवसर पर देहरादून के श्री रामकृष्ण एकेडमी स्कूल के प्रांगण में, पर्यावरण संवर्धन हेतु, एक नई परंपरा का शुभारंभ कर, स्कूल निदेशक परमेंद्र डबराल, प्रधानाचार्य किरन डबराल, विद्यालय के गुरुजनों, वरिष्ठ पत्रकार कैलाश जोशी व कृष जोशी के कर कमलो, औषधीय पेड़ों का रोपण कर, स्थापना दिवस धूमधाम व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

दिल्ली मे राज्य स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर, रावत डिजिटल व आशीष सुन्दरियाल के सहयोग से, वैश्विक कोरोना काल मे उत्तराखंड के प्रबुद्ध तीन सौ छप्पन कुमांऊनी-गढ़वाली कवियों की रचनाओं वाला, चार सौ पृष्ठों के, संयुक्त काव्य संकलन, ‘बिनसिरी’ का लोकार्पण, आयोजन मुख्य अतिथि, जीत राम भट्ट, सचिव हिन्दी, संस्कृत व गढ़वाली, कुमांऊनी-जौनसारी अकादमी दिल्ली सरकार द्वारा मुख्य वक्ता प्रतिष्ठित साहित्यकार व सिनेकलाकार मदन ढुकलान तथा विशिष्ठ‌ अतिथि मयूर विहार भाजपा जिला अध्यक्ष विनोद बछेती, साहित्यकार दिनेश ध्यानी के सानिध्य एव उत्तराखण्ड के अन्य प्रबुद्ध साहित्यकारो व समाजसेवियो की उपस्थित मे डीपीएमआई सभागार, न्यू अशोकनगर में किया गया।

अवलोकन कर ज्ञात होता है, विगत बीस वर्षों से, प्रति वर्ष, स्थापना दिवस मनाते आ रहे, उत्तराखंड के जनमानस की आकांक्षाओ व सपनों का यह राज्य, राजनैतिक दृष्टि से, बदलावकारी तो रहा, लेकिन जन आकांक्षाओ पर बहुत खरा नहीं उतर पाया है। अदलती-बदलती सरकारों मे पदारूढ़, ग्यारह मुख्यमंत्रियों को, विगत बीस वर्षो मे देख चुका, 2016 मे राष्ट्रपति शासन भुगत चुका व दो-दो अस्थाई राजधानियों का बोझ उठाए, राज्य के जनमानस व उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों की चाहत वाली, राज्य की स्थायी राजधानी का प्रश्रन आज भी जस का तस, बना हुआ है। राज्य की राजनीति मे, जो भी दल विपक्ष मे रहा है, स्थायी राजधानी गैरसैंण का मुद्दा उठाता नजर आता है, सत्तासीन होने पर, भूलता हुआ भी।

बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर, स्थापित सरकारों की नीतियों पर किए गए सवाल भी, विगत बीस वर्षो में यथावत रहे हैं। विगत बीस वर्षो मे सैकडो गांव खाली हो चुके हैं। लाखों लोगों ने पलायन किया है। प्राकृतिक संसाधनों की लूट के मामले में राज्य, देश के अव्वल राज्यो मे सुमार है। सरकारी तंत्र और भू-माफिया के गठजोड़ ने पूरे पहाड़ को बेहाल कर दिया है।

उत्तराखंड राज्य का प्रबुद्ध जनमानस आखिर कब तक आती-जाती सरकारों के कोरे वादो मे उलझा रहेगा? स्थापना दिवस मनाता रहेगा? जनमानस को जनसरोकारो से जुडे बृहद परिणामो की दरकार है, स्वयं व राज्य की निरंतर उन्नति के लिए।
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