गोट उत्तराखंड के गांवों की वह परंपरा, जो अब तस्वीरों में सिमटती जा रही है
अमर चंद्र
कभी उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में शाम ढलते ही जीवन का एक अलग ही रंग दिखाई देता था। घरों से गाय, बैल, भैंस और बकरियों को लेकर लोग गांव से कुछ दूरी पर बने गोट की ओर निकल पड़ते थे। यह केवल पशुओं को बांधने की जगह नहीं थी, बल्कि गांव के जीवन, मेहनत, अपनत्व और आपसी मेलजोल का एक जीवंत हिस्सा हुआ करती थी।
गुठियार मूल रूप से ऐसी अस्थायी या पारंपरिक पशुशाला होती थी, जहां घर के पालतू पशुओं को रात के समय सुरक्षित और सूखी जगह पर रखा जाता था। बरसात के दिनों में इसका महत्व और भी बढ़ जाता था। पशुओं को कीचड़, बारिश और जंगल के कीड़े-मकोड़ों से बचाने के लिए लोग विशेष व्यवस्था करते थे।
तस्वीर में दिखाई दे रही यह झोपड़ी उसी बीते दौर की याद दिलाती है। लकड़ी और स्थानीय सामग्री से तैयार इसकी छत और ढांचा बताता है कि पहाड़ का आदमी अपने सीमित संसाधनों से भी जीवन को व्यवस्थित करने की कितनी सुंदर कला जानता था। कई जगह छप्पर बनाने में मालू के पत्तों, घास-फूस, लकड़ी और बांस जैसी स्थानीय सामग्री का इस्तेमाल किया जाता था। यह निर्माण किसी आधुनिक वास्तुशिल्प की देन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही स्थानीय समझ और जरूरत का परिणाम था।
गुठियार में केवल पशु ही नहीं रहते थे। कई परिवारों में घर का एक सदस्य रात में वहीं सोता था। वह अपने लिए भोजन भी घर से लेकर जाता था।रात के सन्नाटे में पशुओं की देखभाल करते हुए आसपास के दूसरे गोट से आए लोग भी एक-दूसरे से मिलने पहुंचते थे। बातचीत होती, गांव-घर की बातें होतीं, सुख-दुख साझा होते और कभी-कभी देर रात तक किस्से-कहानियों का दौर चलता।
यानी गोट एक तरह से पशुओं की सुरक्षा के साथ-साथ ग्रामीण सामाजिक जीवन का भी एक छोटा-सा केंद्र था।
उस समय गाय केवल दूध देने वाला पशु नहीं थी। बैल खेती की रीढ़ थे। भैंस परिवार की जरूरतों से जुड़ी थी और बकरियां पहाड़ी परिवारों की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं। पशुधन के साथ खेत, जंगल और गांव का जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ था।
लेकिन समय बदला।
पहाड़ों से पलायन बढ़ा। खेती का क्षेत्र घटा। पारंपरिक कृषि कम हुई। बैलों की जगह मशीनों ने ले ली। गांवों में पशु पालने वाले परिवारों की संख्या कम होती चली गई। जिन आंगनों और गोठों में कभी पशुओं की आवाज गूंजती थी, वहां अब कई जगह सन्नाटा दिखाई देता है।
और इसी के साथ गुठयार भी धीरे-धीरे दुर्लभ होता चला गया।
आज की पीढ़ी के लिए ‘गुठियार’ शब्द ही कई बार अपरिचित है। आने वाले समय में शायद बहुत से बच्चे यह कल्पना भी न कर पाएं कि कभी पहाड़ के गांवों में घर का कोई सदस्य पूरी रात पशुओं के साथ ऐसी झोपड़ी में रहकर उनकी रखवाली करता था।
यह केवल एक झोपड़ी के खत्म होने की कहानी नहीं है।
यह उस जीवन-पद्धति के खत्म होने की कहानी है, जिसमें मनुष्य, पशु, खेत, जंगल और गांव एक दूसरे के सहारे जीवित रहते थे।
आज उत्तराखंड के कुछ गांवों में पुराने लोग अब भी इस परंपरा की यादें संजोए हुए हैं और कहीं-कहीं इसके अवशेष भी दिखाई दे जाते हैं। लेकिन उनका अस्तित्व तेजी से कम हो रहा है।
कभी गोट में जलती छोटी-सी आग, पशुओं की घंटियों की आवाज, रात में होने वाली बातचीत और घर से लाया गया साधारण भोजन इन सबमें पहाड़ का पूरा जीवन समाया हुआ था।
आज वही संसार धीरे-धीरे तस्वीरों में कैद हो रहा है।
गुठ्यार की यह तस्वीर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक पुरानी झोपड़ी नहीं दिखाती, बल्कि उत्तराखंड के उस गांव को दिखाती है जो अब बदल चुका है।
विकास जरूरी है, समय के साथ बदलाव भी जरूरी है, लेकिन अपनी जड़ों और लोक-स्मृतियों को याद रखना भी उतना ही जरूरी है।क्योंकि जब कोई परंपरा समाप्त होती है तो उसके साथ केवल एक व्यवस्था नहीं जाती उसके साथ कहानियां, रिश्ते, श्रम, लोकज्ञान और एक पूरी पीढ़ी की स्मृतियां भी धीरे-धीरे खो जाती हैं।
शायद आने वाली पीढ़ी के लिए ‘गोट’ सिर्फ एक शब्द रह जाए।
लेकिन पहाड़ की पुरानी पीढ़ी जानती है कि उस एक शब्द के भीतर पूरा गांव बसा हुआ था।

