संजय शर्मा दरमोड़ा मातृभूमि के प्रति अपना कर्तव्य समझते हैं समाज सेवा को

सुप्रीम कोर्ट के प्रख्यात अधिवक्ता संजय शर्मा दरमोड़ा आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। उन्होंने अपने कृतित्व से यह साबित कर दिया है कि उत्तराखण्ड रत्नगर्भा है। विगत लगभग ढाई दशकों से वकालत में नाम कमा रहे संजय शर्मा दरमोड़ा की जन्मभूमि दरम्वाड़ी धन्य है। श्री शर्मा का जन्म उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग जनपद के दम्वाड़ी गॉव में हुआ। उनकी प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा राजकीय इण्टर कॉलेज मयकोट में हुई। वे आज भी अपने विद्यालय आते-जाते रहते हैं। यह उत्तराखण्ड की प्राकृतिक भौगोलिकता का ही प्रभाव है कि वह अपने सामाजिक सरोकारों को भी काफी गंभीरता से निभा रहे हैं। वर्तमान में वह न केवल भारत की अदालतों में ही नहीं अपितु योरोपिय देशों में भी वकालत में नाम कमा रहें हैं।
मृदुभाषी संजय शर्मा वर्तमान में उत्तराखण्ड में अनेक समाजसेवी संस्थाओं तथा सांस्कृतिक संस्थाओं के माध्यम से अपने सामाजिक सरोकारों को निभा रहे हैं। श्री शर्मा की यह खासियत है कि जब वह अपने समाज के बीच होते हैं या फिर उत्तराखण्डी द्वारा आयाजित किसी कार्यक्रम को संबोधित कर रहे होते हैं, तो वह अपनी मातृभाषा में ही अपना संबोधन प्रस्तुत करते हैं। श्री शर्मा ने एक भेंट के दौरान बताया कि पिछले 29 वर्षों के दौरान सायद ही उन्होंने कभी हिंदी में कुछ पढ़ा हो परंतु जब वह अपने समाज के मध्य होते हैं या अपने परिजनों के मध्य होते हैं तो स्वाभाविक तौर पर अपनी मातृभाषा में बातचीत करने लगते हैं। इसके लिये उन्हें अलगे से कभी कोई प्रयास नहीं करना पड़ा। यह उनकी एक स्वाभाविक आदत है।
संजय शर्मा ने कहा कि यह हमारी विडंबना ही कही जायेगी कि हमारी आज की किशोरवय पीढ़ी को विशेष कक्षाएं लगाकर मातृभाषा की सीख देनी पड़ रही है। उन्होंने कहा कि इन कक्षाओं में मातृ भाषा सिखाने का कार्य भी अंग्रेजी या हिंदी के जरिये हो रहा है। श्री शर्मा ने बातचीत के दौरान बताया कि वह किसी भाषा को लेकर दुराग्रही नहीं हैं। श्री शर्मा का मानना है कि भाषा हमारी भाावनाओं की अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। हम अपनी भावनाओं को दूसरों तक संप्रसित करने के लिए भाषा का उपयोग करते हैं। संजय शर्मा ने कहा कि भारतीय जहॉ आज अंग्रेजी की ओर उन्मुख हैं वहीं अन्य योरोपिय मुल्क अंग्रेजी के ऐसे दीवाने नहीें हैं। यहां तक कि फ्रांस की राजधानी पेरिस में भी फ्रांसीसी लोग अपनी मातृभाषा फ्रेंच में ही बातचीत करना पसंद करते हैं। विश्व का प्रत्येक विकसित मुल्क अपनी मातृभाषा में ही अपनी शिक्षा-दीक्षा के कार्यक्रम संचालित करता है। चाहे वह जापान हो, कोरिया हो, चीन हो या फिर अमरीका या अन्य योरोपिय देश हों , सभी मुल्क अपनी मातृभाषा में ही अध्ययन-अध्यापन को प्रमुखता देते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी उत्तराखण्डी भाषाएं काफी मीठी और समृद्ध हैं परंतु हम स्वयं ही आज अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति लापरवाह होते जा रहे हैं।
वर्तमान में श्री शर्मा दिल्ली स्थित उच्चतम न्यायालय में वकालत करते हैं। वह उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ एवं मान्य अधिवक्ताओं में सुमार किये जाते हैं। वह अपनी अतिव्यस्त कार्यशैली के बावजूद उत्तराखण्ड में समाजसेवी कार्यों के लिए भी पर्याप्त समय निकाल लेते हैं। उत्तराखण्ड की अनेक शिक्षण संस्थाओं व सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं एवं किसानों को श्री शर्मा द्वारा विभिन्न प्रकार की सहायताएं एवं प्रोत्साहन दिया जा रहा है। दिल्ली स्थित समाजसेवी संस्थाओं को भी वे यथासंभव सहायता प्रदान करते रहते हैं।
सादगी पसंद संजय शर्मा का मानना है कि प्रतिभाएं प्रगति और अवसर के लिए पलायन करती हैं यह एक समाज शास्त्रीय नियम है, परंतु वर्तमान में उत्तराखण्ड में हो रहे अंतर्राज्यीय पलायन से सामाजार्थिक व जनांकिकीय असंतुलन बढ़ रहा है। श्री शर्मा ने कहा कि रोजगारशुदा ग्रामीण लोग सड़कों से सटे हुए कस्बों व नगरों में आकर बसने लगे हैं। उन्होंने कहा कि पलायन का अभिप्राय अपनी भाषा व संस्कृति को त्यागना नहीं है बल्कि उन्हें प्रसारित करना है। श्री शर्मा को भविष्य में उत्तराखण्ड में राजनीतिक प्रतिनिधित्व करते हुए देखना काफी सुखद होगा। वर्तमान में उत्तराखण्ड में सकारात्मक व विधायक राजनीति का अभाव सा हो गया है। उत्तराखण्ड में आज राजनीति को समाजसेवा और नागरिक सेवा का माध्यम नहीं बल्कि एक रोजगार के रूप में देखा जा रहा है।

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