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अमर चंद्र
नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी के लिए मौजूदा दौर किसी परीक्षा से कम नहीं दिख रहा। एक तरफ चुनावी झटके, दूसरी तरफ अंदरूनी असंतोष इन सबने पार्टी की सियासत को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। हालिया घटनाक्रम ने यह बहस तेज कर दी है कि क्या पार्टी अपनी पुरानी मजबूती और विश्वसनीयता को बरकरार रख पाएगी।
राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं हैं कि पार्टी के भीतर दरारें गहराती जा रही हैं। अगर वरिष्ठ नेता ही अलग रास्ता चुनने लगें, तो यह केवल संख्या का नुकसान नहीं होता, बल्कि यह उस भरोसे पर चोट होती है, जिस पर कोई भी राजनीतिक संगठन खड़ा होता है।
अरविंद केजरीवाल ने एक समय अपनी सादगी और जनसरोकारों की राजनीति से अलग पहचान बनाई थी। अन्ना आंदोलन से निकली ऊर्जा ने उन्हें जनता के दिलों तक पहुंचाया।
लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलीं। चुनावी हार, आरोप-प्रत्यारोप और विवादों ने उस छवि को चुनौती दी है। सवाल उठना लाज़मी है क्या वही करिश्मा आज भी बरकरार है, या अब नेतृत्व को नए सिरे से खुद को साबित करना होगा?
टूट का असर सिर्फ संख्या तक सीमित नहीं
किसी भी पार्टी में बड़ी टूट केवल सीटों या सांसदों की गिनती कम नहीं करती, बल्कि यह संगठन की जड़ों को हिला देती है। कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है और विरोधियों को हमला करने का मौका मिलता है।
इतिहास गवाह है चाहे इंदिरा गांधी का दौर हो या कांशीराम का समयमजबूत नेतृत्व ने ही टूट के बाद पार्टी को संभाला। जहां नेतृत्व कमजोर पड़ा, वहां संगठन धीरे-धीरे बिखरता चला गया।
क्या सिर्फ विरोधी जिम्मेदार हैं?
हर बार बाहरी ताकतों को जिम्मेदार ठहराना आसान होता है, लेकिन असली सवाल अंदर झांकने का है।
क्या पार्टी के भीतर असंतोष को समय रहते समझा गया?
क्या नेताओं की नाराज़गी को दूर करने की कोशिश हुई?
यदि इन सवालों के जवाब नकारात्मक हैं, तो समस्या कहीं न कहीं संगठन के भीतर ही है।
आगे की राह क्या?
आज आम आदमी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने कार्यकर्ताओं और जनता के भरोसे को फिर से कैसे मजबूत करे। राजनीति में गिरावट स्थायी नहीं होती, लेकिन वापसी के लिए मजबूत नेतृत्व, साफ रणनीति और आत्ममंथन जरूरी होता है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि अरविंद केजरीवाल इस चुनौती को कैसे लेते हैंएक संकट के रूप में या एक नए अवसर के रूप में।?
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