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प्रोफेसर हंसराज सुमन
भारतीय चिंतन परंपरा में जब भी आधुनिक युग के महान ऋषि-दार्शनिकों का स्मरण किया जाता है, तो उसमें श्री अरविन्द घोष का नाम अग्रणी पंक्ति में लिया जाता है। श्री अरविन्द केवल एक दार्शनिक ही नहीं थे बल्कि वे एक महान क्रांतिकारी, कवि, योगी, राष्ट्र-चिंतक और मानवता के सच्चे हितैषी भी थे। उनका जीवन एक ऐसी यात्रा है जो पश्चिमी शिक्षा से आरंभ होकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के क्रांतिकारी दौर से गुज़रती हुई, अंततः अध्यात्म और अतिमानस ( Supermind ) की गहनतम अनुभूतियों तक पहुँचती है। यही कारण है कि उन्हें ” मानवतावादी दर्शन का पर्याय ” कहा जाता है क्योंकि उनके संपूर्ण चिंतन का केंद्र बिंदु मनुष्य था, मनुष्य की चेतना का विकास था, और मनुष्यता को दिव्यता की ओर ले जाने की आकांक्षा थी।
श्री अरविन्द का जन्म 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता में हुआ था। उनके पिता डॉ. कृष्णधन घोष पाश्चात्य सभ्यता से अत्यंत प्रभावित थे और वह चाहते थे कि उनका पुत्र पूर्णतः अंग्रेज़ी संस्कारों में ढलें। इसी कारण अत्यंत बाल्यावस्था में ही अरविन्द को इंग्लैंड भेज दिया गया, जहाँ उन्होंने सेंट पॉल्स स्कूल और कैंब्रिज विश्वविद्यालय के किंग्स कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की। यह विडंबना ही है कि जिस बालक को पूर्णतः पाश्चात्यीकृत करने का प्रयास किया गया, वही आगे चलकर भारतीय आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रवाद का सबसे प्रखर स्वर बनकर उभरे। इंग्लैंड में चौदह वर्ष बिताने के पश्चात जब वे 1893 में भारत लौटे, तो उनके भीतर एक गहरी आध्यात्मिक प्यास और राष्ट्र-प्रेम की चिंगारी जल चुकी थी। राष्ट्रवाद की जड़ें उनके हृदय में गहराती जा रही थी । वे अपने इस देश के लिए कुछ करना चाहते थे ।
श्री अरविन्द का दर्शन पारंपरिक शंकराचार्य के मायावादी अद्वैत से भिन्न है। शंकर के लिए जगत माया है, भ्रम है, जिससे मुक्ति पाकर ब्रह्म में लीन होना ही जीवन का लक्ष्य है। किंतु श्री अरविन्द इस दृष्टिकोण को अधूरा मानते हैं । उनके अनुसार ब्रह्म केवल निर्गुण-निराकार सत्ता नहीं, अपितु वह सृष्टि में सक्रिय रूप से अभिव्यक्त होने वाली शक्ति भी है। जगत माया नहीं, अपितु ब्रह्म की ही लीला और अभिव्यक्ति है। यही कारण है कि उनके दर्शन को ” एकात्मवादी अद्वैतवाद ” या ” Integral Advaita ” कहा जाता है — जिसमें आत्मा और जगत, अध्यात्म और भौतिकता, चेतना और पदार्थ के बीच कोई मौलिक विरोध नहीं, अपितु एक अविच्छिन्न सातत्य है।
श्री अरविन्द के दर्शन की सबसे मौलिक और क्रांतिकारी अवधारणा है ” अतिमानस ” या ” Supermind “। उनके अनुसार मनुष्य की वर्तमान मानसिक चेतना विकास की अंतिम अवस्था नहीं है। जिस प्रकार पदार्थ से जीवन का, और जीवन से मन का विकास हुआ, उसी प्रकार मन से भी एक उच्चतर चेतना — अतिमानस — का विकास होना शेष है। यह अतिमानस वह दिव्य सत्य-चेतना है जो पूर्ण ज्ञान, पूर्ण आनंद और पूर्ण एकता में स्थित है। श्री अरविन्द का विश्वास था कि मनुष्य आज विकास की उस सीमा-रेखा पर खड़ा है, जहाँ से वह चेतन प्रयास द्वारा अतिमानस को धरती पर अवतरित कर सकता है, और इस प्रकार मानव-जाति का दिव्य मानव ( Gnostic Being ) में रूपांतरण संभव है ।अपने इस दार्शनिक दृष्टिकोण को व्यावहारिक साधना में बदलने के लिए श्री अरविन्द ने ” पूर्ण योग ” या ” Integral Yoga ” की स्थापना की। परंपरागत योग पद्धतियाँ — ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, हठयोग — प्रायः जीवन से पलायन कर मोक्ष प्राप्ति पर केंद्रित रही हैं। किंतु श्री अरविन्द का पूर्ण योग जीवन से पलायन नहीं, अपितु जीवन के रूपांतरण की साधना है। इसका लक्ष्य केवल व्यक्तिगत मुक्ति नहीं, अपितु सम्पूर्ण अस्तित्व — शरीर, प्राण, मन और आत्मा — का दिव्यीकरण है। यही कारण है कि उनका आश्रम पांडिचेरी में केवल ध्यान-साधना का केंद्र नहीं है ,अपितु शिक्षा, कला, विज्ञान और सामाजिक जीवन के समन्वित विकास का प्रयोगशाला बना। जहाँ व्यक्ति के व्यक्तित्त्व का विकास करना है।
