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अमर संदेश से विशेष बातचीत में साझा किया जीवन का सफर
नई दिल्ली।भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे राजस्थान के छोटे से कस्बे श्रीकरणपुर से निकलकर देश के अग्रणी ऑर्थोपेडिक एवं जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जनों में शुमार होना किसी सामान्य यात्रा का परिणाम नहीं है। यह कहानी है संघर्ष, समर्पण, संवेदनशीलता और चिकित्सा के प्रति अटूट विश्वास की। लगभग दो दशक के अनुभव में 20 हजार से अधिक सफल सर्जरियां और एक लाख से ज्यादा मरीजों का उपचार कर चुके डॉ. दीपक कुमार अरोड़ा आज उन चिकित्सकों में गिने जाते हैं, जिन पर मरीज आंख बंद कर भरोसा करते हैं।
अमर संदेश से विशेष बातचीत में डॉ. अरोड़ा ने अपने जीवन के संघर्ष, डॉक्टर बनने की प्रेरणा, चिकित्सा दर्शन और मरीजों से जुड़ी भावुक कहानियां साझा कीं।
“पिता को समय पर इलाज नहीं मिला, तभी तय कर लिया था डॉक्टर बनूंगा”
बातचीत के दौरान डॉ. अरोड़ा कुछ पल के लिए भावुक हो जाते हैं। वे बताते हैं कि आठवीं कक्षा में ही उनके पिता का हृदयाघात से निधन हो गया था। उस समय बेहतर चिकित्सा सुविधाओं की कमी ने उनके परिवार को गहरा आघात पहुंचाया।
उन्होंने कहा, “उसी दिन मन में यह संकल्प लिया कि ऐसा डॉक्टर बनूंगा जो किसी मरीज को समय पर उपचार के अभाव में निराश न होने दे। शायद वही घटना आज भी हर गंभीर मरीज के इलाज में मुझे तुरंत निर्णय लेने की प्रेरणा देती है।”
छोटे कस्बे से निकलकर बनाई राष्ट्रीय पहचान
श्रीकरणपुर में प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने बीकानेर मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और ऑर्थोपेडिक्स में विशेषज्ञता प्राप्त की। वर्ष 2010 में दिल्ली आने के बाद उन्होंने सरकारी और निजी अस्पतालों में सेवाएं दीं। समय के साथ जटिल फ्रैक्चर, घुटना एवं हिप प्रत्यारोपण, स्पोर्ट्स इंजरी, आर्थ्रोस्कोपी और रिवीजन जॉइंट रिप्लेसमेंट जैसी कठिन सर्जरियों में विशेष दक्षता हासिल की।
आज देश के विभिन्न राज्यों से मरीज उनके पास उपचार के लिए पहुंचते हैं।
“मैं खुद दर्द से गुजरा हूं, इसलिए मरीज का दर्द समझता हूं”
डॉ. अरोड़ा बताते हैं कि एक सड़क दुर्घटना में वे स्वयं गंभीर फ्रैक्चर का शिकार हुए थे। लंबे इलाज और कठिन रिकवरी ने उन्हें मरीज की मानसिक पीड़ा को बेहद करीब से समझने का अवसर दिया।
वे कहते हैं, “सर्जरी केवल शरीर का इलाज करती है, लेकिन मरीज को मानसिक रूप से मजबूत बनाना डॉक्टर की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। जब मरीज मुस्कुराते हुए अपने पैरों पर वापस चलता है, वही हमारी सबसे बड़ी सफलता होती है।
जब पैर काटने की नौबत थी, तब मिली नई उम्मीद
राहुल चतुर्वेदी का मामला डॉ. अरोड़ा के करियर की सबसे चुनौतीपूर्ण सर्जरियों में शामिल रहा। वर्ष 2014 की सड़क दुर्घटना में उनकी फीमर बोन कई जगह से टूट गई थी।कई ऑपरेशन असफल रहे और एक अस्पताल ने पैर काटने तक की आशंका जता दी।
