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अपनी जड़ों की ओर लौटती एक आत्मीय बातचीत
धर्मेंद्र तिवारी से मुलाकात में देवभूमि के संस्कारों, लोकगीतों और पुरानी परंपराओं को सहेजने पर मंथन
अमर चंद्र
कभी-कभी किसी व्यक्ति से हुई मुलाकात कुछ समय की होती है, लेकिन उसके विचार मन में लंबे समय तक बने रहते हैं। खासकर तब, जब सामने बैठा व्यक्ति अपने महत्वपूर्ण दायित्व के साथ-साथ अपनी मिट्टी, अपने संस्कारों और अपनी संस्कृति से भी उतनी ही गहराई से जुड़ा दिखाई दे।
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में जब हम आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं, ऐसे समय में अपनी जड़ों से जुड़े किसी व्यक्ति से मिलना अपने आप में एक सुखद अनुभव है। देवभूमि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, परंपराओं और संस्कारों को लेकर हुई एक आत्मीय बातचीत ने मुझे भीतर तक प्रभावित किया।
इसी बातचीत के दौरान धर्मेंद्र तिवारी जी से मिलने और उनके विचारों को समझने का अवसर मिला। भारत सरकार के रेल मंत्रालय में अपर महानिदेशक (जनसंपर्क) के महत्वपूर्ण दायित्व से जुड़े श्री तिवारी से जब उत्तराखंड की संस्कृति और हमारी पुरानी परंपराओं की चर्चा हुई, तो बातचीत केवल बीते समय की यादों तक सीमित नहीं रही।
बात इस चिंता तक पहुंची कि हमारी वे परंपराएं, जिन्हें हमारे माता-पिता, दादा-दादी और बुजुर्गों ने अपने जीवन में जिया, उन्हें आने वाली पीढ़ी तक कैसे पहुंचाया जाए।
परंपराएं केवल रस्में नहीं, हमारी सामाजिक स्मृति हैं
उत्तराखंड की पारंपरिक विवाह परंपराओं का जिक्र आया तो महसूस हुआ कि यह विषय केवल संस्कृति की चर्चा तक सीमित नहीं है। हमारी पुरानी विवाह पद्धतियों में जुड़े संस्कार, रीति-रिवाज, लोकगीत, पारिवारिक संबंध और पूरे गांव की सामूहिक भागीदारी के पीछे हमारी सामाजिक संरचना और जीवनशैली की एक पूरी कहानी छिपी हुई है।
लेकिन समय बदल रहा है।
आज विवाह समारोहों का स्वरूप बदल गया है। नई पीढ़ी आगे बढ़ रही है और यह स्वाभाविक भी है। मगर इसी बदलाव के बीच हमारी कई ऐसी परंपराएं हैं, जो धीरे-धीरे दुर्लभ होती जा रही हैं। कुछ परंपराएं तो ऐसी हैं, जिनके बारे में आज की पीढ़ी ने केवल अपने बुजुर्गों से सुना है।
यहीं से एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—यदि हमने इन परंपराओं को आज शब्दों में सुरक्षित नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ी इन्हें जानेगी कैसे?
