उत्तराखंड के जननायक डाॅ शमशेर सिंह बिष्ट की दूसरी बरसी पर ‘शमशेर स्मृति व्याख्यान’

सी एम पपनैं

नई दिल्ली। उत्तराखंड के जनसंघर्षो के जननायक डाॅ शमशेर सिंह बिष्ट की दूसरी बरसी पर वेबिनार द्वारा ‘शमशेर स्मृति व्याख्यान 2020’ का आयोजन किया गया। नैनीताल समाचार संपादक राजीव लोचन साह तथा इतिहासकार डाॅ शेखर पाठक द्वारा वेबिनार मे जुडे प्रबुद्ध जनो को अल्मोड़ा मे नगरवासियो द्वारा स्व.शमशेर बिष्ट की श्रधाञ्जलि सभा के बावत अवगत कराया गया। वेबिनार द्वारा स्व.शमशेर बिष्ट के साथ-साथ विगत महीनों मे उत्तराखंड की अनेक विभूतियों पानू खोलिया, पुरुषोंतम असनोडा, त्रिपेन सिंह रावत, नित्यानंद मैठाणी, हीरासिंह राणा, जीतसिंह नेगी, हिमांशु जोशी, उपेन्द्र पुन्डीर, श्रीकृष्ण जोशी, नवीन बन्जारा, पी सी जोशी, पार्वती जोशी, मंजुल कुमार, सुरेन्द्र सिंह रावत, सुरेन्द्र पुरी व स्वामी अग्निवेश इत्यादि के आकस्मिक निधन पर सामूहिक श्रधाञ्जलि अर्पित की गई।

‘शमशेर स्मृति व्याख्यान 2020’ के अंतर्गत ‘हिमालय का पारिस्थितिकी तंत्र और चारधाम परियोजना’ विषय पर मुख्य वक्ता डाॅ नवीन जुयाल द्वारा सारगर्भित व्याख्यान से पूर्व, संघर्षो के साथी रहे, स्व.शमशेर बिष्ट को श्रधाञ्जलि अर्पित की गई। उनके साथ बिताए दिनों व उनके सामाजिक सरोकारों व पर्यावरणीय चेतना जगाने के अथक प्रयासो को याद किया गया। डाॅ जुयाल ने अवगत कराया, कैसे वे वनों व नदियों को बचाने के लिए एकजुट होकर, संघर्षरत रहते थे। उन्होंने व्यक्त किया, शमशेर बिष्ट से सीखने को बहुत कुछ मिला। आज जल, जंगल जमीन को बचाने के लिए सख्त नेतृत्व की जरूरत है, जिसे शमशेर बिष्ट ही दे सकते थे।

विषय पर बोलते हुए डाॅ नवीन जुयाल ने व्यक्त किया, उत्तराखंड के संघर्षो के पीछे का विज्ञान क्या है, उसे जानना जरूरी है। विकास के नाम पर बनाई जा रही सड़कों के वे खिलाफ नहीं हैं। लोगों की जरूरत क्या है, यह जानना जरूरी है। उत्तराखंड मे चारधाम हाइवे डेवलपमेंट प्रोजैक्ट हेतु 2015 मे बारह हजार करोड़ रुपयो की 889 किमी की परियोजना मे, रोड चौड़ीकरण का जो प्लान चल रहा है, बडी दुर्घटनाओ का कारण बन रही है। व्यक्त किया गया, सन् 1883 मे चार धामों की यात्रा हेतु मजबूत पैदल मार्ग थे। आवश्यकताओं के बढने पर, आज बिना सोचे-समझे जो सडके बनाई जा रही हैं, ज्यादा अहितकर हो गई हैं। घटित घटनाओ की फोटो व मानचित्रों के द्वारा, प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत कर, व्याख्यान का क्रम जारी रखा गया। अवगत कराया गया, हिमालय की भौगोलिक संरचना, उसके भ्रसं, ग्लेशियर, भूकंप के संवेदनशील क्षेत्रों व हिमालय की आकृति क्या है। व्यक्त किया गया, इस संवेदनशील क्षेत्र की चार घाटियों के इर्द-गिर्द मे 889 किमी लम्बाई वाली रोड़ का चौड़ीकरण किया जा रहा है।

डाॅ नवीन जुयाल ने व्यक्त किया, समग्रता के साथ इस क्षेत्र को देखा जाय। गिरीश कोठारी ने इस संवेदनशील क्षेत्र मे बहुत काम किया है। जहा चौड़ीकरण किया जा रहा है, वह भ्रसं है। घर्षण से टूट-फूट होती है, जिससे भूस्खलन होता है। जहा भी कार्य होगा, नुकसान होगा। साक्क्षय स्वरूप, टनकपुर से चंपावत को जा रही रोड के साथ-साथ अनेको सडके, जहा चौड़ीकरण किया जा रहा है, हुए भारी नुकसान के प्रत्यक्ष प्रमाण, फोटो द्वारा प्रस्तुत किए गए।

