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इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के सौजन्य से प्रकाशित हिमांशु जोशी की पुस्तक ‘कुमाऊनी रामलीला’ का लोकार्पण सम्पन्न

सी एम पपनैं

नई दिल्ली। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के सौजन्य से वरिष्ठ रंगकर्मी-गायक हिमांशु जोशी द्वारा किए गए शोध, संकलन पर रचित तथा डाॅ रमाकर पंत द्वारा संपादित पुस्तक ‘कुमाऊनी रामलीला’ प्रकाशित पुस्तक का लोकार्पण 29 अक्टुबर की सांय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र अध्यक्ष राम बहादुर राय की अध्यक्षता, विशेष अतिथि प्रो.पुष्पेश पंत, प्रो.के अनिल कुमार विभागाध्यक्ष जनपद संपदा विभाग तथा डाॅ सच्चिदानंद जोशी सदस्य सचिव आई जी राष्ट्रीय कला केन्द्र के कर कमलो राष्ट्रीय कला केन्द्र के ‘समवेत’ सभागार में सम्पन्न हुआ।

पुस्तक लोकार्पण समारोह का श्रीगणेश मंचासीन अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर तथा
डाॅ रमाकर पंत द्वारा विशेष अतिथि प्रो.पुष्पेश पंत तथा पुस्तक रचयिता हिमांशु जोशी को शाल ओढा कर किया गया।

व्यक्त किए गए संबोधन मे डाॅ रमाकर पंत द्वारा मंचासीन अतिथियों व सभागार मे उपस्थित सभी प्रबुद्ध जनो का स्वागत अभिनंदन कर, प्रकाशित पुस्तक ‘कुमाऊनी रामलीला’ के प्रकाशन, पुस्तक की महत्ता व किए गए डिजीटल कार्य पर सारगर्भित प्रकाश डाल कर, रचयिता हिमांशु जोशी के शोध व 382 रचना संकलन कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा कर, रचनाकार को बधाई दी गई। अवगत कराया गया, पुस्तक का मुद्रण कार्य चुनौती व जटिलता पूर्ण रहा। आई जी राष्ट्रीय कला केन्द्र के संपदा विभाग के यथा सम्भव सहयोग से प्रकाशन कार्य सम्पन्न हो पाया है।

पुस्तक लोकार्पण के इस अवसर पर डाॅ सच्चिदानंद जोशी द्वारा व्यक्त किया गया, केन्द्र की 1998, 2002 व 2008 की योजनाऐ अभी चल ही रही हैं। जो पूर्ण हो चुकी हैं, उनका प्रकाशन पूर्ण हो चुका है। अवगत कराया गया, हिमांशु जोशी द्वारा रचित किताब को प्रकाशित होने मे चौदह वर्ष लग गए हैं। प्रकाशन कार्य भव्य हुआ है। जिसे करने मे श्रम लगा है। आज इस पुस्तक को पूर्णता प्राप्त हुई है। जिनके हाथो मे पुस्तक जायेगी वे आकलन करैंगे। व्यक्त किया गया, प्रकाशित पुस्तक पोथी रूप मे है, जो गोस्वामी तुलसीदास के रामायण से आगे बढी है। प्रकाशित पुस्तक उत्तराखंड कुमाऊ अंचल की संस्कृति का तानाबाना बुनती है। रचना कार्य श्रम से हुआ है। आज पारंपरिक चीजे छूट रही हैं। जड़ से जुड़ना आवश्यक है, तभी प्रगति सुनिश्चित है।

विशेष अतिथि प्रो.पुष्पेश पंत द्वारा व्यक्त किया गया, पुस्तक रचयिता हिमांशु जोशी को यह विधा विरासत मे मिली है, जिसे आगे बढ़ाने का उन्होंने प्रशंसनीय कार्य किया है, जो स्वागत योग्य है।

प्रो.पुष्पेश पंत द्वारा व्यक्त किया गया, रामलीला उत्तराखंड के लोगों की आस्था का सबसे बड़ा सम्बल रहा है। जिसको मंचित करना, देखना, सुनना और जीवन मे उतारना उत्तराखंडी लोगो की मानसिकता का आदर्श है। दस दिनी रामलीला की गायन शैली व रागों की महत्ता को देखते हुए, जो प्रत्येक उत्तराखंडी मे आत्मसात है, इस पारंपरिक शैली की रामलीला को मंचित करना किसी चुनौती से कम नही है।