धर्मेंद्र तिवारी जी के साथ हुई बातचीत ने इस सवाल को और गहराई से महसूस करने का अवसर दिया। लोक संस्कृति को केवल याद करना पर्याप्त नहीं है। उसे लिखना, दर्ज करना, साझा करना और समाज के बीच उसके प्रति जागरूकता पैदा करना भी उतना ही आवश्यक है।
लेकिन यह विचार केवल किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। हमारी संस्कृति किसी एक परिवार, गांव या व्यक्ति की संपत्ति नहीं है। यह पीढ़ियों से मिली वह सामूहिक विरासत है, जिसे अगली पीढ़ी तक सुरक्षित पहुंचाना हमारा दायित्व है।
दादा-दादी और नाना-नानी के किस्सों में छिपा है हमारा इतिहास
दादा-दादी और नाना-नानी के जमाने के सामाजिक जीवन की छोटी-छोटी बातें, गांव में होने वाले विवाह, बारात की तैयारियां, मांगलिक गीत, रिश्तेदारी निभाने के तरीके, त्योहारों की परंपराएं, खेत-खलिहान से जुड़े रीति-रिवाज, आपसी सहयोग और सामाजिक व्यवहार कुछ संकल्प ही थे। इन संकल्पों में ही हमारी एक उत्कृष्ट पीढ़ी का पूरा जीवन समाया हुआ है। तो ये आज हमारा भी संकल्प हो सकता है कि इन यादों को केवल बातचीत तक सीमित न रहने दिया जाए। उन्हें किस्सों, कथाओं, संस्मरणों, लेखों, कविताओं और लोकगीतों के रूप में सुरक्षित किया जाए। हो सके तो हम सभी, सामाजिक सरोकार से जुड़ी बातों को, किस्सों कहानियों को, एक आधुनिक रील की शक़्ल में लिखें ताकि नई पीढ़ी उसे पसंद करे। यही सोच अब अमर संदेश की एक नई सांस्कृतिक पहल का आधार बन रही है।
जरूरत है कि इन यादों को केवल बातचीत तक सीमित न रहने दिया जाए।
उन्हें किस्सों, कथाओं, संस्मरणों, लेखों, कविताओं और लोकगीतों के रूप में सुरक्षित किया जाए।
यही सोच अब अमर संदेश की एक नई सांस्कृतिक पहल का आधार बन रही है।
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अमर संदेश अपने पाठकों से विशेष आग्रह करता है कि यदि आपके पास अपने दादा-दादी, नाना-नानी या बुजुर्गों के समय की कोई ऐसी कहानी, परंपरा, सामाजिक प्रसंग, विवाह की रस्म, लोकगीत या सांस्कृतिक स्मृति है, जो आज धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है, तो उसे अपने तक सीमित न रखें।
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हमें विश्वास है कि समाज में अनेक ऐसी प्रतिभाएं हैं, जिनके पास अपनी मिट्टी और अपनी संस्कृति से जुड़ी अनमोल स्मृतियां हैं। जरूरत केवल उन्हें सामने लाने की है।
संस्कृति को बचाना केवल भावनात्मक नहीं, सामाजिक दायित्व है
देवभूमि उत्तराखंड की विलुप्त होती लोक परंपराओं को सहेजना केवल अतीत को याद करना नहीं है। यह आने वाली पीढ़ी को उसकी पहचान से जोड़ने का प्रयास है।
आधुनिकता के साथ आगे बढ़ना जरूरी है, लेकिन अपनी जड़ों को साथ लेकर चलना भी उतना ही जरूरी है। हमारी अगली पीढ़ी का यह अधिकार है कि वह केवल आधुनिक दुनिया को ही न जाने, बल्कि यह भी जाने कि उसके दादा-दादी और नाना-नानी किस सामाजिक परिवेश में पले-बढ़े थे, उनके गांव कैसे थे, रिश्ते कैसे निभाए जाते थे, विवाह कैसे होते थे और समाज में आपसी सहयोग की भावना किस तरह जीवन का हिस्सा थी।
इसी उद्देश्य से अमर संदेश की यह “अमर पहल” और “अमर प्रयास” केवल एक समाचार अभियान नहीं, बल्कि अपनी सामूहिक सांस्कृतिक स्मृतियों को सुरक्षित करने का एक छोटा-सा प्रयास है।
धर्मेंद्र तिवारी जी से हुई मुलाकात ने इस सोच को और मजबूती दी, लेकिन यह यात्रा किसी एक व्यक्ति की नहीं है। यह हम सबकी साझा यात्रा है।
तो आइए, अपनी स्मृतियों के उस खजाने को खोलिए, जो शायद आपके घर की किसी पुरानी संदूकची, किसी बुजुर्ग की याद या किसी भूले-बिसरे लोकगीत में आज भी सुरक्षित है।
उसे शब्द दीजिए।
उसे साझा कीजिए।
उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाइए।
क्योंकि
पद कितना भी बड़ा हो जाए, अपनी मिट्टी से बड़ा कुछ नहीं।
पद व्यक्ति को जिम्मेदारी देता है, लेकिन संस्कार उसे पहचान देते हैं।
और जो अपनी जड़ों को संभालकर रखता है, वही आने वाली पीढ़ी को अपनी असली पहचान सौंप पाता है।@अमर संदेश प्रयास
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