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कैसे बचेगा हमारा राष्ट्रीय पशु बाघ ? –ज्ञानेन्द्र रावत

लेखक :ज्ञानेन्द्र रावत ,वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद

देश में आज बाघ संकट के दौर से गुजर रहा है। कारण इस साल जनवरी से अब तक देश में 58 बाघों की मौत हो चुकी है। इनमें 26 ने टाईगर रिजर्व क्षेत्र के बाहर अपनी जान गंवाई है। सरकारी आंकड़े तो यही दावा कर रहे हैं।असलियत यह है कि कहीं वह अवैध शिकार तो कहीं वह बीमारी के चलते, कहीं संक्रमण से, कहीं उनके लिए जंगल छोटे पड़ने, कहीं उनका क्षेत्र छोटे पड़ने या अस्तित्व की लड़ाई में, कहीं शिकार और पानी की कमी के कारण जंगल से बाहर जाने से मानव से हो रहे संघर्ष के चलते अपनी जान गंवा रहे हैं।गौरतलब है कि एक समय विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुका राष्ट्रीय पशु बाघ बाघ संरक्षण परियोजना के चलते देश में उसकी तादाद दुनिया में आज 75 फीसदी से ज्यादा पहुंच गयी है। यह गर्व का विषय है जबकि 1950 के दशक में एक अनुमान के मुताबिक देश में बाघों की तादाद 40,000 तक थी लेकिन उसी दौर में इनके लगातार शिकार और आवास के खात्मे के चलते इनकी तादाद में तेजी से गिरावट आनी शुरू हो गयी थी। यदि 1972 की जनगणना की बात करें तो आंकड़ों के मुताबिक इनकी तादाद देश में कुल 1,827 तक गिरकर पहुंच गयी थी। वन्यजीव विशेषज्ञों की मानें तो 1972 से पहले 1970 के दौर में देश में यह कुल मिलाकर 268 के आसपास थे। 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के बाद इनकी तादाद में बढ़ोतरी होना शुरू हुयी जिसने लगभग चार दशक के दौरान कीर्तिमान बनाया और इनकी तादाद 3,682 तक जा पहुंची। वह बात दीगर है कि इस दौरान बीच-बीच में अभयारण्यों से या फिर उसके बाहर से इनके गायब होने के समाचार भी सुर्खियां बनते रहे हैं। इनमें यौनवर्धक दवाओं की खातिर इनके अंगों और खालों की तस्करी के चलते इनके शिकार के मामले आम रहे हैं। इस बीच राजस्थान के रणथंभौर अभयारण्य से लगभग 28 से ज्यादा की तादाद में बाघों के गायब होने का मामला भी काफी चर्चित रहा । इसे बाघ प्राधिकरण की सदस्या सांसद दीया कुमारी ने जोर-शोर से उठाया था।

आज सबसे ज्यादा दुखदायी बात यह है कि देश में बाघों का कुनबा 3000 का आंकड़ा पार किये जाने के बावजूद आज सबसे बड़ा सवाल यह सामने आ खड़ा हुआ है कि अब यह बचेगा कैसे? क्योंकि अब इनकी तादाद में दिनोंदिन कमी आती जा रही है। वह बात दीगर है कि उसके कारण प्राकृतिक हों या मानवीय। इस साल के शुरूआती तीन महीनों का ही जायजा लें तो पाते हैं कि अकेले मध्य प्रदेश में ही 18 बाघों की मौत और बीते साल 2025 में तकरीब 166-167 से ज्यादा बाघों की मौत बाघ संरक्षण के सरकारी दावों पर सवालिया निशान लगाता है। यदि 2020 से 2025 के बीच के इन पांच सालों का जायजा लें तो इस दौरान देश में कुल मिलाकर 628 से 632 बाघों से ज्यादा की मौत हुयी। कुछ रिपोर्टें और वन्यजीव विशेषज्ञों की मानें तो यह आंकड़ा 800 से भी ज्यादा है। बीते पांच सालों में सबसे ज्यादा यानी 224 से भी अधिक बाघों की मौत बाघों के मामले में ‘टाइगर स्टेट’ के नाम से विख्यात मध्य प्रदेश में हुयीं हैं। यहां अकेले 2025 में ही कुल 55 बाघों की मौत सवालों के घेरे में है। इसके पीछे वन विभाग द्वारा बाघों का उनके अंगों और खालों की विदेशी बाजार में बढ़ती मांग के चलते अवैध शिकार, क्षेत्र पर कब्जे को लेकर हुए उनके आपसी संघर्ष, प्राकृतिक हालात, बुढ़ापा, बीमारी, सड़क या रेल हादसों, रिहायशी इलाकों में घुसपैठ, फसलों की सुरक्षा हेतु किसानों द्वारा खेतों की मेंड़़ पर लगाये बिजली के तारों से करंट लगने और जहर दिये जाने को मुख्य कारण बताया जा रहा है।

