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पितरों की स्मृति में यमुना तट पर नन्हे बच्चों ने किया सुंदरकांड पाठ, भारतीय संस्कृति और संस्कारों का दिया संदेश

फ्रेंड्स ऑफ यमुना फाउंडेशन की पहल, बच्चों ने पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर लिया बड़ों के सम्मान और सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का संकल

अमर संदेश
नई दिल्ली। पितरों की स्मृति, उनके प्रति श्रद्धा और पूर्वजों के आशीर्वाद की कामना के साथ फ्रेंड्स ऑफ यमुना फाउंडेशन की ओर से आईटीओ स्थित यमुना छठ घाट पर सुंदरकांड पाठ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर छोटे-छोटे बच्चों ने श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ सुंदरकांड का पाठ कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। कार्यक्रम के माध्यम से नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और पारिवारिक संस्कारों से जोड़ने का संदेश दिया गया।

पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना तथा उनकी आत्मिक शांति के लिए प्रार्थना करना भारतीय परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी भावना के साथ आयोजित इस कार्यक्रम में बच्चों ने अपने पितरों सहित समस्त देशवासियों पर पूर्वजों का आशीर्वाद बने रहने की कामना की।
पितरों का स्मरण भारतीय संस्कृति की विशिष्ट परंपरा : जगदीश सहगल
संस्था के महासचिव जगदीश सहगल ने कहा कि भारत की संस्कृति में पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का विशेष स्थान है। पितृपक्ष के 16 दिनों में लोग अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं तथा श्राद्ध, तर्पण और अन्य धार्मिक परंपराओं के माध्यम से उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। उन्होंने कहा कि पूर्वजों के प्रति आदर व्यक्त करना हमारी सांस्कृतिक विरासत और पारिवारिक संस्कारों का महत्वपूर्ण अंग है।

पितरों की स्मृति से मिलता है संस्कार और सेवा का संदेश : यमुना बाबा अशोक उपाध्यमुना बाबा अशोक उपाध्याय ने कहा कि पितरों का स्मरण हमें अपनी जड़ों, परिवार और परंपराओं से जोड़ता है। इसी उद्देश्य से संस्था की ओर से सुंदरकांड पाठ कराया गया, ताकि बच्चों में बचपन से ही श्रद्धा, भक्ति और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति लगाव विकसित हो। उन्होंने कहा कि यमुना तट पर इस प्रकार के धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन समाज को सकारात्मक दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

संस्था के सचिव एवं यमुना सेवक परविंदर मिश्रा ने कहा कि श्राद्ध और तर्पण की परंपरा पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। उन्होंने उपस्थित बच्चों से आह्वान किया कि वे अपनी पढ़ाई के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, परंपराओं और संस्कारों को भी जीवन में स्थान दें।
उन्होंने कहा कि अपने राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता, माता-पिता एवं बुजुर्गों का सम्मान और अपनी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी का दायित्व है। आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कारों का समावेश ही बच्चों को जिम्मेदार नागरिक बनाने में सहायक होगा।
बच्चों के सुंदरकांड पाठ ने याद दिलाई सांस्कृतिक विरासत : रामदयाल पांडे
रामदयाल पांडे ने कहा कि नन्हे बच्चों को श्रद्धा और एकाग्रता के साथ सुंदरकांड का पाठ करते देखना भारतीय सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाता है। उन्होंने कहा कि बचपन से ही बच्चों को धार्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों से जोड़ने के प्रयास किए जाने चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी परंपराओं को समझें और उनका सम्मान करें।
नन्हे कलाकारों ने भक्ति भाव से किया सुंदरकांड पाठ
कार्यक्रम में सुंदरकांड पाठ प्रस्तुत करने वाले बच्चों में वैष्णवी ठाकुर, वैभवी ठाकुर, आदित्य पांडे, श्रेयांश मिश्रा, माही मिश्रा, तेजस मिश्रा और गर्विक पांडे शामिल रहे। बच्चों ने यमुना मैया के पावन तट पर पितरों की स्मृति में पाठ करने के अनुभव को सुखद बताया। उन्होंने कामना की कि पूर्वजों का आशीर्वाद सभी देशवासियों पर बना रहे।
बच्चों की इस प्रस्तुति ने उपस्थित लोगों को भावुक करने के साथ यह संदेश भी दिया कि यदि बचपन से ही बच्चों को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ा जाए, तो भारतीय विरासत की निरंतरता बनी रह सकती है।
अनेक लोगों ने दिया सहयोग
कार्यक्रम के सफल आयोजन में दीवान चंद गोयल, मुकुल गर्ग, एकता सहगल, राजू पांडे, प्रदीप सिंह, धर्म चौरसिया, सुजल मिश्रा, सिंह, सूरजभान मिश्रा, अनिरुद्ध पांडे, नितिन वर्मा, पूजा, पार्थ, पवन, राघव पांडे, देवचंद, विजय, करुणा प्रसाद मौर्य और धर्मेंद्र सहित अन्य सहयोगियों का विशेष योगदान रहा।
नई पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ने की सार्थक पहल
फ्रेंड्स ऑफ यमुना फाउंडेशन की इस पहल ने धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का संदेश दिया। यमुना तट पर बच्चों द्वारा सुंदरकांड पाठ के माध्यम से यह प्रेरणा दी गई कि पूर्वजों का सम्मान, परिवार के बड़ों के प्रति आदर, राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता और अपनी संस्कृति का संरक्षण जीवन के महत्वपूर्ण मूल्य हैं।

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