अवगत कराया गया, 2013 की केदारनाथ त्रासदी मे अन्य क्षेत्रों मे जो नुकसान हुआ है, ये सब संवेदनशील क्षेत्र हैं। 2017 मे हिन्दुस्तान टाइम्स मे भू-वैज्ञानिक के एस बल्दिया के प्रकाशित लेख का प्रमाण भी, उक्त क्षेत्र की संवेदनशीलता पर दिया गया।

व्यक्त किया गया, फ्लड वाले क्षेत्रों मे भी काफी सडके बनी हैं, जिसमें जनमानस को बहुत कुछ भुगतना पड़ा है। 1970 मे भी फ्लड आया था। फ्लड के मलवे ने नुकसान किया था। चूंने के पहाड़ पर रोड काटी गई। 1970 मे रोड बह गई थी। भूस्खलन भी बडी समस्या है। दरसल रोड़ वही बने, जहा फ्लड का भय न हो। जनमानस ग्रसित न हो। पूरा हिमालय फ्लड से ग्रसित है। सन् 1894, सन् 1970 तथा 17 जून 2013 मे आए फ्लड का मलवा आज भी पड़ा हुआ है। रोड़ चौड़ीकरण का मतलब है, हम अपनी कब्र खोद रहे हैं। हिमस्खलन रोड़ को तोड़कर चले जाते हैं।

मंदाकिनी घाटी के एमसीटी एक और दो भौगोलिक संरचना से बहुत कमजोर हैं। 1982 मे हुए भूस्खलन की घटना को नजरअंदाज करना बहुत बडी भूल साबित होगी। घाटी मे निर्मित छोटी सडके जब नहीं सम्हल रही हैं। हिमस्खलन से चौड़ी सड़के कैसे सम्भलेंगी? पुरानी रोड़ को ही, चौड़ा कर दिया गया है। कई हद से गुजर जाने वाले कार्य किए गए हैं।

2013 के बाद अनगिनत भूस्खलन हुए हैं, जिन्हे संज्ञान में लाना चाहिए था। मंदाकिनी घाटी बहुत खतरे मे है। इसे अनदेखा नहीं कर सकते। भागीरथी घाटी मे जमीन दरक रही है, खिसक रही है। छोटी नदिया भी रौद्र रूप रखती हैं। इनमे मलवा आता है। 1978 के विनाशकारी भूस्खलन से भी, सबक नहीं लिया गया है। जलागमो मे कार्य हेतु एहतियात बरतना पड़ता है।

व्यक्त किया गया, 2012 के राष्ट्रीय राजमार्ग डबल लाइन के नियमो के मुताबिक, कुल बारह मीटर की सड़क मे दस मीटर चौडाई मे कोलतार होगा। यह नियम, संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों के लिए कितना खिलवाड जनक है, समझा जा सकता है। समझना होगा, पहाड़ो मे 5.5 मीटर की बढिया सडके हैं। 2.6 मीटर अतिरिक्त चौडाई, पानी निकासी इत्यादि हेतु, ज्योलॉजिकल विभाग द्वारा निर्णय लेकर किया जा सकता है। बारह मीटर का निर्णय बदलने को वैज्ञानिकों द्वारा कहा गया। कुछ विज्ञानिको ने कहा, यह पहाड़ के साथ बलात्कार है। निर्णय के मौके पर वैज्ञानिक, नीति निर्माताओं के साथ मिलकर, मना कर देते हैं। सहयोग नही करते। यह आम रवैया है। कमेटी की अवहेलना है, सच को सच के रूप मे नहीं देखने की। आपत्तियो के लिए कुछ किलोमीटर का दायरा तय किया गया है, जो तर्क संगत नहीं है। चौड़ीकरण मे, क्षेत्र के गधेरे, नोले मलवे से भर दिए गए हैं।

व्यक्त किया गया, 650 किमी की रोड़ कट चुकी है। जो बची है, उस पर सहायता मिल रही है। दुर्भाग्य, बारह मीटर कटिंग का प्रावधान बार-बार उठाया जा रहा है। नीति-निर्माता इस बात को नजर अंदाज कर रहे हैं, कि विदेशो मे भी उतनी ही चौड़ी सडके बनी हैं, जितनी जरूरत है। हमारे यहां ऐसा क्यो हो रहा है? बेमानी करके काम हो रहा है। बहुत से नक्शे, बिना बजह डाल दिए गए हैं, जो मानक के अनुरुप नहीं हैं। बहुत बड़ा रैकिट चल रहा है।

