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समुद्र की लहरों में स्त्री संघर्ष की गूंज, रुपिंदर बरार के पहले उपन्यास ‘कोरल्स ब्लूम अगेन’ ने छेड़ी नई बहस

तीन मूर्ति भवन में पुस्तक का लोकार्पण, पर्यावरणीय संकट, महिला अस्मिता और भारत-अफ्रीका के सांस्कृतिक संबंधों पर साहित्यकारों, न्यायविदों और विशेषज्ञों ने रखे विचा

अमर संदेश

नई दिल्ली। प्रशासनिक अनुभव जब साहित्यिक संवेदना से मिलता है, तो रचना केवल कल्पना का विस्तार नहीं रहती, बल्कि समाज और समय के अनकहे सवालों को अभिव्यक्ति देने का माध्यम बन जाती है। भारत सरकार के कोयला मंत्रालय में अपर सचिव एवं वरिष्ठ भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी रुपिंदर बरार के प्रथम उपन्यास ‘कोरल्स ब्लूम अगेन’ का लोकार्पण इसी रचनात्मक संगम का साक्षी बना। प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय, तीन मूर्ति भवन के सभागार में आयोजित समारोह में बरार की साहित्यिक शुरुआत ने पर्यावरण, महिला संघर्ष और मानवीय मूल्यों से जुड़े व्यापक विमर्श को जन्म दिया।

श्रीमती रुपिंदर बरार की रचनात्मक यात्रा का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उनके उपन्यास की पृष्ठभूमि वास्तविक जीवन के अनुभवों और व्यापक शोध से जुड़ी है। आउटलुक की पूर्व संपादक चिंकी सिन्हा के साथ संवाद में बरार ने बताया कि तंजानिया में बिताए वर्षों ने उन्हें इस कहानी की ओर प्रेरित किया।

घायल मछुआरों से संबंधित एक समाचार ने उन्हें ‘ब्लास्ट फिशिंग’ की विनाशकारी पद्धति की ओर ध्यान दिलाया। बाद में उन्हें पता चला कि विस्फोटकों के माध्यम से मछली पकड़ने की यह गतिविधि समुद्री जीवन और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है। बरार ने यह भी बताया कि ऐसी गतिविधियां पूर्वी अफ्रीका तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारत के कुछ हिस्सों, जैसे केरल में भी देखने को मिलती हैं।

उपन्यास का काल्पनिक द्वीप मिजिंगा इसी अनुभव और शोध से आकार लेता है। बरार ने कथा में भारत और पूर्वी अफ्रीका के ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंधों को भी स्थान दिया है। उनके अनुसार, केन, माया और अन्य पात्र पिछले दो-तीन वर्षों से उनकी रचनात्मक दुनिया का हिस्सा रहे हैं और धीरे-धीरे उन्हें वास्तविक जीवन के परिचित लोगों की तरह लगने लगे।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा ने लेखिका को बधाई देते हुए कहा कि उपन्यास में भावनात्मक गहराई के साथ पर्यावरण के महत्व को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

 

झारखंड में महिलाओं के जीवन को करीब से देखने के अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने महिलाओं की दबाई गई आकांक्षाओं और समाज में उनकी बेहतर भागीदारी की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि गंभीर विषयों को उठाने के बावजूद उपन्यास सहज और पठनीय बना रहता है।

भूगोल, सामाजिक एकजुटता, जलवायु परिवर्तन और आदिवासी अधिकारों जैसे विषयों का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्ति मिश्रा ने कथा की व्यापक सामाजिक पृष्ठभूमि को रेखांकित किया। उनकी टिप्पणी ने उपन्यास को केवल पर्यावरणीय कथा के बजाय सामाजिक संवेदनाओं से जुड़ी साहित्यिक अभिव्यक्ति के रूप में देखने का अवसर प्रदान किया।

उन्होंने कहा कि भारत और अफ्रीका के बहुआयामी संबंधों की पृष्ठभूमि में माया के चरित्र को प्रस्तुत करना समकालीन महिला लेखन के महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाता है। उन्होंने रुपिंदर बरार के प्रशासनिक अनुभव को कथा की दृष्टि और विश्वसनीयता से भी जोड़ा।

इस परिचर्चा में महिला पात्रों के माध्यम से सामाजिक संरचनाओं, संघर्ष और आत्मनिर्णय के प्रश्नों पर भी ध्यान केंद्रित हुआ।

