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शब्दभूमि प्रकाशन के राष्ट्रीय संगोष्ठी में डिजिटल युग, मातृत्व और सामाजिक चुनौतियों पर गंभीर विमर्श

Amar sandesh कोलकाता।’मातृ दिवस’ के अवसर पर शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा आयोजित ‘माँ का पुनर्पाठ’ विषयक राष्ट्रीय आभासीय संगोष्ठी में देशभर के साहित्यकारों, शोधार्थियों, शिक्षकों और प्रतिभागियों ने मातृत्व की पारंपरिक एवं आधुनिक अवधारणाओं पर व्यापक चर्चा की। संगोष्ठी में डिजिटल युग में माँ की बदलती भूमिका, सोशल मीडिया का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव, बच्चों में मोबाइल की बढ़ती लत, दलित एवं श्रमजीवी माताओं का संघर्ष, हिंदी और तमिल साहित्य में मातृत्व का चित्रण तथा बच्चों के चरित्र निर्माण में माँ की भूमिका जैसे विषय केंद्र में रहे।

कार्यक्रम का आरंभ संयोजिका ईशा साव ने दिनकर की कविता से करते हुए कहा कि भारतीय साहित्य और समाज में माँ को सदियों से प्रेम, करुणा, त्याग और ममता की प्रतिमूर्ति माना गया है, लेकिन समकालीन साहित्य अब माँ की पारंपरिक छवि का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है। उन्होंने कहा कि आधुनिक दौर में माँ केवल परिवार के लिए समर्पित स्त्री नहीं बल्कि संघर्षशील और आत्मनिर्भर व्यक्तित्व के रूप में भी सामने आई है।

संगोष्ठी में ‘डिजिटल युग की माँ : सोशल मीडिया, मानसिक दबाव और नई चुनौतियाँ’ विषय पर अपना विचार रखते हुए डॉ. लिट्टी योहान्नान ने कहा कि आज की माँ तकनीक, परिवार, नौकरी और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाने के लिए निरंतर संघर्ष कर रही है। सोशल मीडिया पर ‘परफेक्ट मदर’ की छवि महिलाओं पर मानसिक दबाव बढ़ा रही है, जिससे उनमें अपराधबोध, अकेलापन और तनाव जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। आगे उन्होंने कहा, वास्तविक जीवन में माँ आर्थिक दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियों और मानसिक तनाव से गुजरती है, लेकिन सोशल मीडिया की कृत्रिम दुनिया उसे अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए मजबूर कर दिया है।.

आशीष अम्बर (दरभंगा) ने अपना अनुभव साझा करते हुए माताओं को जागरूक बनने और बच्चों को सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ने की सलाह दी।

शोधार्थी मुकेश राम ने मुंशी प्रेमचंद के कथा साहित्य पर आधारित अपने वक्तव्य में दलित और गरीब माताओं के संघर्ष को ‘कफन’, ‘ठाकुर का कुआं’ और ‘गोदान’ जैसी रचनाओं के माध्यम से रेखांकित करते हुए प्रेमचंद के मातृत्व पात्रों को सामाजिक अन्याय, गरीबी और जातिगत पीड़ा के संदर्भ में चित्रित किया।

माँ के चित्रण पर अपना वक्तव्य रखते हुए डॉ. बी. मल्लिका ने कहा कि साहित्य में माँ का चरित्र त्याग और वात्सल्य के साथ-साथ आत्मसम्मान, संघर्ष और सामाजिक चेतना का भी प्रतीक रहा है। डॉ. मल्लिका हिंदी और तमिल के कई कहानियों और साहित्यिक पात्रों के उदाहरण देकर बताया कि भारतीय साहित्य में मातृत्व की अवधारणा लगातार विकसित हो रही है।

संगोष्ठी के दौरान बच्चों में मोबाइल की बढ़ती लत और डिजिटल दुनिया के प्रभाव पर भी चिंता व्यक्त की गई। कई प्रतिभागियों ने कहा कि सोशल मीडिया के कारण परिवारों में संवाद कम हो रहा है और बच्चे वास्तविक जीवन से दूर होते जा रहे हैं। संस्कृतकर्मी राजेश ने इस पर सुझाव दिया कि माता-पिता बच्चों को खेल, पुस्तकों और रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ें तथा स्वयं भी मोबाइल के उपयोग में संयम बरतें।

कार्यक्रम में कविता पाठ और मुक्त संवाद का भी आयोजन हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने माँ की ममता, संस्कार और त्याग पर आधारित रचनाएँ प्रस्तुत कीं। वक्ताओं ने कहा कि माँ को आदर्श के ऊंचे मंच पर अकेला छोड़ने के बजाय उसकी वास्तविक समस्याओं, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक दबावों को समझना समय की आवश्यकता है।

अंत में संचालिका ने सभी प्रतिभागियों और वक्ताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मातृत्व को समझने के लिए साहित्य, समाज और तकनीक तीनों के बीच संतुलित संवाद आवश्यक है।

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