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पैतृक गांव अयाळ में बनेगा लोकगायक जीत सिंह नेगी स्मृति द्वार–दिनेश ध्यानी 

जिस मिट्टी ने उत्तराखंड के महान लोकगायक जीत सिंह नेगी को जन्म दिया, उसी पैतृक गांव अयाळ में अब उनकी याद हमेशा के लिए जीवंत रहेगी। बनने जा रहा है ‘लोकगायक जीत सिंह नेगी स्मृति द्वार’

Amar sandesh नई दिल्ली: उत्तराखण्ड के कालजयी लोकगायक, गीतकार, नाटककार जीत सिंह नेगी जी की याद में उनकी जन्मभूमि अयाळ गौं में स्मृति द्वार का निर्माण किया जा रहा है। ग्राम प्रधान रोशनी देवी ने बताया कि स्वर्गीय जीत सिंह नेगी जी की स्मृति में बनने वाले स्मृति द्वार की मांग काफी पुरानी है। इस द्वार के बनने से नई पीढ़ी को जीत सिंह नेगी के काम और उनके गीतों को समझने का जज्बा मिलेगा। यह समूचे क्षेत्र के लिए गर्व की बात है। 

सुप्रसिद्ध व्लॉगर व समाजसेवी सुभाष कुकरेती द्वारा पिछले दिनों अयाळ गांव का एक व्लॉग बनाने के बाद यह मामला लोगों के संज्ञान में आया वीतब जाकर अयाळ गांव की प्रधान व प्रबुद्ध लोगोंद्वारा सरकार के समक्ष इस मुद्दे को रखा। जिस पर प्रशासन की की पहल से टेंडर भी हो गया है और जल्दी ही कार्य शरू हो जायेगा।

स्वर्गीय जीत सिंह नेगी के शताब्दी वर्ष को मना रहा संगठन उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के संयोजक दिनेश ध्यानी ने बताया कि स्वर्गीय जीत सिंह नेगी शताब्दी वर्ष के अंतर्गत पूरे वर्ष आयोजन होंगे और जब उक्त स्मृति द्वार बनकर तैयार हो जायेगा उसी दौरान एक कार्यक्रम नेगी जी के पैतृक गांव म किया जाने का विचार है। श्री ध्यानी ने बताया कि उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली अगले वर्ष 2027 को स्वर्गीय जीत सिंह नेगी जी की शताब्दी समारोह का आयोजन दिल्ली में बड़े स्तर पर करने का विचार कर रहा है। इस आयोजन में नेगी जी के गीतों की प्रस्तुति, नाटक आदि पर सेमिनार व मंचन होगा। सांस्कृतिक संगठनों और उत्तराखण्ड सरकार को इस दिशा में पहल करनी चाहिए ताकि उत्तराखण्ड के एक महान गीतकार, गायक, नाटककार की शताब्दी वर्ष की बेला पर और अधिक आयोजन सरकार द्वारा आयोजित हों।

बहुआयामी प्रतिभा के धनी जीत सिंह नेगी जी का जन्म 2 फरवरी 1927 को भारत के उत्तराखंड राज्य के पौड़ी गढ़वाल के पैडलस्युन के अयाल गांव में सुल्तान सिंह नेगी और रूपदेयी नेगी के घर हुआ था । उन्होंने पौड़ी गढ़वाल (भारत), मेम्यो (वर्तमान पिन ऊ ल्विन , म्यांमार ) और लाहौर ( पाकिस्तान ) जैसे विभिन्न स्थानों पर अपनी शिक्षा प्राप्त की ।जीत सिंह नेगी का निधन 21 जून, 2020 को हुआ। उन्होंने अपने धर्मपुर स्थित आवास पर अंतिम सांस ली।

  जीत सिंह नेगी जी उत्तराखंड के ऐसे पहले लोकगायक थे, जिनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड 1949 में जारी हुआ। जीत सिंह नेगी ने दो हिंदी फिल्मों में भी बतौर सहायक निर्देशक कार्य किया। वह संगीतकार और रंगकर्मी भी थे। पर्वतीय संस्कृति एवं भाषा के घोर उपासक, गढ़वाली लोकगीतों के प्रख्यात रचनाकार तथा सुप्रसिद्ध लोकगायक श्री जीत सिंह नेगी उत्तराखण्ड का वह सितारा है जो सदा ही सांस्कृतिक क्षेत्र के क्षितिज में चमक बिखेरता है। वस्तुत: गढ़वाली सहगल जैसी उपमा से अंलकृत श्री नेगी जिस तरह से पर्वतीय संस्कृति, भाषा, लोकगीतों, लोकगाथाओं, लोक नृत्य, लोक संगीत आदि स्वस्थ्य परम्पराओं के उत्थान के लिये समर्पित हैं वह उनकी आभा को और ज्यादा विस्तृत करता है। पर्वतीय जनजीवन को बड़े ही मार्मिक, सजीव एवं प्रभावी ढंग से अपने सजित गीतों, नृत्य नाटिकाओं व गीत-नाटकों के माध्यम से जीवंत कर दिया।

