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देवभूमि की माटी से उठी सुरों की गूंज: लोक कलाकार भुवन रावत

अमर चंद्र

दिल्ली।देवभूमि उत्तराखंड केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता, पर्वतों और आध्यात्मिक धरोहर के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध लोक संस्कृति और मेहनतकश लोगों के लिए भी पूरे विश्व में पहचान रखता है। यहां के प्रवासी, चाहे देश में हों या विदेश में, अपने परिश्रम, प्रतिभा और संस्कारों से उत्तराखंड का नाम निरंतर ऊंचाइयों तक पहुंचा रहे हैं। राजनीति से लेकर सेना, कला से लेकर संस्कृति तक हर क्षेत्र में उत्तराखंडी प्रतिभाएं अपनी अलग पहचान बना रही हैं।

इसी सांस्कृतिक धारा को आगे बढ़ाने वाले एक सशक्त नाम हैं भुवन रावत जो आज दिल्ली-एनसीआर ही नहीं, बल्कि देश-विदेश में अपनी लोक गायकी और हुड़का वादन के लिए विशिष्ट पहचान रखते हैं।

 लोक संस्कृति के सच्चे साधक भुवन रावत

8 अक्टूबर 1994 से अपनी सांस्कृतिक यात्रा की शुरुआत करने वाले भुवन रावत, नई दिल्ली स्थित पर्वतीय कला केंद्र (जिसकी स्थापना प्रसिद्ध रंगकर्मी मोहन उप्रेती जी ने की थी) से जुड़े हुए हैं। यहां उन्होंने न केवल लोक गायन की बारीकियां सीखीं, बल्कि हुड़का वादन में भी अद्भुत दक्षता हासिल की।

उनकी कला केवल मंच तक सीमित नहीं रही बल्कि उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में उत्तराखंड की लोक संस्कृति का परचम लहराया है।

 अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गूंजती पहाड़ की आवाज

भुवन रावत ने कई प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया है, जिनमें शामिल हैं-

भारत रंग महोत्सव (भारंगम) पिछले 12 वर्षों से लगातार प्रस्तुति,अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला, दिल्ली (इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र द्वारा आयोजित)

नदी उत्सव इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र,सेरेन्डिपिटी आर्ट फेस्टिवल, गोवा

अब तक वे करीब 1500 से अधिक लोकगीतों की प्रस्तुति दे चुके हैं जो उनकी साधना, समर्पण और अनुभव का प्रमाण है।

 लोक गायन की विविध शैलियों में महारत

कुमाऊं अंचल की लगभग 54 प्रकार की लोक गायन शैलियों में पारंगत भुवन रावत, अपनी प्रस्तुति में परंपरा और रंगमंच का अद्भुत संगम प्रस्तुत करते हैं। उनकी प्रमुख शैलियां हैं-झोड़ा, चांचरी, न्योली, छपेली,बैर, बफौल, रमौल, मालूशाही,भगनौल, थड्या, चौफुलायुगल गीत, मंगल गीत, रितुरैण,कुमाऊनी रामलीला और होली गायन, रंगमंच का समर्पित कलाकारभुवन रावत ने पर्वतीय कला केंद्र, पार्वती कला मंच, प्रज्ञा, आवाहन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ मिलकर उत्तराखंड की लगभग 90% लोक गाथाओं और संगीतमय नाटकों में अपनी भागीदारी निभाई है। उनकी प्रस्तुतियां केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोक परंपराओं का जीवंत संरक्षण हैं।

एक कुशल कलाकार होने के साथ-साथ भुवन रावत एक बेहद सरल, मिलनसार और मेहनती व्यक्तित्व के धनी हैं। उनकी विनम्रता और समर्पण उन्हें केवल एक कलाकार ही नहीं, बल्कि समाज का प्रेरणास्रोत बनाते हैं।

भुवन रावत जैसे कलाकार आज के दौर में लोक संस्कृति के सच्चे संरक्षक हैं। जब आधुनिकता की दौड़ में परंपराएं पीछे छूटती जा रही हैं, तब ऐसे कलाकार अपनी जड़ों से जुड़े रहकर आने वाली पीढ़ियों को अपनी विरासत से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं।

ज्ञात हो भुवन रावत ने प्रज्ञा आर्ट ,संसद टीवी ,व थियेटर ओलंपिक मैं भी काम किया है। ओर गढ़वाली कुमाऊनी जौनसारी अकादेमी व नगर पालिका बागेश्वर उतरैणी मकरैणी उत्तराखंड के मंचों से भी लोक संस्कृति को जन जन पहुंचाने में प्रयासरथ है।कध्रकंपं

देवभूमि उत्तराखंड की यह आवाज आज न केवल पहाड़ों में, बल्कि देश-विदेश के मंचों पर भी गूंज रही है और यह सफर यूं ही आगे बढ़ता रहेगा।

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