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भारत के समक्ष मुश्किलें खड़ी करते ट्रंप, नये बाजारों की तलाश जरूरी

लेखक  वरिष्ठ पत्रकार महावीर सिंह

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच बुधवार को टेलीफोन पर लंबी बातचीत हुई। दोनों देशों के संबंधों में विभिन्न कारणों के चलते जो तनाव सा दिखाई देता है उसके बीच यह बातचीत निश्चित ही राहत का एहसास दिलाती है। दोनों नेताओं ने संबंधों के सभी आयामों पर चर्चा की और समग्र वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई। क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर अपने विचार रखे और वैश्विक सुरक्षा और शांति के लिये किये जा रहे प्रयासों पर भी विचार विमर्श किया। लेकिन इस बातचीत में व्यापार समझौते और रूस तेल खरीद पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाने संबंधी मुद्दे पर कोई बात हुई अथवा नहीं यह स्पष्ट नहीं है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब से दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं उनका हर कदम भारत के खिलाफ उठता दिख रहा है। सबसे ताजा उदाहरण है अमेरिकी संसद से पारित लिंडसे ओ. ग्राहम सैक्शनिंग रशिया एण्ड ईरान बिल 2026, इस विधेयक पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हस्ताक्षर कर दिये हैं और अब यह कानून बन चुका है। यह कानून राष्ट्रपति ट्रंप को रूस और ईरान से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का अधिकार देता है। स्वाभाविक है कि इस फैसले का सबसे ज्यादा असर भारत और चीन पर पड़ेगा, क्योंकि ये दोनों ही देश आज रूस से कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदार हैं। रूस के कुल तेल निर्यात का करीब आधा तेल चीन खरीदता है और 37 प्रतिशत भारत खरीदता है। हालांकि, भारत में जुलाई के बाद अगस्त और सितंबर में रूसी तेल आयात कुछ कम हुआ है।

सबसे बड़ी बात यह है कि इस मामले में चीन के प्रति उनका रुख कहीं न कहीं नरम दिखाई देता है। टैरिफ युद्ध के समय अमेरिका और चीन के बीच व्यापार शांति समझौता हुआ था जिसकी अवधि नवंबर 2026 में समाप्त हो रही थी। पिछले सप्ताह ही चीन के राष्ट्रपति शी- चिनफिंग और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच शिखर बैठक हुई जिसमें व्यापार शांति समझौते की अवधि दो माह बढ़ाने पर सहमति बनी। अब समझौता 10 जनवरी 2027 तक लागू रहेगा। इसके साथ ही दोनों देश एक दूसरे के 30 – 30 अरब डालर के गैर-संवेदनशील आयात पर शुल्क कम रखने पर सहमत हुये हैं। चीन का कहना है कि इस दौरान दोनों देश द्विपक्षीय आर्थिक और व्यापार मुद्दों को सुलझाने का प्रयास कर सकेंगे।

वहीं, दूसरी तरफ भारत के मामले में स्थिति अनिश्चित बनी हुई है। अमेरिका और भारत के बीच जिस व्यापार समझौते पर बातचीत चल रही है, वह कब संपन्न होगा, पता नहीं। इसके विपरीत राष्ट्रपति ट्रंप लगातार ऐसे कदम उठाते जा रहे हैं जिनसे भारतीय साफ्टवेयर इंजीनियरों, आईटी कंपनियों और निर्यात कारोबारियों के लिये अमेरिका में काम करना और व्यापार करना कठिन होता जा रहा। यही नही, पिछले साल राष्ट्रपति ट्रंप भारत पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगा चुके हैं। तब 25 प्रतिशत टैरिफ रूस से तेल खरीदने पर दंडस्वरूप लगाया गया था। हालांकि, बाद में अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने इन आदेशों को गैरकानूनी बताते हुए निरस्त कर दिया था। लेकिन अब संसद से कानून पारित होने के बाद ट्रंप को कानूनी अधिकार मिल गया है।

