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राष्ट्रीय संगोष्ठी में जलवायु परिवर्तन एवं आजीविका पर हुआ व्यापक विमर्श

मोल्यार रिसोर्स फाउंडेशन एवं एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय द्वारा आयोजन

श्रीनगर (गढ़वाल), 19 मई । मोल्यार रिसोर्स फाउंडेशन, नई दिल्ली के सौजन्य से हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर (गढ़वाल), उत्तराखण्ड में “जलवायु परिवर्तन का आजीविका पर प्रभाव एवं उनके सतत समाधान” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। संगोष्ठी का ज्ञान-तकनीकी सहयोग ग्रामीण प्रौद्योगिकी विभाग, एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान किया गया।

संगोष्ठी का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। कार्यक्रम का मंच संचालन विभाग के शोधछात्रों अंकित सती, प्रतिभा रावत एवं नवदीप सिंह द्वारा किया गया।

मोल्यार रिसोर्स फाउंडेशन की अध्यक्ष श्रीमती परिधि भंडारी एवं मुख्य समन्वयक श्री दुर्गा सिंह भंडारी ने कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. मनमोहन सिंह रौथाण, विशिष्ट अतिथि श्री सुभाष नेगी (डीआईजी, सीमा सशस्त्र बल) सहित सभी अतिथियों का स्वागत किया।

संगोष्ठी का संचालन संयोजक एवं विभागाध्यक्ष, ग्रामीण प्रौद्योगिकी विभाग, प्रो. आर.एस. नेगी ने किया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन के कारण पर्वतीय कृषि में उत्पन्न संकटों, पारंपरिक फसलों की क्षति एवं असंतुलित मौसम की स्थिति पर विस्तार से प्रकाश डाला।

मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. रौथाण ने कहा कि जलवायु परिवर्तन कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि औद्योगिक क्रांति के बाद से आरंभ हुई सतत प्रक्रिया है। उन्होंने वनों की कटाई और अनियंत्रित औद्योगीकरण को इसके प्रमुख कारण बताते हुए छात्रों से पर्यावरण संरक्षण हेतु वृक्षारोपण और सतत समाधानों को अपनाने का आह्वान किया।

विशिष्ट अतिथि सुभाष नेगी ने सीमांत क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न सुरक्षा एवं आजीविका संबंधी चुनौतियों को रेखांकित करते हुए सामुदायिक जागरूकता और पूर्व चेतावनी प्रणाली की आवश्यकता बताई।

यू.पी.ई.एस. देहरादून की सहायक प्राध्यापिका डॉ. मधुबेन शर्मा ने सस्टेनेबल एग्रीकल्चर, एग्रोफॉरेस्ट्री, सौर ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों को व्यावहारिक समाधान बताया। उन्होंने नीति निर्माण में शिक्षा संस्थानों की भूमिका को भी रेखांकित किया।

श्री दुर्गा सिंह भण्डारी ने कहा कि जब तक समुदाय योजनाओं में भागीदारी नहीं निभाएगा, तब तक स्थायी समाधान संभव नहीं हैं। उन्होंने विकास में सामुदायिक सहभागिता को आवश्यक बताया।

शक्ति थपलियाल, प्रबंध निदेशक, देवस्थली पी.जी. कॉलेज ने शैक्षणिक संस्थानों को परिवर्तन के वाहक के रूप में देखने की आवश्यकता पर बल देते हुए वृक्षारोपण को एक प्रभावी जन-सहभागी समाधान बताया।

उद्घाटन सत्र का धन्यवाद ज्ञापन संगोष्ठी के सह-संयोजक डॉ. संतोष सिंह ने किया। संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के प्रो. एच.सी. नैनवाल, प्रो. आर.के. मैखुरी, प्रो. जे.एस. चौहान, डॉ. वी.के. पुरोहित, डॉ. डी.के. राणा, डॉ. जे.एस. बुटोला, डॉ. के.एन. शाह, डॉ. विवेक सिंह, डॉ. सिमरन सैनी सहित विभिन्न विभागों – ग्रामीण प्रौद्योगिकी, उद्यानिकी, वन विज्ञान, योग विज्ञान एवं समाजशास्त्र – से जुड़े शोधार्थियों एवं छात्रों ने सक्रिय भागीदारी की।

सत्रों में विद्यार्थियों द्वारा प्रश्न पूछे गए तथा विषयों पर गहन संवाद हुआ, जिससे उनका शैक्षणिक उत्साह परिलक्षित हुआ।

अंत में प्रो. आर.एस. नेगी ने समापन धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन का समाधान केवल वैज्ञानिक शोध नहीं, बल्कि सामाजिक सहभागिता, नैतिक जागरूकता और पर्यावरणीय संवेदनशीलता के सामंजस्य से ही संभव है।

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