Amar sandesh नई दिल्ली।कृत्रिम मेधा (AI) के तेजी से बढ़ते प्रभाव के बीच हिंदी भाषा को तकनीक के अनुरूप विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। नव उन्नयन साहित्यिक सोसाइटी की ओर से आयोजित ऑनलाइन वेबिनार “कृत्रिम मेधा, हिंदी और संवाद : चुनौतियाँ तथा संभावनाएँ” में विशेषज्ञों ने कहा कि यदि हिंदी को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाना है तो सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) और आधुनिक डिजिटल उपकरणों के साथ उसका प्रभावी समन्वय अनिवार्य है।
वेबिनार के मुख्य वक्ता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के अनुवाद अध्ययन एवं प्रशिक्षण विद्यालय के पूर्व निदेशक प्रो. हरीश कुमार सेठी ने कहा कि आज संवाद का स्वरूप तेजी से डिजिटल हो रहा है। ऐसे में हिंदी के विकास के लिए आधुनिक तकनीक, यूनिकोड, कृत्रिम मेधा और अनुवाद प्रणालियों के अनुरूप भाषा को तकनीकी रूप से विस्तार देना समय की मांग है।
उन्होंने कहा कि कृत्रिम मेधा की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने के लिए मजबूत संवाद प्रणाली और निरंतर फीडबैक आवश्यक है। AI को जितना अधिक मानवीय संवाद और भाषाई अनुभव मिलेगा, उसकी भाषा समझने और सटीक परिणाम देने की क्षमता उतनी ही बेहतर होगी। उन्होंने बताया कि भारतीय भाषाओं को डिजिटल दुनिया में मजबूत पहचान दिलाने में यूनिकोड की महत्वपूर्ण भूमिका है और AI का भविष्य भी इससे गहराई से जुड़ा हुआ है।
प्रो. सेठी ने कहा कि दुनिया में तत्काल अनुवाद (रियल-टाइम ट्रांसलेशन) की बढ़ती आवश्यकता ने AI के विकास को नई गति दी है। जो भाषाएं तकनीक और नए विचारों को समय के साथ नहीं अपनातीं, वे वैश्विक संवाद की दौड़ में पीछे रह जाती हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि हिंदी डिजिटल चुनौतियों का सामना करने के लिए तेजी से तैयार हो रही है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. पूरनचंद टंडन ने कहा कि AI तकनीक लगातार आगे बढ़ रही है, लेकिन मानवीय संवेदनाओं का कोई विकल्प नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि कंप्यूटर कभी भी “मां के हाथ की रोटी” का स्थान नहीं ले सकता, क्योंकि उसमें ममता, अपनापन और भावनाओं का स्पर्श होता है। यही मानवीय संवेदनाएं भाषा और अनुवाद की सबसे बड़ी ताकत हैं।
वेबिनार में प्रो. विनीता कुमारी, शोधार्थियों, शिक्षकों और भाषा प्रेमियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. पूजा ने किया, जबकि रिपोर्ट प्रस्तुति प्रो. रवि शर्मा ‘मधुप’ और डॉ. साक्षी जोशी ने दी।