अधिनायकवाद देश के प्रजातंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित होगा : आनंद शर्मा

आनंद शर्मा ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि लोकसभा चुनाव के चार चरण का मतदान हो चुका है और पांचवे चरण का मतदान 6 तारीख को होगा। एक चीज स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी का जन समर्थन तेजी से गिर रहा है, जितनी तेजी से वो गिरावट है, उतनी ही तेजी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बौखलाहट सामने आती है। उनके हाल के भाषणों से, वक्तव्यों से एक बात स्पष्ट है कि वो अपनी निश्चित पराजय से घबरा गए हैं। कुछ दिन की बात है प्रधानमंत्री जो कहते हैं कि उन्होंने बहुत बड़ी उपब्धि और बहुत बड़े काम किए हैं, उनकी जवाबदेही भारत के मतदाता तय करेंगे। आज भी प्रधानमंत्री ने जो अपने भाषण में कहा, पिछले कल और परसों, उससे स्पष्ट हो जाता है कि प्रधानमंत्री लोगों के सवालों से और असली मुद्दों से भाग रहे हैं। हमने उनसे बार-बार आग्रह किया है कृपा करके आप वापस अपने वायदों पर आ जाएं, जो आपने भारत की जनता से किए थे। जनता ने उन पर विश्वास किया, नरेन्द्र मोदी जी और बीजेपी को जनादेश दिया, इनकी सरकार बनी। तो जो बात वो साल पहले कहते थे, कांग्रेस के बारे में, उस समय की सरकार के बारे में, 5 साल के बाद वो कहना न्याययोचित उचित नहीं है, लोग ये बात नहीं सुनना चाहते हैं, लोग ये सुनना चाहते हैं कि क्या कारण था कि आपने हमारे विश्वास को तोड़ा है, वायदा खिलाफी की है। देश के अलग-अलग हिस्सों में जहाँ मैं गया हूं, वहाँ से ये बात साफ जाहिर है कि मतदाता इनसे निराश भी है और एक वर्ग है हमारे मतदाताओं का, विशेष तौर से हमारे नौजवान जिनको 2 करोड़ रोजगार का वायदा किया था, पर करोड़ों रोजगार टूटे, किसान और जो वंचित वर्ग है, कमजोर वर्ग है समाज का, वो अपने आपको ठगा हुआ महसूस करते हैं।
प्रधानमंत्री ने केवल विश्वासघात नहीं किया, बल्कि भारत की जनता से धोखा भी किया है। अब वो सब मुद्दों से अलग हटकर केवल राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद की बात करते हैं। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री भारत के मतदाताओं के, भारत की जनता के विवेक और बुद्धिमता को नकारते हैं। अगर उनका सम्मान होता मतदाताओं के विवेक के प्रति तो ये ऐसी गलत बयानी ना करते। क्योंकि आज भी प्रधानमंत्री ने जो कहा है कि पिछली सरकार के समय आए दिन हमले होते थे, इसका कारण क्या है? हमारी खुली चुनौती है उनको और उनके जो बाकी चापलूस मंत्री हैं, किसी मंच से इस पर चर्चा कर लें। सच्चाई ये है कि इनके शासनकाल में देश के ऊपर आतंकवाद के बड़े हमले हुए हैं, इनके कार्यकाल में आतंकवादी घटनाओं में 176 प्रतिशत वृद्धि हुई है। जो 16 बड़े हमले औऱ 1700 से ज्यादा आतंकवाद की घटनाएं हुई हैं और गृहमंत्री ने देश की लोकसभा को ये सूचना दी है, उसमें देश के 426 जवान, ये 2018 तक के आंकड़े हैं, उसमें 2019 के शामिल नहीं है, वो शहीद हुए और लगभग 1400 नागरिक भी उसमें मारे गए। अब प्रधानमंत्री का ये कथन चौंकाने वाला है कि उनके कार्यकाल में कोई बड़ा धमाका नहीं हुआ। प्रधानमंत्री जरा व्याख्या करें कि बड़े धमाके का क्या रुप होना चाहिए? क्या उरी, उधमपुर, पंपोर, गुरदासपुर, पठानकोट, ये अगर बड़े धमाके नहीं थे और पुलवामा तो आप किसका इंतजार कर रहे हैं? ये भारत के लिए मैं कहूंगा कि बड़े दुख की बात है कि हमारे पास एक प्रधानमंत्री हैं जो केवल अपनी बात करते हैं और तथ्यों की जमीनी हकीकत से हमेशा इंकार करते हैं। चाहे माओवादी हमले हैं, उसके भी सरकारी आंकडे हैं, हैरानी की बात है कि परसों गोंदिया में प्रधानमंत्री भाषण दे रहे थे और क्या कहा उन्होंने कि अगर कांग्रेस आती है, कांग्रेस