Post Views: 0
— सुरेन्द्र हालसी
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट तेज हो चुकी है। अगले छह महीनों के भीतर कभी भी चुनाव कार्यक्रम की घोषणा हो सकती है। ऐसे में प्रदेश की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियाँ। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, अपनी-अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुटी हैं। भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का लक्ष्य लेकर संगठनात्मक स्तर पर सक्रिय है, जबकि कांग्रेस सत्ता में वापसी के अवसर तलाश रही है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कांग्रेस इस अवसर को चुनावी सफलता में बदलने के लिए पूरी तरह तैयार है?
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखें तो प्रदेश में महंगाई, बेरोजगारी, प्रशासनिक कार्यशैली और सत्ता विरोधी भावना जैसे मुद्दों पर आम जनता में असंतोष महसूस किया जा रहा है। स्वाभाविक रूप से विपक्ष के लिए यह अनुकूल वातावरण माना जा सकता है। किंतु लोकतंत्र में केवल सत्ता विरोधी लहर ही चुनाव नहीं जिताती; उसके लिए एक मजबूत, अनुशासित और सक्रिय संगठन भी उतना ही आवश्यक होता है।
यहीं भाजपा और कांग्रेस की कार्यशैली में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। भाजपा में टिकट की दावेदारी को लेकर मतभेद और असंतोष भले ही समय-समय पर सामने आते हों, लेकिन चुनाव के समय संगठन अधिकांश नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट करने में सफल रहता है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ अंततः संगठनात्मक निर्णयों के आगे पीछे छूट जाती हैं।
इसके विपरीत कांग्रेस में कई बार आंतरिक मतभेद चुनावी परिणामों को प्रभावित करते रहे हैं। कई अवसरों पर स्थानीय स्तर की गुटबाजी और असंतोष ने पार्टी को संभावित जीत से वंचित किया है। वर्ष 2022 का विधानसभा चुनाव इसका उदाहरण माना जा सकता है। टिकट वितरण और कुछ सीटों पर अंतिम समय में लिए गए राजनीतिक निर्णयों का प्रभाव केवल संबंधित विधानसभा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आसपास की कई सीटों पर भी देखने को मिला।
कुमाऊँ क्षेत्र इस बार कांग्रेस के लिए सबसे अधिक संभावनाओं वाला क्षेत्र माना जा रहा है। यदि पार्टी यहाँ सही रणनीति अपनाती है तो कई सीटों पर बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। लेकिन इसके लिए उसे स्थानीय नेतृत्व के बीच समन्वय स्थापित करना होगा।
रामनगर विधानसभा इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि वरिष्ठ नेता रंजीत रावत और संजय नेगी के बीच मतभेद दूर नहीं हुए, तो कांग्रेस के लिए इस सीट पर जीत आसान नहीं होगी। दोनों नेताओं का अपना प्रभाव क्षेत्र है और किसी भी प्रकार की अंदरूनी खींचतान का लाभ भाजपा को मिल सकता है।
सल्ट विधानसभा में भी स्थिति लगभग ऐसी ही दिखाई देती है। यदि गंगा पंचोली और रंजीत रावत के समर्थकों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित नहीं हुआ तो यह सीट भी कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण बन सकती है।
नैनीताल विधानसभा की तस्वीर भी कम रोचक नहीं है। स्थानीय स्तर पर भाजपा के प्रति असंतोष की चर्चाएँ हैं और कांग्रेस के लिए अवसर भी दिखाई देता है। लंबे समय से यह माना जा रहा था कि संजीव आर्य इस सीट पर कांग्रेस का सबसे मजबूत चेहरा हो सकते हैं। किंतु उनके चुनाव न लड़ने की घोषणा ने पार्टी के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा कोई अन्य स्थानीय नेता स्पष्ट रूप से उभरता नहीं दिख रहा, जो संगठन और जनाधार—दोनों स्तरों पर भाजपा को सीधी चुनौती दे सके।
दूसरी ओर भाजपा चुनावी दृष्टि से कहीं अधिक व्यवस्थित दिखाई देती है। विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में संभावित उम्मीदवारों और स्थानीय परिस्थितियों का लगातार सर्वे कराया जा रहा है। संगठन बूथ स्तर तक सक्रिय है और चुनावी तैयारी समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है। यही भाजपा की सबसे बड़ी संगठनात्मक ताकत मानी जाती है।
यदि कांग्रेस वास्तव में सत्ता परिवर्तन का लक्ष्य लेकर चल रही है, तो उसे केवल सरकार की आलोचना करने से आगे बढ़ना होगा। समय रहते टिकट वितरण, स्थानीय विवादों का समाधान, मजबूत उम्मीदवारों का चयन और कार्यकर्ताओं में विश्वास पैदा करना उसकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। अन्यथा जनता में यदि सत्ता परिवर्तन की इच्छा भी होगी, तो उसका लाभ किसी राजनीतिक दल को तभी मिलेगा, जब वह स्वयं चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार होगा।
उत्तराखंड का आगामी चुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला नहीं होगा, बल्कि यह दोनों दलों की संगठनात्मक क्षमता, नेतृत्व और रणनीतिक परिपक्वता की भी परीक्षा होगी। फिलहाल राजनीतिक माहौल कांग्रेस के लिए अवसर अवश्य प्रदान करता है, लेकिन चुनावी सफलता अंततः उसी दल को मिलेगी जो अपने अवसरों को समय रहते संगठित राजनीतिक शक्ति में बदल सके।
(लेखक सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों के स्वतंत्र विश्लेषक हैं। प्रस्तुत विचार लेखक के निजी हैं।)
Related