इसके बाद डॉ. अरोड़ा ने आधुनिक तकनीक, विशेष इम्प्लांट और बोन ग्राफ्टिंग की मदद से सफल सर्जरी की। कुछ महीनों में हड्डी जुड़ गई और राहुल सामान्य जीवन में लौट आए।
राहुल कहते हैं, “मैंने उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन डॉ. अरोड़ा ने मुझे नया जीवन दिया। आज मैं सामान्य जीवन जी रहा हूं और लंबी यात्राएं भी कर रहा हूं।
हिम्मत नहीं हारी, फिर मिली नई जिंदगी
बरेली निवासी 22 वर्षीय आर. शरद बताते हैं कि वर्ष 2023 में सड़क दुर्घटना के बाद उनकी फीमर बोन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी। लगातार दर्द, सूजन और घुटने की जकड़न ने उनका जीवन लगभग थाम दिया था।कई अस्पतालों से उपचार कराने के बाद भी राहत नहीं मिली।
डॉ. दीपक अरोड़ा ने आधुनिक तकनीक और विशेष इम्प्लांट की सहायता से सफल Total Knee Replacement किया। आज शरद बिना दर्द के सामान्य जीवन जी रहे हैं।
शरद कहते हैं, “एक समय लगा था कि जिंदगी यहीं रुक जाएगी, लेकिन डॉ. अरोड़ा ने सिर्फ ऑपरेशन नहीं किया, बल्कि मेरा आत्मविश्वास भी वापस लौटा दिया। आज मैं नौकरी कर रहा हूं, बाइक और कार चला रहा हूं और पूरी तरह सामान्य जीवन जी रहा हूं।”
Double Hip Replacement के बाद फिर रनवे पर लौटा गौरव
दिल्ली के 29 वर्षीय मॉडल और मेकअप आर्टिस्ट गौरव दोनों हिप खराब होने के कारण चलने-फिरने तक में असमर्थ हो चुके थे। लगातार दर्द, लोगों के ताने और करियर खत्म होने की चिंता ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया था।
सितंबर 2022 में डॉ. अरोड़ा ने उनकी जटिल डबल हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी की। कुछ महीनों बाद गौरव फिर से मॉडलिंग की दुनिया में लौट आए।
भावुक होकर वे कहते हैं, “एक समय लोग मुझे ‘लंगड़ा’ कहकर बुलाते थे। आज मैं फिर से रनवे पर पूरे आत्मविश्वास के साथ चलता हूं। डॉ. दीपक अरोड़ा ने केवल मेरा इलाज नहीं किया, बल्कि मेरा भविष्य भी मुझे वापस लौटा दिया।”
“डॉक्टर की असली सफलता मरीज की मुस्कान है”
बातचीत के अंत में डॉ. दीपक कुमार अरोड़ा ने कहा कि चिकित्सा केवल पेशा नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम है।
उन्होंने कहा, “हर मरीज की कहानी अलग होती है। हमारा प्रयास केवल सफल ऑपरेशन करना नहीं, बल्कि मरीज को दोबारा आत्मविश्वास के साथ सामान्य जीवन में लौटाना होता है।जब कोई मरीज वर्षों बाद मुस्कुराते हुए अपने पैरों पर चलकर धन्यवाद कहता है, वही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।
राजस्थान के सीमावर्ती कस्बे से शुरू हुई यह यात्रा आज देशभर के हजारों मरीजों के लिए उम्मीद का प्रतीक बन चुकी है।डॉ. दीपक कुमार अरोड़ा की कहानी इस बात का प्रमाण है कि संघर्ष, आधुनिक चिकित्सा और मानवीय संवेदनाएं जब साथ आती हैं, तो केवल बीमारी ही नहीं, बल्कि जीवन भी बदल जाता है।
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