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बांस ने बदली तस्वीर: हरित तनों से खड़े हो रहे रोजगार, उद्यम और आत्मनिर्भरता के नए रास्ते

खेती से कारोबार तक बांस बना ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार, महिलाओं और युवाओं को मिल रहे नए अवसर

 

हेना पांडे

नई दिल्ली। कभी पारंपरिक शिल्प और ग्रामीण जीवन का हिस्सा माना जाने वाला बांस अब देश में रोजगार, उद्यमिता और आत्मनिर्भरता का नया माध्यम बनकर उभर रहा है। सरकारी नीतियों, तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार से जुड़ाव ने बांस को केवल कच्चे संसाधन से आगे बढ़ाकर एक संभावनाशील आर्थिक क्षेत्र में बदल दिया है।

बांस क्षेत्र में बदलाव की तस्वीर देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आ रही है। असम की विशाखा दीदी ने स्वयं सहायता समूह से जुड़कर अपने परिवार के बांस शिल्प कारोबार को नए डिजाइन के साथ आगे बढ़ाया और 2025 में भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में बांस उत्पादों की बिक्री से 2 लाख रुपये की कमाई की।

वहीं मध्य प्रदेश के विजय पाटीदार ने पारंपरिक खेती में नुकसान के बाद बांस की खेती अपनाई। बांस मिशन के सहयोग से उन्होंने करीब 4,000 पौधे लगाए और दो वर्षों के भीतर बांस की बल्ली बेचकर लगभग 75 हजार रुपये की आय अर्जित की। खास बात यह रही कि बांस के साथ उन्होंने मिर्च, शिमला मिर्च, अदरक और लहसुन जैसी अंतर्फसलें भी उगाईं।

महिलाओं के लिए बना आत्मनिर्भरता का जरिया

महाराष्ट्र के गढ़चिरोली में बांस आधारित अगरबत्ती पहल ने महिलाओं के लिए रोजगार के नए द्वार खोले। 32 उत्पादन केंद्रों में करीब 1,100 लोग जुड़े, जिनमें लगभग 90 प्रतिशत महिलाएं थीं। इससे महिलाओं की आय, कौशल और आत्मविश्वास में वृद्धि हुई तथा उन्हें अपने घर के आसपास रोजगार के अवसर मिले।

सरकार की ओर से राष्ट्रीय बांस मिशन, प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग के माध्यम से खेती, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच को बढ़ावा दिया जा रहा है। इंजीनियर्ड बांस का इस्तेमाल अब फर्नीचर से लेकर निर्माण और आपदा राहत तक में होने लगा है।

बांस अब सिर्फ पौधा नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था की नई संभावना

बांस की यह बदलती कहानी बताती है कि जब परंपरागत संसाधन को तकनीक, प्रशिक्षण, बाजार और उद्यमिता से जोड़ा जाता है तो वह हजारों परिवारों के लिए आजीविका का मजबूत आधार बन सकता है।

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