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लेखक- डॉ. अर्चना गुप्ता
अध्यक्षा, भाजपा हरियाणा
किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसकी सीमाओं, अर्थव्यवस्था या संसाधनों में नहीं, बल्कि उसके शिक्षित नागरिकों, सिद्धांतनिष्ठ नेतृत्व और राष्ट्रीय एकता में निहित होती है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का संपूर्ण जीवन इन तीनों मूल्यों का सशक्त प्रतीक है। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि दूरदर्शी शिक्षाविद्, राष्ट्रचिंतक और राष्ट्रीय एकात्मता के प्रबल समर्थक थे।
डॉ. मुखर्जी का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्रियाँ देना नहीं, बल्कि चरित्रवान, आत्मविश्वासी और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक तैयार करना है। मात्र 33 वर्ष की आयु में कोलकाता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बनकर उन्होंने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाया। वे भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषा और आधुनिक विज्ञान के समन्वय के पक्षधर थे। आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कौशल विकास, मातृभाषा, अनुसंधान और समग्र शिक्षा पर दिया गया बल उनके दूरदर्शी शिक्षा दर्शन की प्रासंगिकता को रेखांकित करता है।
शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने सार्वजनिक जीवन में सिद्धांतों को सर्वोपरि रखा। स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में उनके सामने राजनीतिक उन्नति के अनेक अवसर थे, किंतु जब उन्हें लगा कि कुछ नीतियाँ राष्ट्रहित और उनके मूल सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं, तो उन्होंने सत्ता से अधिक अपने विचारों को महत्व दिया। उनका त्याग इस सत्य का प्रतीक है कि राजनीति का सर्वोच्च उद्देश्य सत्ता नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व है।
डॉ. मुखर्जी के राष्ट्रदर्शन का तीसरा महत्वपूर्ण आधार था—राष्ट्रीय एकात्मता। उनका विश्वास था कि एक सशक्त राष्ट्र की पहचान समान अधिकार, समान कर्तव्य और समान संवैधानिक व्यवस्था से होती है। इसी भावना से उन्होंने उद्घोष किया— “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।”
1953 में बिना परमिट जम्मू-कश्मीर जाने का उनका निर्णय इसी वैचारिक प्रतिबद्धता का परिणाम था। हिरासत में उनका बलिदान राष्ट्रीय एकता के प्रति उनके अटूट समर्पण का प्रतीक बन गया।
आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का चिंतन और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, नैतिक नेतृत्व, आत्मनिर्भरता, सुशासन और राष्ट्रीय एकता—यही विकसित भारत की मजबूत आधारशिलाएँ हैं।
उनका जीवन हमें प्रेरित करता है कि शिक्षा केवल करियर नहीं, चरित्र का निर्माण करे; राजनीति केवल सत्ता का माध्यम नहीं, राष्ट्रसेवा का संकल्प बने; और राष्ट्रीय एकता हमारे प्रत्येक निर्णय का मूल आधार हो।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन हमें यह अमर संदेश देता है कि जब शिक्षा राष्ट्रभावना से जुड़ती है, नेतृत्व सिद्धांतों पर अडिग रहता है और राष्ट्रीय एकता सर्वोपरि होती है, तभी एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित भारत का निर्माण संभव होता है।
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