रणवीर बरार ने रसोई और पर्यावरण के रिश्ते को जोड़ा

प्रसिद्ध शेफ रणवीर बरार ने भोजन और रसोई को सामाजिक संरचनाओं तथा लैंगिक संबंधों से जोड़ते हुए एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि रसोई केवल भोजन तैयार करने की जगह नहीं, बल्कि सामाजिक परंपराओं और जीवन-पद्धतियों को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है।

उन्होंने भोजन के जरिए पर्यावरण संरक्षण की समझ विकसित करने पर जोर दिया। उनके अनुसार, संरक्षण की भावना मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों में

शामिल है और कई बार टिकाऊ भविष्य की राह उन जीवन-पद्धतियों की ओर लौटने में भी छिपी होती है, जिन्हें पिछली पीढ़ियां अपनाती रही हैं।

डॉ. अमित कौर पुरी ने समझाई कोरल की वैज्ञानिक दुनिया

एथ्नोबॉटनिस्ट डॉ. अमित कौर पुरी ने कोरल रीफ की संरचना और समुद्री पारिस्थितिकी में उसकी भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने दर्शकों के सामने सवाल रखा कि कोरल वास्तव में चट्टानें हैं या पौधे।

उन्होंने बताया कि कोरल जीवित पॉलीप होते हैं, जो शैवाल के साथ सहजीवी संबंध में रहते हैं। यही संबंध उनके विशिष्ट रंग और संरचना का आधार बनता है, जबकि उनकी संरचना कैल्शियम कार्बोनेट से निर्मित होती है। दुनिया में कोरल की 6,000 से अधिक प्रजातियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अनेक प्रजातियों की खोज और अध्ययन अभी शेष है।

‘ब्लास्ट फिशिंग’ के संदर्भ में उन्होंने बताया कि विस्फोटकों के जरिए मछली पकड़ने की गतिविधियां मछलियों के साथ कोरल से जुड़े शैवाल को भी नुकसान पहुंचाती हैं। इससे कोरल ब्लीचिंग की स्थिति पैदा हो सकती है और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन प्रभावित होता है।

उन्होंने लक्षद्वीप, कच्छ के रण तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के कोरल पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण को महत्वपूर्ण बताते हुए सामूहिक प्रयासों के माध्यम से समुद्री जीवन के पुनर्जीवन की उम्मीद जताई।

विनी म्वानजाला ने उठाया पारंपरिक ज्ञान और आदिवासी अधिकारों का प्रश्न

केन्या उच्चायोग की मंत्री विनी म्वानजाला ने आदिवासी अधिकारों तथा पूर्वजों से मिली प्रकृति संरक्षण की परंपराओं पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि पिछली पीढ़ियों के पास जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की गहरी समझ थी।

भारत और अफ्रीका के ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख करते हुए उन्होंने मसाला व्यापार तथा केन्या के तटीय क्षेत्रों में भारतीय समुदायों के बसने का संदर्भ दिया। उन्होंने कहा कि माताओं और दादियों-नानियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्राप्त टिकाऊ जीवन-पद्धतियों को भुलाने के बजाय उन्हें सम्मान और समृद्धि के साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

उनके विचारों ने उपन्यास में मौजूद प्रकृति, समुदाय और सांस्कृतिक विरासत के संबंधों को व्यापक सामाजिक संदर्भ प्रदान किया।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से तेजी से बदलते वर्तमान दौर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे समय में विचारोत्तेजक पुस्तकों का प्रकाशन और भी प्रासंगिक हो गया है।

प्रश्नोत्तर सत्र में पाठकों की जिज्ञासाओं से आगे बढ़ा विमर्श

कार्यक्रम के समापन पर आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में दर्शकों ने लेखिका रुपिंदर बरार तथा परिचर्चा में शामिल वक्ताओं से उपन्यास और उससे जुड़े विभिन्न विषयों पर सवाल पूछे। समुद्री पर्यावरण, महिला संघर्ष, कथा की पृष्ठभूमि और प्रकृति संरक्षण से संबंधित विषयों पर संवाद हुआ।

समीक्षात्मक परिप्रेक्ष्य: ‘कोरल्स ब्लूम अगेन’ का विमोचन साहित्य के माध्यम से पर्यावरणीय चेतना और मानवीय संवेदनाओं को जोड़ने का अवसर बना। रुपिंदर बरार की पहली कृति ने समुद्री पारिस्थितिकी के वैज्ञानिक प्रश्नों, महिला जीवन के संघर्षों और भारत-अफ्रीका की सांस्कृतिक विरासत को एक साझा साहित्यिक विमर्श में प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के वक्ताओं की भागीदारी ने यह स्पष्ट किया कि प्रकृति संरक्षण का सवाल विज्ञान, समाज, संस्कृति और मानवीय मूल्यों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

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