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देवभूमि उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में परंपराओं को निभाते नजर आते हैं ग्रामीण 

सी एम पपनै

देवभूमि उत्तराखंड पर्वतीय ग्रामीण अंचल की ऊंची चोटियों में देवी थान तथा लगभग प्रत्येक गांव के सरहद में भूमि देवता भूमिया तथा न्याय के देव ग्वेल जिन्हें गोलू देवता भी पुकारा जाता है उक्त देवी देवताओं के थान बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं। उक्त निर्मित थानों जिन्हें आम बोली-भाषा में मंदिर कहा जाता है, ग्रामीण अंचल के रहवासियों का उक्त मंदिरों के देवी-देवताओं पर एक रक्षक, पालक व न्याय देवता के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी पूर्ण निष्ठा व विश्वास बना रहा है, ग्रामीण रहवासियों द्वारा उक्त थानों मंदिरों में श्रद्धा पूर्वक सामूहिक रूप में विशेष अवसरों पर पूजा अर्चना की जाती रही है।

वैशाख मास माह अप्रैल-मई में ग्रामीण अंचल के रहवासियों में सौर नववर्ष का उत्साह देखा जा सकता है। साथ ही ग्रामीण जन सामूहिक रूप से उक्त थानों मंदिरों में वैशाख पहली गति को स्थापित देवी थान में, दूसरी गति को न्याय के मान्य देव ग्वेल देवता तथा तीसरी गति को भूमिया देवता के थान मंदिर में सामूहिक रूप में पूजा अर्चना पीढ़ी दर पीढ़ी की जाती रही है।अ

उत्तराखंड के अल्मोड़ा और नैनीताल जिलों के सीमांत कस्बे भतरौंजखान के इर्द-गिर्द के गांवों भतरौंज, च्योनी, नौघर, तौराड़, वीनाकोट, दनपौ, लौकोट, रीची तथा थापल में वैशाख मास की पहली, दूसरी और तीसरी गति को क्रमशः निर्मित देवी थान, ग्वेल ज्यू और भूमिया देवता के मंदिरों में भव्य पूजा अर्चना और मेलों का आयोजन ग्रामीण स्तर पर बड़े धूमधाम व प्रभावी अंदाज में आयोजित किया गया।

स्थानीय फलक पर आयोजित मेलों में पुरुषों महिलाओं और नौनिहालों की बड़ी संख्या में उपस्थित देखी गई। पुरुष व महिला दलों द्वारा अलग-अलग सामूहिक रूप में अंचल का सुप्रसिद्ध व सुसज्जित झोड़ा नृत्य- गान मंचित किया गया।

भतरौंज गांव के भूमिया देवता के थान मंदिर में वैशाख तीसरी गति को लगे मेले में एक ओर जहां महिलाओं और पुरुषों के दल अलग-अलग टोलियों में मंदिर प्रांगण में झोड़ा नृत्य-गान में मसगूल रहे वहीं मंदिर से जुड़े क्षेत्र पटवारी चौकी के खुले प्रांगण के बाहर गांव के कुछ पुरुष व युवा एक और दो रुपयों के सिक्कों के साथ गुच्ची खेलते हुए देखे गए। बदलते

आधुनिक युग की गतिविधियों के इस युग में उक्त गुच्ची खेल के बावत पूछने पर गांव के बुजुर्गों से अवगत हुआ उक्त खेल जुए के तहत नहीं सिर्फ एक परंपरा, मनोरंजन व बचपन की यादों को तरोताजा रखने हेतु नियम पूर्वक खेला जाता है। संध्या आगमन के साथ ही ग्रामीण जन अपने-अपने घरों को प्रसाद ग्रहण कर, देवी देवताओं का आशीर्वाद लेकर प्रशन्न मुद्रा में घर वापसी की ओर कदम बढ़ात नजर आए।

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