राष्ट्रीय

हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल में प्रेमचंद जयंती पर विशेष व्याख्यान, साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता पर हुआ मंथन

कुलपति प्रो. नंदिनी साहू ने कहा-प्रेमचंद का साहित्य आज भी समाज को दिशा देने वाला, प्रो. जितेंद्र श्रीवास्तव ने बताया मानवतावाद का सशक्त स्वर

दिल्ली/हावड़ा। हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल में शुक्रवार को मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. नंदिनी साहू ने की, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू), नई दिल्ली के हिंदी विभाग एवं विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. जितेंद्र श्रीवास्तव उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी ने किया।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. नंदिनी साहू ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद का साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उनके समय में था। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक विषमता, किसानों के शोषण, भ्रष्टाचार, जातिगत भेदभाव और नारी उत्पीड़न जैसे मुद्दों को जिस संवेदनशीलता से उठाया, वे समस्याएं आज भी समाज के सामने चुनौती बनी हुई हैं।

मुख्य वक्ता प्रो. जितेंद्र श्रीवास्तव ने कहा कि प्रेमचंद का मानवतावादी दृष्टिकोण और शोषण के विरुद्ध उनका संघर्ष आज भी साहित्य, समाज और आम जनमानस के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की रचनाएं समाज को न्याय, समानता और मानवीय मूल्यों की ओर अग्रसर होने का संदेश देती हैं।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी ने कहा कि समकालीन संदर्भ में भी प्रेमचंद की प्रासंगिकता अक्षुण्ण बनी हुई है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद केवल ‘उपन्यास सम्राट’ ही नहीं, बल्कि समाज के सच्चे चिकित्सक भी थे। वैश्वीकरण और बाजारवाद के वर्तमान दौर में उनकी यथार्थवादी दृष्टि समाज को आत्ममंथन और मानवीय संवेदनाओं की ओर लौटने की प्रेरणा देती है।

कार्यक्रम के अंत में डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।

लेखिका : डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी

अतिथि प्राध्यापिका, हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल

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