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हिमालयन एनकाउंटर्स: 170 साल पुराने ‘अनदेखे’ दृश्यों के साथ भारतीय इतिहास की वापसी

डॉ के सी पांडेय

नई दिल्ली: दिल्ली के लोधी एस्टेट स्थित ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ (IIC) की आर्ट गैलरी, एनेक्स बिल्डिंग में 21 अप्रैल 2026 को एक ऐसी ऐतिहासिक प्रदर्शनी का भव्य शुभारंभ हुआ, जिसने दर्शकों को समय के पीछे ले जाकर 19वीं सदी के हिमालय से रूबरू करा दिया।

“हिमालयन एनकाउंटर्स: हिडन व्यूज फ्रॉम 170 इयर्स एगो” शीर्षक वाली इस प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रसिद्ध कलाकार, चित्रकार और लेखक अशोक भौमिक तथा IIC के निदेशक के.एन. श्रीवास्तव ने किया। इस अवसर पर जर्मनी स्थित बर्लिन की फ्री (FREIE) यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. हरमन क्रुत्ज़मैन एवं उनकी पत्नी श्रीमती सबीन, पद्म श्री प्रोफेसर श्री शेखर पाठक अपने टीम सहित वहां उपस्थित रहे। यह प्रदर्शनी 29 अप्रैल तक दिल्ली में चलेगी, जिसमें 170 साल पहले के उन दुर्लभ चित्रों और रेखाचित्रों को प्रदर्शित किया गया है, जो अब तक यूरोपीय संग्रहालयों और निजी संग्रहों में सुरक्षित रखे हुए थे।

इस पूरी प्रदर्शनी का केंद्र जर्मनी के तीन प्रतिभावान भाई—हरमन (1826-1882), एडोल्फ (1829-1857) और रॉबर्ट श्लागिंटवाइट (1833-1885) हैं। ये तीनों भाई केवल चित्रकार नहीं, बल्कि उच्च श्रेणी के भूविज्ञानी, हिमनद विज्ञानी (ग्लेशियोलॉजिस्ट) और अन्वेषक थे। 1854 में, उस समय के महान भूगोलवेत्ता अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट और प्रशिया के राजा की सिफारिश पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्हें भारत और मध्य एशिया के वैज्ञानिक मिशन पर नियुक्त किया था। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य भारत में स्थलीय चुंबकत्व (Terrestrial Magnetism) का अध्ययन करना था, लेकिन इन भाइयों की जिज्ञासा ने उन्हें हिमालय के दुर्गम इलाकों, ग्लेशियरों और वहां की संस्कृति के दस्तावेजीकरण की ओर प्रेरित किया।

प्रदर्शनी के दौरान 22 अप्रैल को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एनएक्सी के हाल मेंआयोजित एक विशेष व्याख्यान में बर्लिन की फ्री (FREIE) यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. हरमन क्रुत्ज़मैन ने इस मिशन के बौद्धिक और ऐतिहासिक संदर्भ पर विस्तार से प्रकाश डाला। प्रोफेसर क्रुत्ज़मैन ने बताया कि हिमालय के प्रति जर्मन आकर्षण की जड़ें दार्शनिक इमैनुएल कांत के विचारों में थीं, जो तिब्बत को संस्कृति और विज्ञान का पालना मानते थे। हम्बोल्ट के वैश्विक दृष्टिकोण से प्रेरित होकर, इन भाइयों ने बवेरियन आल्प्स में कठिन प्रशिक्षण लिया और फिर हिमालय की 18,000 मील लंबी यात्रा पर निकले। उन्होंने नैनीताल से लेकर गढ़वाल, कुमाऊं, नेपाल, तिब्बत, लेह-लद्दाख और तुर्किस्तान तक के कठिन रास्तों को पार किया। प्रोफेसर क्रुत्ज़मैन ने रेखांकित किया कि इन भाइयों ने अपने काम को मौसम और क्षेत्रों के अनुसार विभाजित किया था—वे गर्मियों में ऊंचे पहाड़ों और सर्दियों में मैदानों का अध्ययन करते थे।