श्री अरविन्द का दर्शन संकीर्ण साम्प्रदायिकता या धार्मिक कट्टरता से सर्वथा मुक्त है । उनके लिए धर्म का अर्थ किसी विशेष पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानव-जाति की चेतना का उत्थान है । अपनी कृति ” द ह्यूमन साइकल ” ( The Human Cycle ) में उन्होंने मानव सभ्यता के विकास के विभिन्न चरणों — प्रतीकात्मक, प्रकारिक, व्यक्तिवादी और आत्मनिष्ठ युग — का विश्लेषण करते हुए यह प्रतिपादित किया कि मानव समाज की अंतिम नियति एक आध्यात्मिक युग की ओर उन्मुख होना है, जिसमें मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप — आत्मा — के अनुसार जीवन जिएगा। इसी प्रकार ” द आइडियल ऑफ ह्यूमन यूनिटी ” ( The Ideal of Human Unity ) में उन्होंने विश्व-एकता, अंतरराष्ट्रीयता और मानव-भाईचारे की परिकल्पना प्रस्तुत की, जो राष्ट्रों की सीमाओं से परे जाकर एक विश्व-संघ की स्थापना की बात करती है। यही उनके दर्शन को मानवतावाद का पर्याय बनाता है — क्योंकि उनके चिंतन के केंद्र में सदैव मनुष्य की समग्र मुक्ति और उसकी चेतना का सार्वभौमिक विकास रहा है।
श्री अरविन्द की सर्वाधिक महत्वपूर्ण दार्शनिक कृति ” द लाइफ डिवाइन ” ( The Life Divine ) है, जिसमें उन्होंने अपने संपूर्ण अध्यात्म-दर्शन को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया है। इस ग्रंथ में वे यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि सृष्टि का उद्देश्य पदार्थ में चेतना का क्रमिक विकास और अंततः दिव्य जीवन की स्थापना है। यह ग्रंथ पश्चिमी दर्शन के द्वैतवाद और पूर्वी दर्शन के मायावाद — दोनों की सीमाओं को लांघकर एक समन्वित विश्व-दृष्टि प्रस्तुत करता है, जिसमें आत्मा और पदार्थ, स्वर्ग और पृथ्वी, अध्यात्म और विज्ञान — सबका सामंजस्य स्थापित होता है। श्री अरविन्द के जीवन का एक ऐसा अध्याय है जिसे प्रायः उनके आध्यात्मिक व्यक्तित्व की छाया में कम महत्व दिया जाता है, किंतु वास्तव में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और मौलिक है । वे भारतीय राजनीति में उग्र राष्ट्रवाद ( Extremist Nationalism) के प्रथम और सबसे प्रखर सैद्धांतिक प्रवक्ता माने जाते हैं। उनकी इस विचारधारा से उस समय बहुत से लोग प्रभावित भी हुए ।
इंग्लैंड से लौटने के पश्चात श्री अरविन्द ने बड़ौदा राज्य की सेवा में तेरह वर्ष बिताए। इसी काल में उन्होंने भारतीय भाषाओं, संस्कृति और इतिहास का गहन अध्ययन किया तथा उस समय की प्रसिद्ध ” इंदु प्रकाश ” पत्रिका में ” New Lamps for Old ” शीर्षक से लेखमाला लिखी, जिसमें उन्होंने कांग्रेस की तत्कालीन उदारवादी और प्रार्थना-याचना आधारित राजनीति की कटु आलोचना की। उनका स्पष्ट मत था कि अंग्रेज़ी शासन से अनुनय-विनय द्वारा अधिकार माँगना व्यर्थ है, और स्वराज्य प्राप्ति के लिए जनता की सशक्त, संगठित और आत्मनिर्भर शक्ति का निर्माण आवश्यक है।
सन 1905 में लॉर्ड कर्ज़न द्वारा बंगाल के विभाजन ने समूचे राष्ट्र में आक्रोश की लहर उत्पन्न की। इसी घटना ने श्री अरविन्द को सक्रिय राजनीति में प्रवेश करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बड़ौदा की सेवा त्यागकर कलकत्ता के नेशनल कॉलेज के प्राचार्य का पद ग्रहण किया और स्वदेशी, बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। इसी दौर में उन्होंने ” बंदे मातरम् ” नामक अंग्रेज़ी दैनिक पत्र का प्रकाशन आरंभ किया, जो पूर्ण स्वराज्य की माँग करने वाला भारत का प्रथम समाचार-पत्र था। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने निर्भीकता से यह प्रतिपादित किया कि भारतीयों का लक्ष्य केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, अपितु पूर्ण स्वतंत्रता ( Purna Swaraj ) होना चाहिए — यह विचार उस समय अत्यंत क्रांतिकारी था, क्योंकि तब तक कांग्रेस का आधिकारिक लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासन ही था।