व्यक्त किया गया, पीपल कोटी वाली सड़क बहुत अच्छी थी, जो चौड़ीकरण के बाद, बर्बाद हो गई है। देखा जा रहा है, सड़क बारह मीटर काटी जा रही है, जंगल ज्यादा काटे जा रहे हैं। जंगल गिर रहे हैं। बाकी जंगल भी इस बहाने काटे जा रहे हैं। उत्तराखंड के कुमांऊ, गढ़वाल तथा जी बी पंत विश्वविद्यालय कहते हैं, हम हिमालय की इकोलाजी के लिए कार्य कर रहे हैं, ये सब चुप रहते है, जब जंगल कटते हैं।

डाॅ नवीन जुयाल ने व्यक्त किया, गलत फैसलो से, आस्था के प्रतीक, हमारे धर्म स्थलों को कुछ हो गया, तो क्या होगा? ये हजारो सालों से खडे हैं। लेकिन अब जो हो रहा है, उससे क्या ये बचैंगे? चारधाम रोड के लिए स्थानीय गांवो के महत्वपूर्ण स्कूलों को तोड़ा गया है। सड़क ले जाने से, डैम की सीलन से, गाँव व पहाड़ टूट रहे हैं। 2006 मे टिहरी डैम बना, लोगों के बारे मे नहीं सोचा गया। आखिर, काम किसके लिए हो रहा है? सरकार कागजो मे सिर्फ शब्द है। पर्यावरण बचाने के नाम पर, सब बकबास हो रही है। पर्यावरण के संरक्षण हेतु, बनाए गए नियमो का पालन, होता ही नहीं।

व्यक्त किया गया, स्थापत्य कला को छेडा न जाय। उसकी हाइट नहीं बढ़ाई जा सकती। शंकराचार्य ने अपने अनुभव से बद्रीनाथ मंदिर बनवाया। केदारनाथ मे शंकराचार्य की समाधि बन रही है। ऐसा क्यों हो रहा है? जहा दहाडने की जरूरत होती है, वहा दहाडे।

डाॅ जुयाल ने अवगत कराया, बहुत कुछ लिख कर दिया गया है। सडक की चौङाई कितनी होनी चाहिए। साठ पेज की फाईल जमा की है। प्रतिरक्षा के लिए सब करना है। वैज्ञानिक अपने ज्ञान को छिपा कर, अज्ञानियों की हां पर हां मिला रहे है, जो दुर्भाग्य है। व्यक्त किया गया, आज ऐसे वैज्ञानिकों की जरूरत है, जिनकी मजबूत बैक बोन हो। शमशेर बिष्ट ने लडाई लडी, ऐसे व्यक्ति की जरूरत है।

चारधाम सड़क परियोजना मामले में, 2018 के सड़क परिवहन मंत्रालय के सर्कुलर को लागू करने का, सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, 8 सितंबर 2020 को आया तो, लोगों की आँखे खुली। पर्यावरणीय सरोकारों से जुडे लोग, जो मध्य हिमालयी पर्यावरण की दशा देख चिंतित थे, उनकी उम्मीद जगी है।

उत्तराखंड के जल, जंगल व जमीन के संघर्ष मे अग्रणी रहे तथा इसरो वैज्ञानिक, भू-विज्ञानी, हिमालय के ज्ञाता, डाॅ नवीन जुयाल द्वारा पर्यावरण संरक्षण हेतु दिए गए, बेबाक व्याख्यान की समाप्ति पर, अन्य उपस्थित पर्यावरण विदो द्वारा व्यक्त किया गया, शमशेर की दूसरी बरसी पर, पर्यावरण से जुडे इस व्याख्यान से बडी श्रधाञ्जलि नहीं हो सकती थी, क्योकि स्वयं स्व.शमशेर बिष्ट भी पर्यावरण प्रैमी व चिंतक थे, कर्मो मे विश्वास रखते थे।

व्याख्यान समाप्ति पर सवाल-जवाब भी किए गए। राजीव लोचन साह के प्रश्न, हाई पावर कमेटी की रिपोर्ट, कही पब्लिक डोमेन मे है? के जवाब मे पर्यावरणविद रवि चोपड़ा द्वारा अवगत कराया गया, यह पब्लिक डाक्युमैंट है, पब्लिक मे है या नहीं, पता नहीं। जल्द ही डोमेन मे डाला जाऐगा।

अजय मित्र द्वारा वेबिनार द्वारा जुडे सभी प्रबुद्ध जनो का आभार व्यक्त करने के साथ ही, कार्यक्रम विसर्जित हुआ।

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