उत्तराखंड के सु-प्रसिद्ध लोकगायक व कवि हीरासिंह राणा का स्वर्गवास

सी एम पपनैं

नई दिल्ली। 13 जून आज प्रातः तीन बजे उत्तराखंड के सु-विख्यात लोकगायक व लोक कवि हीरासिंह राणा का 78 वर्ष की उम्र मे दिल का दौरा पड़ने से आकस्मिक निधन हो गया है। वे अपने पीछे पत्नी बिमला व एक बेरोजगार पुत्र हिमांशू को छोड़ गए हैं।

दिल्ली सरकार ने माह अक्टूबर 2019 को सुप्रसिद्ध लोकगायक व जनकवि हीरा सिंह राणा को कुमांउनी, गढ़वाली व जौनसारी भाषा अकादमी का पहला उपाध्यक्ष बनाऐ जाने की घोषणा की थी। माह फरवरी 2020 मे भारत सरकार संगीत नाटक अकादमी ने उन्हे अकादमी सलाहकार नियुक्त किया था।

निधन की खबर सुन दिल्ली प्रवास मे निवासरत उत्तराखंडियों व विभिन्न नगरों व उत्तराखंड मे बसे उत्तराखंडी जनमानस के बीच चंद घंटों मे ही निधन की खबर पहुचते ही दुःख की लहर छा गई है। आज सुबह ही कुछ लोगो कि उपस्थिति मे हीरासिंह राणा का दाह संस्कार निगम बोध घाट मे किया गया है।

16 सितम्बर को पश्चिमी विनोदनगर दिल्ली मे दिवंगत हीरासिंह राणा का 77वा जयंती समारोह ‘लोक संस्कृति सम्मान दिवस’ के रूप मे बड़े धूमधाम से मनाया गया था।

उक्त जयन्ती समारोह मे वक्ताओ द्वारा केंद्र सरकार के साथ-साथ उत्तराखंड तथा दिल्ली की राज्य सरकारों को इस सु-प्रसिद्ध लोकगायक व जनकवि को उनके द्वारा उत्तराखंड की लोक संस्कृति, साहित्य व लोकगायन के क्षेत्र मे दिए गए अतुलनीय योगदान पर स्थापित सरकारों द्वारा लंबी अवधि निकल जाने पर भी किसी भी सम्मान से वंचित रखने पर आक्रोश व्यक्त किया गया था। स्थापित सरकारों की नीतियों की कड़े शब्दों मे निंदा की गई थी।

वक्ताओ द्वारा व्यक्त किया गया था, एक ओर जहां बड़ी तादात मे सामाजिक व सांस्कृतिक संस्थाए अपने लोकप्रिय गायक व कवि को सम्मानित करने हेतु कतार मे खड़ी रहती हैं, वही दूसरी ओर स्थापित सरकारो द्वारा इस बहुप्रतिष्ठित लोकगायक व कवि की निरंतर अवहेलना करना सरकारों की बदनियती का खुलासा करती है। सवाल खड़े करती हैं।

हीरासिंह राणा को कुमांउनी, गढ़वाली व जौनसारी भाषा अकादमी का उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद उत्तराखंड के सांस्कृतिक, साहित्यिक व अन्य लोक कला की विधाओ से सबद्ध कार्यक्रमो का बृहद तौर पर आयोजन करने के साथ-साथ उनका संवर्धन व संरक्षण होने की संभावना बढ़ गई थी। कुछ माह पूर्व एक भव्य सांस्कृतिक आयोजन दिल्ली कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में आयोजित भी किया जा चुका था।

उत्तराखंडी लोकभाषा व संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए दिल्ली सरकार द्वारा घोषित अकादमी उपाध्यक्ष सुप्रसिद्ध लोकगायक व कवि हीरा सिंह राणा के कृतित्व व व्यक्तित्व का अवलोकन कर ज्ञात होता है, इस लोकगायक ने अपने सरोकारों को अपने गीतों मे रच कर उत्तराखंड के लोक साहित्य व लोक गायन पर अपनी सृजनशीलता बनाए रखी। अपने मधुर कंठ के गायन व हुड़का वादन से लोगो को रिझाया, जिसे सुनने को लोग सदा ललाइत रहे। श्रोताओं ने जब भी जिस गीत को गाने की फरमाइश की सहर्ष गाया। यह धारणा इस लोकगायक को एक जनगायक की प्रसिद्धि की ओर ले गई। चेतना जगा कर फलक का व्यापक रहना, समाज की संवेदनाओ को कविताओं व गीतों मे उतार कर निराले प्रभावशाली अंदाज मे प्रस्तुत कर समाज के प्रत्येक वर्ग को झकझोरना, जिनमे दुःख, दर्द,संघर्ष व पलायन की पीड़ा के साथ-साथ सौन्दर्य भी समाया हुआ रहा, इस रचियता की रचनाशीलता की ताकत के रूप मे चरितार्थ हुआ। रची रचनाओं मे गति प्रवाह व समुद्र की गहराई देखी गई। जन आंदोलनों मे स्वरचित क्रांतिकारी गीतों को गाकर राष्ट्रीय चेतना जगाने के कारण हीरासिंह राणा को राष्ट्रीय कवि के तौर पर आंक, हिंदी साहित्य की अमर विभुति का दर्जा हासिल हुआ।

हीरासिंह राणा ने अपनी रचनाओं के माध्यम से लोगो को जीवन के उतार-चढ़ाव के रास्तों से अवगत करा, उन्हे संघर्ष करने की सीख प्रदान की थी। साथ ही रास्ता भी सुझाया था, जिसे एक मिशाल के रूप मे ही याद नही किया जायेगा, बल्कि यह सब इस लोकगायक व रचयिता की प्रसिद्धि व खासियत के रूप मे चर्चा का विषय पीढी दर पीढ़ी बना रहेगा। श्रोताओं के मध्य इस मौलिक रचनाकार की रचना व बेमिशाल गायन विधा की कला को कोई नही भूल पायेगा। इस लोकगायक के गीतों व रचनाओं को सुन प्रवास मे लोगों को गांव की याद आ जाती थी, उन्हे अपनी जडों से मिलने का अवसर मिलता था। अब बस इस महान लोकगायक व कवि की यादे ही शेष रह गई है, जनमानस के बीच, जो याद रहेंगी दशकों तक।

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