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सी एम पपनैं
भतरौंज (नैनीताल। नैनीताल जिले के भतरौंज तथा कोश्या क्षेत्र के दूरदराज गांवो में निवासरत नौनिहालो द्वारा फूलदेई पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। नौनिहालो द्वारा गांव के प्रत्येक घर की ध्येली पर उक्त परिवारों की समृद्धि व संपन्नता हेतु बाशिंग, गुलवंश, संगीन, मौनी, क्वैराव, प्योली तथा बुरांश इत्यादि विभिन्न प्रकार के रंग-बिरंगे फूल उत्साह व हर्षोल्लास के साथ चढ़ाए गए।
पावन प्रकृति से जुड़ा तथा गढ़-कुमांऊ की अनूठी सामाजिक तथा पारंपरिक संस्कृति का प्रतीक हिमालयी पावन ऋतु पर्व फूलदेई उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिक तौर पर बाल पर्व के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी चैत्र संक्रांति के दिन मनाया जाता है। कुछ स्थानों में यह पर्व आठ दिनों तक व टिहरी के कुछ इलाकों में एक माह तक मनाए जाने की परंपरा रही है। नैनीताल जिले के भतरौंज व कोश्या के इलाके में इस बाल पर्व को पारंपरिक रूप में वैशाखी के दिन मनाए जाने की रीति रही है।
उत्तराखंड के पर्वतीय भू-भाग में सर्दियों के मुश्किल दिन बीत जाने तथा जंगलों में बुरांश सहित विभिन्न प्रकार के फूलों की चादर बिछ जाने पर, प्रकृति का सौन्दर्य निखरा देख, नौनिहालो के बाल मन द्वारा बसंत ऋतु के सौन्दर्य की भांति अपने गांव के हर घर-परिवार के सौंदर्य व खुशहाली की चाहत हेतु फूलदेई पर्व मनाए जाने की परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चलायमान रही है। 
फूलदेई त्यौहार की पूर्वसंध्या से पूर्व गांव के नौनिहाल जंगल से विभिन्न प्रकार के फूलो को तोड़ फूलदेई के शुभदिन उक्त सुगंध व सौन्दर्यमान युक्त फूलों को गांव के प्रत्येक घर की चौखट पर चढ़ा तथा बालमन के शुभ-आसिर वचनों-
फूल देई, छम्मा देई, दैणी द्वार भर भकार…हम ओल बारंबार…।
के बोलों के साथ उत्साहित होकर प्रत्येक घर से उपहार स्वरूप गुड़, चावल, गेहूं इत्यादि प्राप्त कर आनंद मनाते हैं।
बसंत की अगुवाई वाले अनेक किवदंतियों से जुड़े उत्तराखंड के चैत्र मास में मनाए जाने वाले फूलदेई त्यौहार के इस पावन पर्व के दिन से ही हिंदू शक संवत आरंभ होता है। यही चैत्र मास की वह ऋतु है जहां से सृष्टि ने अपना श्रंगार करना शुरू किया तथा मानव के ह्रदय में कोमलता का वास उत्पन्न हुआ। वैशाख में मनाई जाने वाली फूलदेई के दिन से उत्तराखंड के शीतकाल में बंद मंदिरो के मुख्य द्वार खुलने का दिन निश्चित किया जाता है।
गांवो से शहरो को बढ़ते पलायन तथा शहरीकरण से वनों का सफाया होने से प्रकृति व पर्यावरण को हुए हास तथा देश-विदेश के विभिन्न भागों में प्रवासरत उत्तराखंड के प्रवासियों की नई पीढ़ी का अपनी पारंपरिक समृद्ध परम्पराओं से अनभिज्ञ होने के परिणाम स्वरूप प्रकृति से जुड़े बाल पर्व फूलदेई त्यौहार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। ऐसे में सुखद लगता है, यह प्रत्यक्ष देख, पर्वतीय अंचल के गांवो में आज भी नौनिहालो द्वारा प्रकृति के त्यौहार फूलदेई की पारंपरिक परिपाठी को संजोए रख, बड़े उत्साह व उमंग के साथ मनाए जाने की परिपाठी को जिंदा रखा गया है तथा देश के विभिन्न भागों मे निवासरत कुछ प्रवासी उत्तराखंडी संगठनों द्वारा फूलदेई बाल पर्व का संरक्षण व संवर्धन किया जा रहा है।
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