उत्तराखण्ड

गांव की मिट्टी से जुड़कर सफलता की नई मिसाल बने मदनलाल (बटन)

ग्राम कुमाल्डी के युवा उद्यमी ने स्वरोजगार से बदली तस्वीर, ग्रामीणों को गांव में ही मिल रही आवश्यक सुविधाएं, युवाओं के लिए बने प्रेरणास्रोत

अमर चंद्र

दिल्ली/पौड़ी गढ़वाल (रिखणीखाल)। उत्तराखंड की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता से नहीं, बल्कि यहां के मेहनती, ईमानदार और संघर्षशील लोगों से भी है। देवभूमि का हर गांव अपने भीतर ऐसी अनेक प्रेरक कहानियां समेटे हुए है, जो यह साबित करती हैं कि यदि मन में कुछ कर दिखाने का जज्बा हो तो सीमित संसाधन भी सफलता की राह में बाधा नहीं बनते। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी है जनपद पौड़ी गढ़वाल के विकासखंड रिखणीखाल की ग्राम पंचायत कुमाल्डी के निवासी मदनलाल (बटन) की।पढ़ाई पूरी करने के बाद मदनलाल के सामने भी दो रास्ते थे एक, रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन करना और दूसरा, अपने गांव में रहकर कुछ नया करने का साहस दिखाना। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। अपने गांव, अपनी मिट्टी और अपने लोगों पर भरोसा करते हुए उन्होंने “पहाड़ी ग्रामीण सेवा एवं उद्योग” की शुरुआत की।
आज उनकी यह पहल गांव और आसपास के लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यहां शुद्ध पहाड़ी मसाले, अनाज की कटाई-पिसाई, धान की लाई-पिलाई, परचून का सामान तथा लोहार के विभिन्न कार्य जैसी अनेक सुविधाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध हैं। पहले जिन छोटे-छोटे कामों के लिए लोगों को कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता था, अब वे सुविधाएं गांव के पास ही मिल रही हैं। इससे ग्रामीणों का समय भी बच रहा है और खर्च भी कम हो रहा है।
मदनलाल का मानना है कि मेहनत, ईमानदारी और लगन से किया गय। कोई भी काम छोटा नहीं होता। यदि इंसान अपने गांव, अपने लोगों और अपनी जमीन पर भरोसा रखे तो वह यहीं रहकर सम्मानजनक जीवन जी सकता है। उनका कहना है कि गांव छोड़कर शहर जाना ही सफलता का एकमात्र रास्ता नहीं है। अपने गांव में रहकर भी रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं और दूसरों के लिए प्रेरणा बना जा सकता है।
आज मदनलाल का संघर्ष और सफलता क्षेत्र के युवाओं के लिए एक प्रेरणा है। उन्होंने यह साबित किया है कि स्वरोजगार केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने का माध्यम नहीं, बल्कि गांव के विकास का भी सशक्त रास्ता है। उनकी सोच है कि यदि गांव का हर युवा अपनी क्षमता के अनुसार कोई छोटा या बड़ा काम शुरू करे, तो पलायन भी रुकेगा, स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा और गांवों की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।
मदनलाल की यह यात्रा केवल एक दुकान चलाने की कहानी नहीं है, बल्कि आत्मविश्वास, मेहनत, ईमानदारी और अपने गांव के प्रति समर्पण की प्रेरक मिसाल है। ऐसे लोग ही उत्तराखंड की असली पहचान हैं, जो अपनी कर्मभूमि को छोड़ने के बजाय उसे आगे बढ़ाने का संकल्प लेकर समाज के लिए नई राह तैयार करते हैं।

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