यदि नेशनल टाईगर कंजर्वेशन अथारिटी की मानें तो इस साल 2026 के इन तीन महीनों में यानी मार्च तक देश में कुल 46 बाघों की मौत हुयी है जिनमें 18 की मौत तो टाईगर स्टेट का तमगा हासिल कर चुके मध्य प्रदेश में ही हुयी हैं। यह मध्य प्रदेश के टाईगर स्टेट के रुतबे पर ही सवाल खड़े करता है। यही नहीं मध्य प्रदेश के ही कान्हा टाईगर रिजर्व मे पिछले 15 दिनों में एक बाघिन व उसके चार शावकों की मौत से वन्य प्राणी विशेषज्ञ हैरत में हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है। इस बारे में कान्हा बाघ प्रबंधन की मानें तो टी-141 नामक बाघिन और उसके चार शावकों की मौत फेफड़ों के संक्रमण के चलते हुयी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से इसका खुलासा हुआ है। सूत्रों की मानें तो 21 अप्रैल को यह बाघिन अपने चार शावकों के साथ सरही जोन में दिखी थी। वह काफी कमजोर थी और ठीक से चल फिर भी नहीं पा रही थी। उसके बाद एक के बाद एक एक साल की उम्र के कुल चार शावकों सहित बाघिन की मौत से प्रबंधन इस बात से चिंतित है कि आखिर यह संक्रमण आया तो आया कहां से? यह संक्रमण किसी अन्य जीव से आया या फिर जंगल के किसी हिस्से में इस संक्रमण का स्रोत है। प्रबंधन इस बात का पता लगाने की कोशिश में जुटा है।

यदि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की मानें तो बीते पांच सालों में क्रमश: 2021 में देश में 34, जबकि कुछ रिपोर्ट के मुताबिक यह आंकड़ा 127 बाघों की मौत होना बताता है। 2022 में 43, 2023 में 45 जबकि कुछ जानकारों और आंकड़ों के मुताबिक इस साल 182 बाघ मारे गये, 2024 में 46 और 2025 में कुल 166-167 से ज्यादा बाघों की मौत हुईं। बाघों की मौत के मामले में जहां मध्य प्रदेश शीर्ष पर है, वहीं महाराष्ट्र दूसरे पायदान पर है। यह कम चिंतनीय नहीं है। प्राधिकरण व देश के विभिन्न समाचार पत्रों की रिपोर्ट के अनुसार देश में 2022-2023 के आंकड़ों के मुताबिक देश में बाघों की कुल आबादी 3,682 थी जो दुनिया में बाघों की कुल तादाद का 75 फीसदी से भी ज्यादा है। यह तादाद बीते 16 वर्षों में 1,411 से बढ़कर 3,682 तक जा पहुंची है। यह बाघ संरक्षण अभियान की सफलता का प्रमाण है। गौरतलब है कि हमारे देश मे कुल टाईगर रिजर्व की तादाद 58 से ज्यादा है। जहां तक बाघों की राज्यवार तादाद का सवाल है मध्य प्रदेश इसमें शीर्ष पर है। यहां कुल बाघों की तादाद 785 है जबकि कर्नाटक में 563, उत्तराखंड में 560, महाराष्ट्र में 444 और तमिलनाडु में 306 हैं। शेष देश के दूसरे राज्यों में हैं जबकि इनकी तादाद मध्य प्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखंड, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में सर्वाधिक है। 

यह सच है कि भारत के बाघ संरक्षण अभियान की समूची दुनिया में धाक है। पिछले दशकों में बढ़ी बाघों की तादाद इसका जीता जागता सबूत है लेकिन इस बीच टाईगर स्टेट में बाघों की लगातार बढ़ता मौतों का आंकड़ा बाघों की निगरानी और सुरक्षा पर सवालिया निशान खड़े करता है। 7 जनवरी 2026 से 6 अप्रैल 2026 के बीच हुयी बाघों की 18 मौतों का आंकड़ा कुल बाघ आबादी का लगभग 2.30 फीसदी है। इस दौरान देश भर में 46 बाघों की मौत हुयी जो कुल बाघ आबादी का 7.29 फीसदी है। कहने का तात्पर्य यह है कि बाघों की मौत के मामले में मध्य प्रदेश के हालात बेहद गंभीर हैं। इसका सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अधिकांश मामलों में बाघों के शव एक हफ्ता या उससे भी ज्यादा समय बाद मिल रहे हैं। हाल- फिलहाल की घटना सतपुड़ा टाईगर रिजर्व में एक बाघ का शव 23 दिन बाद मिलने की है। उमरिया जिले के चंदिया रेंज के जंगल में मिला बाघ का शव भी एक हफ्ते पहले का ही था और कान्हा से भी मिला एक बाघिन का शव भी काफी पुराना था। कुछ के शव तो सड़े-गले हालात में मिले हैं। इससे जाहिर होता है कि बाघों की सुरक्षा को लेकर वन विभाग कितना चौकस है। यह तो नियमित मानीटरिंग न किये जाने को ही जाहिर करती है।

दरअसल मध्य प्रदेश में हुयी 18 बाघों की मौतों में ज्यादातर मामले तो उनके शिकार से ही जुड़े हैं। छिंदवाड़ा के तामिया में रेडियो कालर लगे बाघ और चंदिया में मिला बाघ का शव शिकार का ही मामला है। राज्य में बाघों की हुयी 18 मौतों में से 6 तो अकेले उमरिया में ही हुयी हैं और 8 बांधवगढ में हुयी हैं। इस बाबत मुख्य वन संरक्षक स्वीकारते हैं कि बाघों की मौतों का यह आंकड़ा चुनौतीपूर्ण है। वे इनकी नये सिरे से जांच की बात करते हैं। दुख इस बात का है कि इस मामले में सरकार का मौन समझ से परे है। ऐसे हालात में राष्ट्रीय पशु बाघ बचेंगा तो कैसे? यही चिंता और विचार का विषय है।

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