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नई शिक्षा नीति शोध, नवाचार और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को नई दिशा दे रही है
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल हिंदी विश्वविद्यालय की कुलपति, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) की प्रोफेसर, अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवयित्री, साहित्यकार एवं लोक संस्कृति की विदुषी प्रो. नंदिनी साहू ने अमर संदेश से विशेष बातचीत में कहा कि भारत की पहचान केवल उसकी आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि उसकी हजारों वर्षों पुरानी ज्ञान परंपरा, साहित्य, लोक संस्कृति और मानवीय मूल्यों से भी है। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा पीढ़ी आधुनिक तकनीक के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी समझे और उससे जुड़े।
प्रो. साहू ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि संवेदनशील, जागरूक और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है। नई शिक्षा नीति विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान प्रणाली, अनुसंधान, नवाचार और वैश्विक दृष्टिकोण से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही है।
उन्होंने बताया कि अंग्रेजी साहित्य, लोक साहित्य, संस्कृति अध्ययन, तुलनात्मक साहित्य, बाल साहित्य, भारतीय ज्ञान प्रणाली तथा दूरस्थ शिक्षा जैसे विषय उनके शोध और अध्यापन के प्रमुख क्षेत्र रहे हैं। इन्हीं विषयों पर उन्होंने दो दर्जन से अधिक पुस्तकों का लेखन एवं संपादन किया है, जिन्हें देश-विदेश में व्यापक सराहना मिली है।
अमर संदेश से बातचीत में प्रो. नंदिनी साहू ने कहा कि भारतीय लोक परंपराएं हमारी सांस्कृतिक पहचान की आधारशिला हैं। यदि इन्हें नई पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुँचाया गया तो आने वाले समय में हमारी सांस्कृतिक विरासत प्रभावित हो सकती है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति के प्रति उत्तरदायी पीढ़ी तैयार करना भी है।
उन्होंने कहा कि साहित्य मनुष्य को संवेदनशील बनाता है और समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनता है। कविता, कहानी और लोक साहित्य समाज के अनुभवों और मानवीय मूल्यों का जीवंत दस्तावेज हैं। इसलिए विद्यार्थियों को नियमित रूप से पढ़ने, लिखने और शोध कार्य में सक्रिय भागीदारी करनी चाहिए।
प्रो. साहू ने कहा कि भारतीय साहित्य आज विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान बना रहा है। भारतीय लेखकों, कवियों और शोधकर्ताओं की रचनाएं अनेक भाषाओं में अनूदित हो रही हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें सम्मान मिल रहा है। यह भारतीय संस्कृति की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी अत्यंत उपयोगी है। विश्वविद्यालयों में इस विषय पर गंभीर शोध और संवाद की आवश्यकता है, ताकि युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ते हुए आधुनिक विश्व की चुनौतियों का भी सफलतापूर्वक सामना कर सके
बातचीत के दौरान प्रो. नंदिनी साहू ने रचनात्मक लेखन को व्यक्तित्व विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए कहा कि प्रत्येक विद्यार्थी को अपनी भाषा और अभिव्यक्ति पर निरंतर कार्य करना चाहिए। लेखन समाज को दिशा देने का सशक्त माध्यम है और एक अच्छा लेखक हमेशा समाज की आवाज बनकर उभरता है।
उल्लेखनीय है कि प्रो. नंदिनी साहू वर्तमान में पश्चिम बंगाल हिंदी विश्वविद्यालय की कुलपति हैं। इससे पूर्व वे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) में प्रोफेसर एवं स्कूल ऑफ फॉरेन लैंग्वेजेज की निदेशक रह चुकी हैं। उन्हें अंग्रेजी साहित्य और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
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