गीत-संगीत का उनका यह सुनहरा सफर छात्र जीवन से शुरू हुआ, जब सन् 1942 में पौड़ी से स्वरचित गढ़वाली गीतों का सफल गायन आपने किया। वे अपनी आकर्षक सुरीली धुनों में लोकगीत गाकर लोकप्रिय होने लगे। सन् 1949 में उनके लिए सब कुछ बदल गया जब सर्वप्रथम किसी गढ़वाली लोकगायक के रूप में उन्हें यंग इंडिया ग्रामोफोन कम्पनी ने मुम्बई आमंत्रित किया। जहाँ नेगी के छ: गीतों की रिकार्डिंग हुई। ये गीत काफी प्रचलित हुए। और कला जगत में सराहे भी गये। सन् 1952 को गढ़वाल भातृ मण्डल मुम्बई के तत्वावधान में जीत सिंह नेगी ने नाटक ‘भारी भूल ‘ का सफल मंचन किया। इसके बाद नेगी जी ने वर्ष 1954-55 में हिमालय कला संगम, दिल्ली के मंच से उक्त नाटक का निर्देशन व मंचन किया। गढ़वाल के इतिहास पुरुष टिहरी नरेश के सेनापति माधो सिंह भण्डारी द्वारा मलेथा गाँव की कूल के निर्माण की रोमांचक घटना पर आधारित नाटक ‘मलेथा की कूल’ की रचना की। जिसका मचन 1970 में देहरादून में किया गया। इसके अलावा गढ़वाली लोक-कथाओं के प्रसिद्ध नायक बांसुरी वादक जीतू बगड़वाल के जीवन पर गीत नृत्य नाटक ‘जीतू बगड़वाल’ का क्रमश: 1984, 1987 में देहरादून और चण्डीगढ़ में मंचन हुआ। स्वरचित गढ़वाली गीतों को अपन मधुर एवं प्रेरक वाणी में गाकर संगीत जगत को पहाड़ी संस्कति की ओर आकर्षित करने का सर्वप्रथम बीड़ा उठाने वाले जीत सिंह नेगी के गीत- ‘तू होली ऊँची डाँड्यू मां वीरा घसियारी का भेष माँ’ का उल्लेख भारतीय जनगणना सर्वेक्षण विभाग ने सन् 1961 में सर्वप्रिय लोकगीत के रूप में किया है।

जीत सिंह नेगी जी ने अपने करियर की शुरुआत 1940 के दशक के उत्तरार्ध में की। नेगी पहले गढ़वाली गायक हैं जिनके छह गढ़वाली लोकगीतों का संकलन 1949 में बॉम्बे की यंग इंडिया ग्रामोफोन कंपनी द्वारा ग्रामोफोन पर रिकॉर्ड किया गया था।वे 1940 के दशक में ही गढ़वाली भाषा और भावनाओं को आवाज देने वाले पहले व्यक्ति थे और स्वतंत्रता के बाद के काल में देहरादून में एक गढ़वाली संस्था बन गए । नेगी ने मुंबई की नेशनल ग्रामोफोन कंपनी में उप संगीत निर्देशक के रूप में भी काम किया।

प्रमुख कृतियाँ

उनका नाटक ‘भरी भूल’ पहली बार 1952 में मुंबई के दामोदर हॉल में गढ़वाल भ्रातृ मंडल के कार्यक्रम में मंचित किया गया था। नाटक तुरंत हिट हो गया और इसने न केवल मुंबई से आए प्रवासी गढ़वालियों के मन को झकझोर दिया, बल्कि पूरे भारत में प्रवासी गढ़वालियों को अपने सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नाटक के महत्व के बारे में जागरूक किया। संवाद हिंदी और गढ़वाली में हैं और यही इसकी अनूठी विशेषता थी। सिंह नेगी ने ‘भरी भूल’ की परिकल्पना, लेखन, निर्देशन और मंच प्रबंधन किया था।’भरी भूल’ गढ़वाली रंगमंच और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के इतिहास में एक मील का पत्थर है। हिमालय कला संगम, दिल्ली ने इस नाटक का मंचन 1954-55 में किया था। बाद में इस नाटक का मंचन कई स्थानों पर और कई बार किया गया। गढ़वाली नाटक की शोधार्थी सुधरानी लिखती हैं, “इस नाटक को देखने सभी जगह दर्शक टूट पड़े और यही कारण था कि ललित मोहन थपलियाल ने हिंदी नाटक छोड़कर गढ़वाल नाटक में प्रवेश किया।”

