Amar sandesh नई दिल्ली।देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया है कि पैदल चलने वालों का अधिकार भी संविधान द्वारा संरक्षित है और फुटपाथ मूल रूप से आम नागरिकों के सुरक्षित आवागमन के लिए बनाए जाते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत दिखाई देती है। देश के अनेक शहरों और कस्बों में फुटपाथ अतिक्रमण, अवैध पार्किंग और अस्थायी कब्जों की चपेट में हैं, जिसके कारण आम नागरिकों को जान जोखिम में डालकर सड़कों पर चलना पड़ रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब न्यायालय ने पैदल यात्रियों के अधिकारों को मान्यता दी है, तो इन अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? नगर निगम, स्थानीय प्रशासन, पीडब्ल्यूडी, यातायात पुलिस, यह संबंधित क्षेत्र की थाने की पुलिस और अन्य संबंधित विभागों की जिम्मेदारी तय होने के बावजूद कई स्थानों पर फुटपाथों पर लगातार कब्जे बने रहते हैं।
नागरिकों का कहना है कि फुटपाथों पर बढ़ते अतिक्रमण के कारण बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और दिव्यांगजन सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उन्हें सड़क पर चलने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अभियान चलाकर अतिक्रमण हटाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि नियमित निगरानी, जवाबदेही और दीर्घकालिक व्यवस्था की आवश्यकता है। जब तक संबंधित विभागों की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से तय नहीं होगी और नियमों का सख्ती से पालन नहीं होगा, तब तक पैदल यात्रियों को उनका वास्तविक अधिकार नहीं मिल पाएगा।
जनता पूछ रही है…
फुटपाथ पर कब्जों की जिम्मेदारी किसकी है?
पैदल यात्रियों के अधिकारों की रक्षा कौन करेगा?
अतिक्रमण हटाने के बाद दोबारा कब्जे क्यों हो जाते हैं?
क्या संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
“यदि फुटपाथ पर चलना मौलिक अधिकार है, तो उस अधिकार की रक्षा सुनिश्चित करना भी शासन और प्रशासन की संवैधानिक जिम्मेदारी है।?