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सीमांत से दिल्ली तक उत्तराखंड की आवाज:– भगत सिंह कोश्यारी की पहल

भगत सिंह कोश्यारी ने हरदीप पुरी से मुलाकात में पिथौरागढ़ के सीमांत गांवों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया

“सीमांत गांव देश के अंतिम नहीं, राष्ट्र की प्रथम पंक्ति के गांव हैं”

अमर चंद्र

नई दिल्ली।उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी से नई दिल्ली में आत्मीय भेंट कर उत्तराखंड, विशेषकर सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के विकास से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक चर्चा की।
मुलाकात के दौरान सीमांत एवं वाइब्रेंट विलेज क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को रोजगार, आजीविका, पर्यटन, बुनियादी सुविधाओं और केंद्र सरकार की विकास योजनाओं का अधिक प्रभावी लाभ दिलाने पर जोर दिया गया।


पिथौरागढ़ के सीमांत गांवों की गूंज पहुंची केंद्र तक
कोश्यारी ने कहा कि सीमांत गांवों को केवल देश के अंतिम गांव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ये गांव राष्ट्र की प्रथम पंक्ति हैं। इनका मजबूत और आत्मनिर्भर होना स्थानीय लोगों के भविष्य के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है।

युवाओं के रोजगार और पर्यटन पर जोर
सीमांत क्षेत्रों में पलायन रोकने के लिए रोजगार और स्वरोजगार के अवसर पैदा करना सबसे बड़ी आवश्यकता है। पर्यटन, स्थानीय संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देकर युवाओं को अपने गांव में ही बेहतर भविष्य उपलब्ध कराया जा सकता है।

उम्र के इस पड़ाव पर भी पहाड़ के लिए लगातार सक्रिय
भगत सिंह कोश्यारी उन वरिष्ठ नेताओं में हैं जिनका उत्तराखंड के गांवों और आमजन से जुड़ाव आज भी कायम है पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक दायित्व निभाने के बाद भी वे प्रदेश के विकास और पहाड़ की समस्याओं को लेकर लगातार सक्रिय नजर आते हैं।
गांव-गांव जाकर लोगों से संवाद करना हो या युवाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना कोश्यारी आज भी उत्तराखंड की नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं। राजनीतिक जीवन में उनकी लंबी यात्रा ने उन्हें उत्तराखंड के युवाओं के बीच एक अनुभवी मार्गदर्शक की पहचान भी दी है।
“सीमांत मजबूत होंगे, तो राष्ट्र और मजबूत होगा”
केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के सकारात्मक दृष्टिकोण एवं सहयोग के लिए आभार व्यक्त करते हुए कोश्यारी ने स्पष्ट किया कि सीमांत क्षेत्रों का विकास केवल उत्तराखंड का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रहित और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय है।
पिथौरागढ़ के सीमांत गांवों से उठी यह आवाज अब दिल्ली के नीति-निर्माण के केंद्र तक पहुंची है।

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