लाल-बाल-पाल की त्रयी (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल) के साथ श्री अरविन्द ने कांग्रेस के भीतर ” गरम दल ” (Extremist Party) का नेतृत्व किया। 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी गुटों के बीच जो ऐतिहासिक विभाजन हुआ, उसमें श्री अरविन्द की वैचारिक भूमिका निर्णायक थी। उनका मानना था कि निष्क्रिय
प्रार्थना-याचना की राजनीति के स्थान पर सक्रिय प्रतिरोध ( Passive Resistance ), बहिष्कार और आत्मनिर्भरता के माध्यम से ही स्वराज्य प्राप्त किया जा सकता है । उन्होंने राष्ट्रवाद को केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, अपितु एक धर्म — ” सनातन धर्म ” का ही एक रूप माना। उनके अनुसार भारत माता एक जीवंत आध्यात्मिक सत्ता है, और उसकी सेवा साक्षात् ईश्वर की उपासना के समतुल्य है । उत्तरपाड़ा में दिए गए अपने प्रसिद्ध भाषण में उन्होंने कहा था कि राष्ट्रवाद कोई राजनीतिक कार्यक्रम मात्र नहीं, बल्कि यह स्वयं धर्म है, जो ईश्वर से प्राप्त हुआ है और जिसके सहारे राष्ट्र अपनी रक्षा और उत्थान करेगा।
सन 1908 में मुज़फ्फरपुर बम कांड के पश्चात श्री अरविन्द को क्रांतिकारी गतिविधियों में संलिप्तता के संदेह में गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें अलीपुर जेल में लगभग एक वर्ष तक बंदी बनाकर रखा गया। कारावास का यह काल उनके जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। जेल में उन्हें गहन आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हुईं — विशेष रूप से भगवद्गीता के अध्ययन और वासुदेव-दर्शन के अनुभव ने उनके संपूर्ण जीवन-दृष्टिकोण को रूपांतरित कर दिया। उन्हें यह प्रतीति हुई कि जिस कारावास को वे बंधन समझ रहे थे, वह वास्तव में उनके आध्यात्मिक विकास हेतु एक दिव्य विधान था। मुकदमे से वे दोषमुक्त होकर रिहा हुए, परंतु इस अनुभव ने उनके भीतर यह दृढ़ विश्वास स्थापित कर दिया कि भारत की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक घटना नहीं, अपितु एक दिव्य प्रयोजन की पूर्ति है, और स्वयं उनका जीवन-लक्ष्य अब राजनीति से आध्यात्मिक साधना की ओर उन्मुख होना है।
1910 में श्री अरविन्द ने राजनीति से सक्रिय संन्यास लेकर फ्रांसीसी उपनिवेश पांडिचेरी की ओर प्रस्थान किया। किंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं रहा कि उन्होंने राष्ट्र-चिंतन का परित्याग कर दिया। पांडिचेरी में रहते हुए भी उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गहरी अभिरुचि बनाए रखी। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब सुभाषचंद्र बोस और अन्य क्रांतिकारी नेता उनसे परामर्श हेतु आए, तो उन्होंने राष्ट्रीय हित में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान किया। यह भी उल्लेखनीय है कि 15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ, वह दिन संयोगवश स्वयं श्री अरविन्द का जन्मदिन भी था — इसे अनेक अनुयायी एक दैवीय संकेत के रूप में देखते हैं, मानो नियति ने स्वयं इस उग्र राष्ट्रवाद के प्रथम प्रवक्ता को उसकी साधना की पूर्णता का साक्षी बनाया हो।