को चुनोगे तो माओवादी हमले बढ़ जाएंगे और कुछ समय बाद गढचिरौली की दुखद घटना हुई और 15 जवान आईईडी के विस्फोट में मारे गए। क्या प्रधानमंत्री जी और वहाँ के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस इस बात का जवाब देंगे कि वहाँ कि जो सीआरपीएफ है, जो स्पेशल टॉस्क फोर्स है, जो इक्विपमेंट उन्होंने मांगी, 2014 से, जिससे आईईडी के विस्फोट को रोका जा सकता है, उसके लिए फंड को एलोकेट नहीं किया गया, पैसा उपलब्ध नहीं कराया गया। हम इस चीज को समझते हैं कि ये चुनाव केवल इस विषय तक सीमित नहीं रह सकता, भारत एक बड़ा देश है, हमारी समस्याएं भी उसी तरह से विशाल हैं, चुनौतियाँ भी हैं देश के सामने और ये अपेक्षा की जाती है कि जो सरकार 5 साल तक सत्ता में रही, वो अपने कार्यकाल का लेखा-जोखा देश के मतदाता को देगी, जिसके लिए प्रधानमंत्री जी बिल्कुल तैयार नहीं हैं। हमारी प्रधानमंत्री से एक विषय पर, मैं कहूंगा कि सख्त आपत्ति है, वो देश को और समाज को बांट रहे हैं। निरतंर 5 साल उनकी विचारधारा और सोच ने हमांरे देश और समाज में लकीरें खड़ी हैं, धर्म की, जाति की, जिससे तनाव और टकराव समाज में बढ़ा है। भारत तब मजबूत होता जब भारत की आंतरिक एकता और आंतरिक सुरक्षा भी मजबूत रहेगी। चुनाव होता है, विचारधारा पर, कार्यक्रम पर, नीति पर, आने वाले 5 साल की रुपरेखा पर। ये पहला चुनाव है और पहले ये प्रधानमंत्री हैं जो हर उस राजनैतिक दल, राजनैतिक नेता जो इनसे सवाल करते हैं, इनकी आलोचना करते हैं, उनकी राष्ट्रभक्ति पर ये सवालिया निशान उठाते हैं। हमारा इनसे आग्रह है, एक ऐसा संवेदनशील विषय है देश की सुरक्षा उस पर भारत को आप मत बांटे। इससे बढ़कर अहित नहीं होगा। 23 तारीख को नरेन्द्र मोदी जी की और इनके मंत्रिमंडल की विदाई हो जाएगी। ये जाती हुई सरकार है और जाती हुई सरकार हर दिन, हर घड़ी और प्रधानमंत्री जी के हर बयान से इस देश की मजबूती को चोट पहुंचे, वो हमें स्वीकार्य नहीं है। जहाँ तक सुरक्षा का प्रश्न है, एकता, अखंडता का, आतंकवाद से लड़ने का, हिंदुस्तान की एक आवाज रही है, पहले भी हम पर हमले हुए, पर उस समय के प्रधानमंत्रियों ने और सरकारों ने विरोध पक्ष पर किसी तरह के आरोप नहीं लगाए। मेरा प्रश्न है कि मुंबई हमले के दो हफ्ते के अंदर हाफिज सईद और लखवी को नेम किया गया, पाबंदी लगाई गई, लशकरे-ए-तैयबा जो संगठन है, उस पर पाबंदी लगी, जमात उल दावा पर पाबंदी लगी, दाऊद इब्राहिम को नेम किया गया, क्या ये डॉ. मनमोहन सिंह का या कांग्रेस पार्टी का एक बयान दिखा सकते हैं कि हमने 2009 में इस विषय पर वोट मांगा हो? कुछ महीनों में तो चुनाव हो गया था, 26/11 की घटना नंवबर 2008 की है औऱ कुछ महीनों में देश का चुनाव आ गया था, पर हमने कोई ऐसी बात नहीं की थी।
भारतीय जनता पार्टी का दिवालियापन है, अब चुनाव में सही है कि नरेन्द्र मोदी उनके नेता है, उस पर कोई आपत्ति नहीं है, ये उस दल को तय करना है, पर क्या कहकर आप वोट मांग रहे हैं? हम न्याय की बात करते हैं, क्योंकि 5 साल अन्याय हुआ है, वायदा खिलाफी हुई है और वो कहते हैं काम रुके नहीं। कौन से काम नहीं रुके, आपने कौन सा काम किया, जरा उसका हिसाब तो दें दें। देश झुके ना, केवल एक व्यक्ति 130 करोड़ लोगों से ऊपर है, ये अधिनायकवाद देश के प्रजातंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित होगा। जो बयान इन्होंने बिहार चुनाव में नोटबंदी के बाद दिया था, वो बयान नरेन्द्र मोदी जी ने फिर दिया कि उनकी जान को खतरा है, प्रधानमंत्री जी की जान को कैसे खतरा हो सकता है, ये सारे देश को बताया जाए? कौन है जो हमारे देश के प्रधानमंत्री के जीवन पर खतरा बन रहा है, कौन सा संगठन है, कौन सा देश है, पूरा देश इनके साथ है। हम तो नरेन्द्र मोदी जी के स्वास्थ्य