मलेथा की कूल : यह एक ऐतिहासिक नाटक है जो गढ़वाली राज्य के सेना प्रमुख, तिब्बत के विजयी योद्धा और वीर बौद्ध गजेंद्र सिंह माधव सिंह भंडारी के पिता द्वारा निर्मित मलेथा नहर पर आधारित है । यह नाटक देहरादून , मुंबई , दिल्ली , चंडीगढ़ , मसूरी , तिहरी और कई अन्य स्थानों पर 18 बार मंचित हो चुका है । सिंह नेगी ने इस नाटक की रचना और निर्देशन किया है। जीतू बागडवाल : जीतू बागडवाल गढ़वाल की लोककथाओं में प्रसिद्ध हैं। जीतू बागडवाल एक प्रतिभाशाली बांसुरी वादक थे । सिंह ने इस लोककथा पर आधारित संगीतमय नाटक लिखा और उनके निर्देशन एवं मंच प्रबंधन में यह मधुर नाटक आठ से अधिक बार विभिन्न स्थानों पर मंचित किया गया। पतिव्रत रामी : दिल्ली के पार्वती मंच ने 1956 में सिंह नेगी द्वारा परिकल्पित और निर्मित हिंदी नाटक रामी बौरानी का मंचन किया और इसे कई बार और मंचित किया गया। रामी : टैगोर की जन्म शताब्दी के अवसर पर, गढ़वाली संगीत नाटक (गीत नाटिका) रामी का पहला मंचन 1961 में नरेंद्र नगर में हुआ था। बाद में पूरे भारत में इसके सौ से अधिक मंचन हो चुके हैं।

जीत सिंह नेगी जी का सुप्रसिद्ध नाटक राजू पोस्टमैन यह एक धाबड़ी गढ़वाली नाटक है और इसमें हिंदी और गढ़वाली दोनों भाषाओं के संवाद हैं। इस धाबड़ी नाटक का मंचन सबसे पहले गढ़वाल सभा चंडीगढ़ के राजू पोस्टमैन ने किया था और अब तक दस से अधिक बार इसका मंचन हो चुका है।

उनका पहला गढ़वाली गीत 1954 में आकाशवाणी से प्रसारित हुआ था। उनके नाटक और गीत 600 से अधिक बार प्रसारित हुए, जो किसी भी क्षेत्रीय भाषा के कलाकार के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। रेडियो गीत-नाटिका ‘जीतू बागडवाल’ और ‘मलेथा की कू’ भी आकाशवाणी से 50 से अधिक बार प्रसारित हुए।रामी का हिंदी संस्करण दिल्ली दूरदर्शन द्वारा प्रसारित किया गया था।

प्रसिद्ध लोकगायक जीत सिंह नेगी को लीजेंडरी सिंगर’ सम्मान से नवाजा गया था उनके साथ ही ‘यंग उत्तराखंड लाइफ टाइम अचीवमेंट’ सम्मान से लोकगायक चंद्र सिंह राही को नवाजा गया। यही नहीं जीत सिंह नेगी के गीतों को संस्कृति विभाग ने पुस्तक के रूप में संकलित किया है। यह उनके लिए किसी खास सम्मान से कम नहीं है। म्यारा गीत नाम की इस पुस्तक में नेगी के 1950 व 60 के दशक में गाए गीत शामिल किए गए हैं। अपने समय में ये गीत गढ़वाल व कुमाऊं क्षेत्र में काफी लोकप्रिय थे। लिहाजा इन गीतों को उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर भी माना जाता है।

गढ़वाल की प्राचीन व आधुनिक परिवेश में सामाजिक सरोकारों, राजनीतिक आकांक्षाओं एवं धार्मिक विचारों को नाटक तथा गीतों में पिरोकर अभिव्यक्त करने में नेगी जी का कोई सानी नहीं है। गढ़वाली लोकगीतों के स्वर, ताल, लय पर शोध करने वालों के लिए जीत सिंह नेगी एक अनुपम उदाहरण हैं जिन्हें पर्वतीय जनजीवन से बावस्ता लगभग हर विधा को टटोला है और काम किया है। सम्मान एवं पुरस्कारों की कतारें एवं अनगिनत राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संस्थाओं से आपकी सम्बद्धता ही काफी है नंगी जी की ख्याति बताने के लिए। आज के गीतकारों एवं संगीतज्ञों के लिए सदा से प्रेरणा स्रोत रहे जीत सिंह नेगी को यदि गढ़वाली गीतों का गॉडफादर कहा जाये तो शायद अतिशयोक्ति न होगी। आज भी उनकी वाणी में जो मधुरता है, ओज है वह अनुकरणीय है। सच मानिये तो वह हमें प्रेरित करती हैं।

कुल मिलाकर कालजयी लोकगायक जीत सिंह नेगी आजीवन अपने लोक के लिए समर्पित रहे। इसलिए आज उनके भगीरथ प्रयास को याद करने और संजोने का अवसर है ताकि नई पीढ़ी नेगी जी के काम से परिचित हो सके।

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