श्री अरविन्द के जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके यहाँ राजनीति और अध्यात्म कभी परस्पर विरोधी नहीं रहे, अपितु एक ही सत्य के दो आयाम रहे। जहाँ पश्चिमी विचारधारा राजनीति को पूर्णतः लौकिक और अध्यात्म को पूर्णतः पारलौकिक मानकर दोनों में विभाजन-रेखा खींचती है, वहीं श्री अरविन्द के लिए राष्ट्र की स्वतंत्रता स्वयं एक आध्यात्मिक साधना थी। उनके अनुसार भारत केवल भूमि का टुकड़ा नहीं, अपितु एक सजीव आध्यात्मिक शक्ति है, जिसका जागरण संपूर्ण मानवता के आध्यात्मिक भविष्य के लिए अनिवार्य है। यही कारण है कि उन्होंने भारत की स्वतंत्रता को विश्व-मानवता की सेवा से जोड़ा उनके अनुसार स्वतंत्र भारत का प्रयोजन केवल आत्म-शासन नहीं, अपितु विश्व को आध्यात्मिक नेतृत्व प्रदान करना था।
आज के युग में, जब मानवता भौतिकवाद, यंत्रीकरण, पर्यावरणीय संकट और वैचारिक विभाजनों से जूझ रही है, श्री अरविन्द का दर्शन एक समग्र समाधान प्रस्तुत करता है। उनका चिंतन न तो पूर्णतः भौतिकवादी है, जो मनुष्य को केवल पदार्थ मानकर उसकी आध्यात्मिक आवश्यकताओं की उपेक्षा करता है, और न ही पूर्णतः पलायनवादी अध्यात्म है, जो जीवन की वास्तविकताओं से मुँह मोड़ लेता है। उनका ” पूर्ण योग ” और “अतिमानस ” का सिद्धांत यह संदेश देता है कि मनुष्य की सच्ची प्रगति उसके भौतिक विकास में नहीं, अपितु उसकी चेतना के विकास में निहित है। शिक्षा, विज्ञान, कला, राजनीति और अर्थव्यवस्था — सभी क्षेत्रों में जब तक चेतना का उन्नयन नहीं होगा, तब तक मानवता की समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं। श्री अरविन्द का यह दृष्टिकोण भारतीय सभ्यता की उस प्राचीन परंपरा को पुनर्जीवित करता है, जिसमें व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और सृष्टि — सबको एक ही चेतना की अभिव्यक्ति माना जाता है। उनका दर्शन संकीर्ण राष्ट्रवाद और अंधाधुंध वैश्वीकरण — दोनों की सीमाओं से परे जाकर एक ऐसी दृष्टि प्रस्तुत करता है, जिसमें राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रखते हुए भी विश्व-मानवता की सेवा में समर्पित हो सके। यही कारण है कि आज पुनः भारतीय ज्ञान परंपरा ( Indian Knowledge Systems ) के पुनरुत्थान और विऔपनिवेशीकरण ( Decolonization ) के इस युग में श्री अरविन्द के चिंतन का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है — वे हमें यह स्मरण कराते हैं कि भारत की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल राजनीतिक संप्रभुता नहीं, अपितु मानसिक और आध्यात्मिक विऔपनिवेशीकरण भी है।
श्री अरविन्द का दर्शन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा मानवतावाद संकीर्ण भौतिकवाद में नहीं, अपितु मनुष्य की आध्यात्मिक संभावनाओं के पूर्ण विकास में निहित है। उनका संपूर्ण जीवन — बड़ौदा के अध्ययनशील वर्ष, बंगाल के क्रांतिकारी संघर्ष, अलीपुर जेल की आध्यात्मिक जागृति, और पांडिचेरी की योग-साधना — एक अखंड यात्रा है, जिसमें राष्ट्र-प्रेम और मानव-प्रेम, राजनीति और अध्यात्म, व्यक्तिगत मुक्ति और सामूहिक उत्थान — सब एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान भले ही अल्पकालिक रहा हो, किंतु उसने भारतीय राष्ट्रवाद को एक नई वैचारिक गहराई और आध्यात्मिक आधार प्रदान किया, जिसने आगे चलकर तिलक, सुभाष और अनेक क्रांतिकारियों को प्रेरित किया। और उनका दार्शनिक चिंतन ” जीवन दिव्य “, ” पूर्ण योग “, ” अतिमानस ” और ” मानव-एकता ” के सिद्धांत — आज भी मानवता को यह मार्ग दिखाता है कि सच्ची प्रगति केवल तकनीकी या आर्थिक उन्नति में नहीं, अपितु चेतना के दिव्य रूपांतरण में निहित है। यही कारण है कि श्री अरविन्द को केवल एक भारतीय दार्शनिक नहीं, अपितु समग्र मानवता के भविष्य-दृष्टा और मानवतावादी दर्शन का सच्चा पर्याय कहा जाता है ।
(लेखक , दिल्ली विश्वविद्यालय के अरबिंदो कॉलेज में प्रोफेसर व मीडिया विश्लेषक हैं )
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