उत्तराखण्ड

गुलदार के खौफ से उबल उठा दुगड्डा, ग्रामीणों ने निकाली जन आक्रोश रैली

“वोट उसी को मिलेगा, जो हमें जंगली जानवरों से बचाएगा” के नारों से गूंजा जयगांव क्षेत्र; गुलदार, बंदर और जंगली सूअर से निजात की उठी जोरदार मांग

Amar sandesh दिल्ली दुगड्डा/पौड़ी गढ़वाल। विकासखंड दुगड्डा की ग्राम सभा जयगांव के अंतर्गत भट्टगांव, जयगांव और आसपास के गांवों में जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक के खिलाफ ग्रामीणों का आक्रोश सड़क पर उतर आया। ग्रामीणों ने विशाल जनसभा के बाद 11 और 12 अगस्त को जन आक्रोश रैली निकालकर जंगली जानवरों से ग्रामीणों की जान-माल और खेती की सुरक्षा की मांग उठाई।
रैली के दौरान ग्रामीणों ने “वोट उसी को मिलेगा जो हमें जंगली जानवरों से बचाएगा”, “गुलदार की संख्या अत्यधिक बढ़ गई है, अब इसका संरक्षण बंद करो”, “संविधान के अनुसार हमें निडर होकर जीने का अधिकार दो” और “जंगली सूअर और बंदरों से हमारी खेती की रक्षा करो” जैसे नारे लगाए।


अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पक्षीविद, पर्यावरणविद एवं वन्यजीव वैज्ञानिक तथा गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और भट्टगांव, पौड़ी गढ़वाल निवासी डॉ. दिनेश चंद्र भट्ट ने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि उनके आकलन के अनुसार वर्तमान में गुलदारों की संख्या वनों की धारण क्षमता से करीब छह गुना अधिक हो गई है। उन्होंने वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कानूनों के तहत गुलदारों की वर्तमान स्थिति की समीक्षा करने और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें संरक्षित सूची से हटाकर वर्मिन घोषित करने तथा उनकी संख्या नियंत्रित करने के लिए आवश्यक कार्रवाई की मांग की।
डॉ. भट्ट ने कहा कि बंदरों और जंगली सूअरों की संख्या में भी अत्यधिक वृद्धि हुई है। इसके कारण ग्रामीण खेती नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने राज्य सरकार से इन वन्यजीवों की संख्या नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की।
उन्होंने कहा कि जंगली जानवरों के बढ़ते दबाव से क्षेत्र की पारंपरिक कृषि भी प्रभावित हो रही है।इंडीजीनस गेहूं, धान, उड़द, गहत, लोबिया, रयास, चिचिंडा, काकड़ी, छीमि सहित अनेक स्थानीय फसलों और सब्जियों की प्रजातियां धीरे-धीरे खत्म होने के खतरे में हैं। ग्रामीणों की जान-माल की सुरक्षा के साथ-साथ कृषि और जैव विविधता पर पड़ रहे प्रभाव को उन्होंने गंभीर चिंता का विषय बताया।
खेतों में जाने से डर रहे ग्रामीण
ग्रामीणों का कहना है कि गुलदार का खौफ इतना बढ़ गया है कि लोग खेतों में जाने से भी डरने लगे हैं। उनका आरोप है कि गुलदार दिनदहाड़े भी ग्रामीणों और पशुओं पर हमला करने का प्रयास कर रहा है। डॉ. भट्ट के अनुसार वर्तमान में ग्रामीण क्षेत्र में तीन गुलदार सक्रिय हैं और इनमें से दो के बच्चे भी हैं। ऐसे में आने वाले एक-दो सप्ताह में ग्रामीणों के सामने खतरा और बढ़ने की आशंका जताई गई है।
लैंटाना की झाड़ियों को बताया गुलदार के लिए सुरक्षित ठिकाना
डॉ. दिनेश चंद्र भट्ट ने कहा कि दुगड्डा ब्लॉक में लैंटाना की झाड़ियों का तेजी से फैलाव भी गंभीर समस्या है। उनका कहना है कि इन घनी झाड़ियों में गुलदार छिपकर ग्रामीणों और उनके पशुओं पर घात लगाकर हमला कर सकते हैं। उन्होंने राज्य सरकार, जनप्रतिनिधियों और जिला विकास अधिकारी से पूरे दुगड्डा ब्लॉक में लैंटाना झाड़ियों के उन्मूलन के लिए जिला कार्ययोजना के अंतर्गत धन आवंटित करने का बार-बार अनुरोध किए जाने की बात कही। उनके अनुसार अभी तक जिला अथवा ब्लॉक स्तर पर इस दिशा में अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो पाई है।
दो दशक पहले सात ग्रामीणों की हो चुकी है मौत
ग्रामीणों ने क्षेत्र में गुलदार के पुराने आतंक को भी याद किया। बताया गया कि करीब दो दशक पूर्व भट्टगांव और जयगांव में दो वर्ष के भीतर गुलदार के हमले में सात ग्रामीणों की मौत हो गई थी। इसी अवधि में करीब 12 पालतू पशुओं को भी गुलदार ने अपना शिकार बनाया था, जबकि तीन ग्रामीण हमले में बाल-बाल बचे थे।
ग्रामीणों के अनुसार इसी सप्ताह जयगांव निवासी यशोदा नामक महिला ने भी दो बच्चों के साथ मौजूद गुलदार के हमले से किसी तरह अपनी जान बचाई। इस घटना ने क्षेत्र में एक बार फिर भय का माहौल पैदा कर दिया है।
जनसभा में ग्राम प्रधान सुमन बिष्ट और उप प्रधान निर्मल कुमार ने भी अपने विचार रखे। करीब 90 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक एवं पूर्व प्रधान रामलाल सिंह बिष्ट ने क्षेत्र में वन्यजीवों के बदलते व्यवहार और पुराने घटनाक्रमों से जुड़े अपने अनुभव साझा किए।
कार्यक्रम का ऑडियो-वीडियो के माध्यम से लाइव संप्रेषण कप्तान-महाराज सिंह बिष्ट (सेवानिवृत्त) ने किया। कार्यकारिणी के सदस्य रेंजर-लोकपाल सिंह बिष्ट (सेवानिवृत्त) सहित अन्य सदस्यों ने कार्यक्रम में सक्रिय योगदान दिया।
जनसभा के अंत में ग्रामीणों की ओर से एक विस्तृत प्रतिवेदन तैयार किया गया, जिसे केंद्र और राज्य सरकार के संबंधित अधिकारियों को भेजा जाएगा। ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि उनकी मांग केवल वन्यजीवों की संख्या नियंत्रित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीणों की जान-माल की सुरक्षा, खेती को बचाने और पारंपरिक जैव विविधता के संरक्षण के लिए ठोस और तत्काल कार्रवाई की है।

Share This Post:-

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *