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गिरमिटिया भारतीयों के इतिहास, संस्कृति और विरासत के अध्ययन को मिला नया अकादमिक मंच

 लक्ष्मीबाई कॉलेज में ‘गिरमिटिया अध्ययन एवं भारतीय प्रवासी अनुसंधान चेयर’ का शुभारंभ

 

 

Amar sandesh नई दिल्ली। भारतीय प्रवास के इतिहास, संघर्ष, संस्कृति और विरासत को अकादमिक शोध के माध्यम से नई पहचान देने की दिशा में दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज ने महत्वपूर्ण पहल की है। कॉलेज में ‘गिरमिटिया अध्ययन एवं भारतीय प्रवासी अनुसंधान चेयर’ (Girmitiya Studies and Indian Diaspora Research Chair) का विधिवत शुभारंभ किया गया। भारत में सूरीनाम की राजदूत हानिशा जयराम ने इस महत्वपूर्ण अकादमिक पहल का उद्घाटन किया।

कार्यक्रम का आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालय, ग्लोबल गिरमिटिया काउंसिल तथा लक्ष्मीबाई कॉलेज के संयुक्त सहयोग से किया गया। इस अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के डीन ऑफ कॉलेजेज प्रो. बलराम पाणि, ट्रेजरर प्रो. मिथुन कुमार, लक्ष्मीबाई कॉलेज की प्राचार्य प्रो. लता शर्मा सहित शिक्षा, शोध और भारतीय प्रवासी अध्ययन से जुड़े अनेक शिक्षाविद एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

गिरमिटिया इतिहास और भारतीय विरासत पर होगा व्यवस्थित शोध

‘गिरमिटिया अध्ययन एवं भारतीय प्रवासी अनुसंधान चेयर’ की स्थापना का उद्देश्य गिरमिटिया भारतीयों के इतिहास, संघर्ष, प्रवास, सामाजिक-सांस्कृतिक विकास, भाषा, साहित्य, परंपराओं और भारतीय विरासत पर व्यवस्थित अकादमिक अध्ययन एवं शोध को बढ़ावा देना है। इसके माध्यम से दुनिया के विभिन्न देशों में बसे भारतीय मूल के लोगों और भारत के बीच ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को समझने तथा इस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए शोध और शैक्षणिक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाएगा।

कार्यक्रम में ग्लोबल गिरमिटिया काउंसिल के प्रबंध निदेशक अरविंद पांडेय तथा गिरमिटिया अध्ययन एवं भारतीय प्रवासी अनुसंधान चेयर के चेयर एवं कोऑर्डिनेटर डॉ. सुनील कुमार मिश्रा की विशेष भूमिका रही।

‘गिरमिटिया इतिहास संघर्ष, श्रम और संस्कृति की गाथा’

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. सीमा शर्मा, राकेश पाण्डेय, भावना सक्सेना, डॉ. दीप्ति अग्रवाल और प्रो. ओंकार नाथ उपाध्याय ने गिरमिटिया भारतीयों के इतिहास और उनकी सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न पहलुओं पर विचार रखे।

वक्ताओं ने कहा कि गिरमिटिया भारतीयों का इतिहास केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक हुए प्रवास का इतिहास नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, श्रम, संस्कृति, पहचान और विदेशों में भारतीय विरासत को जीवित रखने की महत्वपूर्ण गाथा है। इस क्षेत्र में विश्वविद्यालय स्तर पर समर्पित चेयर की स्थापना से विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षाविदों को अध्ययन एवं शोध के नए अवसर प्राप्त होंगे।

भारत और भारतीय प्रवासियों के ऐतिहासिक संबंधों को समझने में मददगार

सूरीनाम की राजदूत हानिशा जयराम ने इस पहल को भारत और भारतीय प्रवासी समुदाय के बीच ऐतिहासिक संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने भारतीय मूल के लोगों की सांस्कृतिक जड़ों और उनकी विरासत के संरक्षण के महत्व पर प्रकाश डाला।

भारतीय डायस्पोरा अध्ययन को मिलेगी नई दिशा

कार्यक्रम में उपस्थित शिक्षाविदों ने उम्मीद जताई कि यह चेयर भारतीय डायस्पोरा अध्ययन, गिरमिटिया इतिहास और वैश्विक स्तर पर भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जुड़े शोध को नई दिशा प्रदान करेगी। साथ ही यह देश-विदेश के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण अकादमिक केंद्र के रूप में विकसित होगी।

कार्यक्रम का संचालन अरविंद पाण्डेय ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो. सुनीता अरोड़ा ने किया।

इस महत्वपूर्ण अकादमिक पहल से संबंधित जानकारी अमर संदेश को शिक्षाविद् एवं शिक्षामित्र श्री नीरज कुमार मिश्रा द्वारा उपलब्ध कराई गई। उन्होंने इस पहल को भारतीय प्रवासी समुदाय के इतिहास, संस्कृति और विरासत को अकादमिक शोध के माध्यम से संरक्षित एवं नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास बताया।

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