इस महागाथा का एक अनिवार्य हिस्सा भारतीय सहयोगियों का योगदान है, जिसे प्रोफेसर क्रुत्ज़मैन और प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. शेखर पाठक ने प्रमुखता से उभारा। श्लागिंटवाइट भाइयों के साथ लगभग 100 लोगों का स्टाफ था, जिनमें मिलम पिथौरागढ़ के नैन सिंह रावत और अल्मोड़ा के क्षेत्रीय वैद्य डॉ. हरकिशन सबसे महत्वपूर्ण थे। नैन सिंह रावत, जिन्हें बाद में ‘पंडितों का पंडित’ कहा गया, ने अन्वेषण की कला इन्हीं भाइयों से सीखी थी। चूंकि उस समय विदेशियों के लिए तिब्बत के रास्ते बंद थे, इसलिए नैन सिंह ने माला के मनकों और प्रार्थना चक्रों में गुप्त नोट्स छिपाकर वहां का मानचित्रण किया। उन्होंने एक प्रार्थना चक्र, ( मणि – Prayer Wheel) में गुप्त नोट्स छुपाए और 100 मोतियों की माला का उपयोग कदमों को गिनने के लिए किया, जिससे हिमालय के नक्शे पहली बार पूरी सटीकता के साथ तैयार हुए। ब्रिटिश इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट ने नैन सिंह को ‘पंडित नंबर वन’ की उपाधि दी, जिन्हें उनके वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा एक सक्षम और कुशल खोजकर्ता के रूप में पहचान मिली। हेनरी ट्रोटर ने उन्हें ‘मेजर मोंटगोमेरी का मूल पंडित’ कहा, जिन्हें 1877 में रॉयल ज्योग्राफिकल सोसाइटी का स्वर्ण पदक/संरक्षक पदक प्रदान किया गया था। श्लागिंटवेट भाइयों में से किसी को भी नैन सिंह की तरह सम्मानित नहीं किया गया।यह प्रदर्शनी केवल यूरोपीय अन्वेषकों की सफलता नहीं, बल्कि भारतीय मेधा और उनके अदम्य साहस का भी उत्सव है।

श्लागिंटवाइट भाइयों का यह मिशन कला और विज्ञान का अद्भुत संगम था। उन्होंने लगभग 750 रेखाचित्र तैयार किए थे, जिनमें से 420 आज भी मौजूद हैं। ये चित्र मूल रूप से पेंसिल या पेन से बनाए गए त्वरित स्केच थे, जिन्हें बाद में म्यूनिख के चित्रकारों ने रंगों से सजाया ताकि उन्हें प्रकाशन के योग्य बनाया जा सके। प्रदर्शनी में दिखाए गए 77 चित्रों में डल झील का मनमोहक दृश्य और मेघालय का अद्वितीय बोगापानी पुल शामिल है। ये दो चित्र पहली बार लोगों को देखने को मिल रहे है और आज के वैज्ञानिकों एवं शोधकर्ताओं के लिए एक ‘बेसलाइन’ का काम करते हैं, जिससे यह समझा जा सकता है कि पिछले 170 वर्षों में जलवायु परिवर्तन और विकास ने हिमालय के स्वरूप को कितना बदल दिया है।

इस ऐतिहासिक यात्रा का अंत दुखद भी रहा। 1857 में, जब हरमन और रॉबर्ट स्वदेश लौटने की तैयारी कर रहे थे, एडोल्फ श्लागिंटवाइट ने अपनी खोज जारी रखने का फैसला किया। अगस्त 1857 में काशगर (पूर्वी तुर्किस्तान) में चीनी जासूस होने के संदेह में उनका सिर कलम कर दिया गया। उनके द्वारा एकत्र किए गए चट्टानों, खनिजों, वनस्पति नमूनों और चित्रों के सैकड़ों बक्से बाद में यूरोप पहुंचे। प्रोफेसर क्रुत्ज़मैन ने बताया कि इन चित्रों को भारत वापस लाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था, जिसमें 11 साल का समय और बड़ी धनराशि लगी।2015 में जब पद्मश्री डॉ. शेखर पाठक म्यूनिख गए, तो वहां नैनीताल और हिमालय के चित्रों को देखकर दंग रह गए। उन्होंने सपना देखा कि इन चित्रों को वहां वापस ले जाना चाहिए जहां ये बनाए गए थे।

ग्यारह वर्षों की कड़ी मेहनत और वित्तीय बाधाओं को पार करने के बाद, आज अप्रैल 2026 में वह सपना साकार हुआ है। प्रो. हरमन क्रुट्जमैन और डॉ. पाठक के प्रयासों से ये ‘छिपे हुए दृश्य’ नई दिल्ली के आईआईसी (IIC) आर्ट गैलरी में प्रदर्शित हो रहे हैं। पदम श्री प्रोफ़ेसर शेखर पाठक, चंदन डांगी व पहाड़ टीम को इस प्रदर्शनी को भारत में लाने के लिए किए गए अथक प्रयासों का श्रेय जाता है।

दिल्ली के बाद, यह प्रदर्शनी देहरादून (1 से 9 मई) और नैनीताल (12 से 18 मई) में आयोजित की जाएगी। ये सभी मूल्यवान प्रिंट भारतीय संस्था ‘पहाड़’ (PAHAR) को उपहार स्वरूप प्रदान कर दी गई हैं ताकि भविष्य में छात्र और शोधकर्ता इनका लाभ उठा सकें। अशोक वाजपेयी ने अपने समापन भाषण में सही कहा कि “मानचित्र बनाना केवल एक तकनीकी कार्य नहीं, बल्कि जोखिम, जिज्ञासा और बलिदान से भरी एक मानवीय यात्रा है।” यह प्रदर्शनी उसी मानवीय भावना और हिमालय के प्रति अटूट सम्मान का प्रतीक है।

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