अमेरिका ने भारत सहित दुनिया के 60 देशों पर व्यापार कानून 1974 की धारा 301 के तहत जबरन श्रम से तैयार माल पर दंड स्वरूप 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क पहले ही लगा रखा है। ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी वीजा नियमों को भी कठोर बनाने का फैसला किया है। इसके तहत नौकरी छूटने पर वहां कर्मचारियों का प्रवासी दर्जा तुरंत समाप्त हो जायेगा और उन्हें अमेरिका छोड़ना पड़ेगा। मौजूदा नियमों के तहत नौकरी छूटने पर नई नौकरी ढूंढने के लिये 60 दिन का समय मिलता है। इसका असर बड़ी संख्या में अमेरिका में काम कर रहे भारतीय आईटी पेशेवरों पर पड़ेगा। यह प्रस्ताव केवल एच-1बी वीजा तक ही सीमित नहीं है बल्कि एल-1, ओ-1 और टीएन जैसी अन्य वीजा श्रेणियों पर भी लागू होना है।

अमेरिकी संसद में कामकाजी वीजा पर तीन साल तक रोक लगाने संबंधी एक नया और सख्त विधेयक भी पेश किया गया है। यह प्रस्ताव यदि लागू होता है तो तकनीकी क्षेत्र के भारतीय पेशेवरों पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। नये प्रस्तावों में एक लाख डालर तक का भारी भरकम शुल्क और कठोर न्यूनतम वेतन मानदंड भी शामिल है। दरअसल, यह कदम इस लिये भी उठाया जा रहा है ताकि अमेरीकी कंपनियां सस्ते वेतन पर प्रवासियों को नौकरी पर रखने के बजाय अमेरिकी नागरिकों को नौकरी दें। यही नहीं, वीजा धारकों के आश्रितों और परिजनों पर भी कई तरह की पाबंदियां लगाने का प्रस्ताव है।

अमेरिकी प्रशासन ने जेनेरिक दवाओं के आयात पर भी 1 अगस्त 2026 से नई शुल्क नीति लागू की है। शुरू के दो वर्षों में दवा आयात शुल्क मुक्त रहेगा ताकि अमेरिकी बाजार में अचानक दवा आपूर्ति बाधित नहीं हो। उसके बाद अगस्त 2028 से जेनरिक दवाओं पर 100 प्रतिशत शुल्क लागू हो जायेगा जिसे अगस्त 2029 से बढ़ाकर 200 प्रतिशत तक कर दिया जायेगा।

भारत के समक्ष सबसे बड़ी समस्या यह है कि अमेरिका उसका सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। वर्ष 2025 में भारत ने अपने कुल निर्यात का 20 प्रतिशत अकेले अमेरिका को किया था। यदि भारतीय सामान पर अमेरिका में उंची दर से शुल्क लग गया तो भारतीय माल वहां महंगा हो जायेगा जिससे निर्यात और रोजगार का नुकसान होगा। भारत से अमेरिका को इंजीनियरिंग सामान, इलेक्ट्रानिक उपकरणों, जेनरिक दवाओं, तराशे गये हीरे, स्वर्णाभूषण, कपड़े और समुद्री उत्पाद का बड़े पैमाने पर निर्यात होता है।

दरअसल, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है। वित वर्ष 2026 में दोनों के बीच कुल 141 अरब डालर का व्यापार हुआ जिसमें भारत से अमेरिका को 87 अरब डालर का निर्यात और अमेरिका से 54 अरब डालर का आयात हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति कहीं न कहीं इस स्थिति को बदलना चाहता है। जानकारों का मानना हैं कि अमेरिका उंची शुल्क दरों के जरिये भारत पर दबाव बढ़ाना चाहता है। वह अमेरिकी उत्पादों खासतौर से कृषि एवं डेयरी उत्पादों के लिये भारतीय बाजार खुलवाना चाहता है। इसी मुद्दे को लेकर दोनों देशों के बीच व्यापार समझौता भी अटका हुआ है।

भारत के लिये अमेरिकी बाजार का विकल्प तलाशना इतना भी आसान नहीं लगता। तमाम प्रयासों के बावजूद देश का निर्यात कारोबार तो बढ़ रहा है लेकिन इसके साथ ही आयात भी उतनी ही तेजी से बढता जा़ रहा है। अपने समग्र व्यापार को अधिशेष की स्थिति में लाने के लिये भारत को वस्तु एवं सेवा निर्यात दोनों बढ़ाने के लिये नये बाजार तलाशने होंगे।

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