दिल्ली

युवाओं की लोकतांत्रिक भागीदारी राष्ट्र निर्माण के लिए जरूरी है – मनोज तिवारी*

भारतीय ज्ञान परंपरा भारत की पहचान है – पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ*

 लाल कॉलेज (सांध्य) में तर्क शास्त्र युवा संसद का दो दिवसीय आयोजन‌

Amar sandesh पूर्वी दिल्ली।श्याम लाल कॉलेज (सांध्य), दिल्ली विश्वविद्यालय में तर्क शास्त्र युवा संसद एवं आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (IQAC) के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय “तर्क शास्त्र युवा संसद” का आयोजन किया गया है।

कॉलेज के प्राचार्य प्रो. नचिकेता सिंह ने दोनों मुख्य अतिथियों के साथ सभी का स्वागत करते हुए अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि शिक्षा, युवा सहभागिता और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ आज के दौर में संसदीय मूल्यों के महत्त्व को भी पहचानने की जरूरत है।

IQAC समन्वयक प्रो. प्रमोद कुमार द्विवेदी ने आधुनिकता और परंपरा के आलोक में शैक्षणिक उपयोगिता और तर्कशक्ति के विकास पर बल दिया। NCERT से आईं मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञ मिस. सुनीला ने ऐसे युवा संसद होते रहने पर बल दिया।

मुख्य अतिथि लोकसभा सांसद श्री मनोज तिवारी ने युवाओं की लोकतांत्रिक भागीदारी और राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज हमें संवाद की संस्कृति को अपनाने के बेहद जरूरत है। उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक सहभागिता और विचार-विमर्श की महत्ता पर भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने अंत में श्याम लाल कॉलेज (सांध्य) के सर्वांगीण विकास में अपनी तरफ से हर संभव सहयोग करने का भरोसा दिलाया।

अंत में प्रो.आदित्य प्रकाश त्रिपाठी ने मुख्य अतिथि के साथ सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में युवाओं और संसदीय कार्यप्रणाली की महती भूमिका होगी।

दूसरे दिन के समापन समारोह के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने अपने संबोधन में भारतीय परंपरा और संस्कृति आदि विषयों पर विस्तार से अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत की असली पहचान भारतीय ज्ञान परंपरा है।

प्रो.संगीता ढाल ने आयोजकों को इस आयोजन की बधाई देते हुए कहा कि आपको मन की बात से कर्म की बात तक की यात्रा करने से ही सफलता के नए रास्ते मिलेंगे।
इस समापन सत्र में ऋतिक सिंह ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस समारोह में विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता रही,जिससे यह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस समारोह का उद्देश्य विद्यार्थियों में तर्कशीलता, नेतृत्व क्षमता तथा संसदीय जागरूकता को बढ़ावा देना था।

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