की और दीर्घआयु की कामना करते हैं और पूरा देश ये चाहता है। हमारे प्रधानमंत्री हैं, कोई नहीं चाहता ऐसा, पर एक बात जरुर है कि हम ये भी चाहते हैं कि आप रहें, पराजय के बाद आपकी जवाबदेही तय हो, आपने जो इस देश की जनता को तकलीफ दी है, उसमें भी आपकी जिम्मेदारी तय की जाए। आपके कार्यकाल में, नरेन्द्र मोदी जी के जो बड़े फैसले हुए हैं, जिससे हिंदुस्तान को नुकसान हुआ है, लोगों को तकलीफ हुई है, चाहे वो नोटबंदी का निर्णय था, जिसको हमने कहा है कि वो एक सबसे बड़ा घोटाला था। किसानों को, गृहणियों को, कर्मचारियों को, छोटे व्यापारियों को हमने पहले भी ये बात बताई थी कि 43 दिन तक लगातार हर दिन 11 करोड़ भारतवासी कतारों में लगे थे। ये सवाल हैं जिनसे वो भाग रहे हैं। वो कभी नहीं कहेंगे कि देश की जीडीपी का 2 प्रतिशत मैंने क्यों खत्म किया, उसके लिए वो माफी मांगने के लिए तैयार नहीं हैं, कितने रोजगार बंद हुए, उसके बाद मजदूर गांव लौट गए, ये बातें याद कराना इस चुनाव में जरूरी है। कई करोड़ रोजगार टूटे उनके इस फैसले के बाद और 6 महीने के अंदर गलत तरीके से जीएसटी थोपी।
श्री शर्मा ने कहा कि सरकार बदलने के बाद ही सब सुधर जाएंगे। अगर पद की गरिमा का अहसास होता मुख्यमंत्री को और थोड़ी लज्जा होती कि एक मुख्यमंत्री वो भी योगी, पहले तो योगी जो सन्यासी होते हैं, उनको राजनीति से मतलब नहीं होना चाहिए। जिसने सन्यास ले लिया हो, वो फिर सत्ता में कैसे आ जाए। तो ये भी एक प्रश्न चिन्ह उठता है कि कितनी गंभीरता से वो अपने सन्यास को लेते हैं और जहाँ तक देश का संविधान है, चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, हम तो उनसे आग्रह करते हैं कि अपने काम को ठीक तरह से करें। योगी आदित्यनाथ जी अगर वो सोचते हैं, मैं सही कहता हूं कि वो भजन करें अपने आश्रम में बैठकर और देश के संविधान का भोजन मत करें, उसका अपमान मत करें। चुनाव गाली देने के लिए भी नहीं होते हैं, चुनाव झूठे आरोप लगाने के लिए भी नहीं होते हैं, चुनाव अपने विरोधियों को अपमानित करने के लिए नहीं होते हैं, चुनाव समाज के अंदर भावनाओं को भड़का कर उन्माद पैदा करने के लिए नहीं होते, चुनाव विचारधारा, विषयों और मुद्दों पर होते हैं।
श्री शर्मा ने कहा कि जो 5 साल में बदइंतजामी हुई है हमारी इकॉनमी की, पहले तो उसका हिसाब हो जाना चाहिए। जो 5 साल में निरंतर देश की अर्थव्यवस्था का सही रुप से प्रबंध नहीं कर सके, जिनके 5 साल के कार्यकाल में भारत की इकॉनमी चरमरा गई है, क्या कारण है वरना कि 2 ट्रिलियन डॉलर से ऊपर की जीडीपी जो 10 साल में 4 गुना हुई थी डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस के कार्यकाल में, वो 5 साल में बढकर दुगनी भी नहीं हुई। एक तथ्य हैं, उनको नकारा नहीं जा सकता है। जो देश के आंकड़े हैं उनसे ये छेड़छाड़ करते हैं, चाहे वो हमारा स्टेटिकल कमीशन के आंकड़े सामने आते हैं तो उसको ये अपने नीति आयोग से बदलवा देते हैं, उससे पूरे विश्व के अंदर भारत के आंकड़ों की विश्वसनियता को बहुत बड़ी चोट पहुंची है और बड़े-बड़े जो हमारे आंकड़े बनाते हैं, स्टेटिकल कमीशन के चेयरमैन और बड़े सदस्य, वो त्यागपत्र देकर मुक्त हो गए हैं। पर जो अभी भी आंकड़े सामने आए हैं ये आप याद रखिएगा एक तो निर्माण से संबंधित हैं, मैन्युफैक्चरिंग से, वो पिछले 5 साल में बहुत कम रही है। निवेश की बात है वो साढ़े 6 प्रतिशत टूटा है, वो पूरे 5 साल में कभी ऊपर गया ही नहीं। जो निर्यात है, एक्सपोर्ट है, जहाँ हम छोड़ कर गए थे, ये वहीं वापस पहुंचे हैं। ये भी एक वास्तविकता है कि रोजगार पैदा नहीं हो रहे हैं, नया कारखाना, उद्योग लग नहीं रहा है। तो इनको दोबारा लाने की गलती ये देश क्यों करेगा

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