प्रो.के अनिल कुमार द्वारा सभी उपस्थित प्रबुद्ध जनो का आभार व्यक्त करने के बाद, हिमांशु जोशी द्वारा हार्मोनियम वादक मनीष कुमार व तबला वादक शांति भूषण के वाद्य संगत में ‘कुमाऊनी रामलीला’ गायन का श्रीगणेश श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन…। श्रीराम वंदना से किया गया। ततपश्चात विभिन्न रागों पर आधारित कुमाऊनी रामलीला गीत नाट्य के विभिन्न रोचक अंशों का प्रभावशाली गायन कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर, रचित पुस्तक की सार्थकता को सिद्ध किया गया।

आयोजन के इस अवसर पर हिमांशु जोशी द्वारा कुमाऊनी रामलीला के आंचलिक ऐतिहासिक तथ्यों व गीत नाट्य मे पिरोये गए सभी शास्त्रीय रागों व वंदिशो को गाकर, सविस्तार प्रकाश डाला गया। बाल्यकाल से माता-पिता द्वारा रंगकर्म के क्षेत्र मे दिए गए प्रोत्साहन, मामा मोहन उप्रेती व भगवत उप्रेती द्वारा दिए गए गीत-संगीत विधा के ज्ञान व प्रेम मटियानी के द्वारा दिए गए मार्गदर्शन के बावत तथा गीत-संगीत के क्षेत्र मे इस मुकाम तक पहुचने की उक्त जनो की प्रेरणा से अवगत कराया गया।

व्यक्त किया गया, उत्तराखंड कुमाऊ अंचल गीत नाट्य शैली की रामलीला अपने आप मे बहुत सशक्त रही है। मानस के पद व चौपाइयों पर आधारित गेय शैली मे दस रात्रियों तक क्रमशः विभिन्न रागों के गायन पर आधारित यह रामलीला विश्व का सबसे बड़ा गेय नाट्य है।

बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सांस्कृतिक संस्था ‘पर्वतीय कला केन्द्र’ दिल्ली से हिमांशु जोशी जुडे रहे हैं। वर्तमान मे इस ख्याति प्राप्त सांस्कृतिक संस्था के उपाध्यक्ष पद पर विराजमान हैं।

सन 1985 मे प्रख्यात संगीतकार मोहन उप्रेती के संगीत निर्देशन व सु-विख्यात नाट्य निर्देशक बी एम शाह के नाट्य निर्देशन मे पर्वतीय कला केंद्र द्वारा मंचित ‘कुमाऊनी रामलीला’ मे हिमांशु जोशी द्वारा लक्ष्मण का किरदार निभा कर ख्याति अर्जित की गई थी। इस गेय प्रधान रामलीला के अनेक शो देश-विदेश के अंतरराष्ट्रीय रंगमंचों पर ‘पर्वतीय कला केंद्र’ द्वारा मंचित किए गए थे, जिनमे हिमांशु जोशी द्वारा प्रतिभाग किया गया था।

हिमांशु जोशी द्वारा विश्व विख्यात गेय प्रधान ‘कुमाऊनी रामलीला’ को एक नया आयाम देकर प्रभावशाली कार्य किया गया है। इस पारंपरिक गीतनाट्य शैली की रामलीला की संरचना मे जो रागों की विविधता है, जिसे सभी पात्र गाकर चरित्रों का विकास करते हैं, इस रामलीला की मुख्य पहचान है। इस विधा की बारीकियों, विशेषताओ और मौलिकता को कायम रख, इस गीत नाट्य विधा को और सम्रद्ध करने की कोशिश मे हिमांशु जोशी के शोध व संकलन कार्य को सराहा जा सकता है। आधुनिक रंगमंच पर इस गेय प्रधान कुमाऊनी रामलीला के आकर्षण और ख्याति मे और वृद्धि होगी, श्रोतागण इस रामलीला का पहले से ज्यादा रसा स्वादन करैंगे, आनंद उठायैंगे सोचा जा सकता है।
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