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उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल अंचल में विगत बाइस दिनों से सामूहिक रूप से आयोजित की जा रही ‘बैसी’ संपन्न

22 दिनों से चल रही ‘बैसी’ संपन्न, कुमाऊं-गढ़वाल में आस्था और लोकपरंपरा का हुआ संगम   

 

वरिष्ठ पत्रकार सी एम पपनै

भतरौंजखान (नैनीताल)। उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल अंचल के ग्रामीण क्षेत्रों में विगत बाइस दिनों से श्रद्धा और विश्वास से जुड़ा रहा प्राचीन सामूहिक अनुष्ठान ‘बैसी’ का अवतरित लोक देवताओ के दिए आशीर्वचनों व बड़े हर्षोल्लास और उत्साह के साथ आयोजित भव्य भंडारा प्रसाद वितरण के साथ संपन्न हुआ।

प्रकृति से जुड़े उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध लोकपर्व हरेले से सामूहिक रूप से शुभारम्भ हुई ‘बैसी’ का आयोजन इस वर्ष उत्तराखंड अल्मोड़ा और नैनीताल जिलों के सीमान्त कस्बे भतरौंजखान के इर्द-गिर्द के दर्जनों गांवों भतरौंज, दनपौ, लौकोट, च्योंनी, नौघर, सौनी, अमेल, खैराली, घोड़ी हल सौ, तिमला- कफुल्टी इत्यादि इत्यादि के साथ-साथ विमान्डेश्वर, कत्युरघाटी, ऐड़द्यो धाम के इर्द-गिर्द के ग्रामों में निर्मित धूणीयों में स्थानीय ग्रामीणों द्वारा श्रद्धा और भक्ति भाव से आयोजित की गई।

भतरौंज गांव स्थित धूणी में आयोजित बाइस दिनों की ‘बैसी’ में ढोल व दमाऊ वाद्ययंत्रों में जागर लगाने वाले जगरियों में जीवन पंत तथा मोहन सती की प्रमुख भूमिका तथा बाइस दिनों तक कठिन तप किए चार तपसी डंगरिये में जगदीश पंत, दिनेश पंत, विक्की पंत, विष्णु दत्त पंत के नाम रहे। बाइस दिनों तक व्रत धारण किए तथा धूणी के विधि विधान से जुड़े कार्यों में हाथ बटाने वाले वीर भक्तों में ज्वाला दत्त, बद्री दत्त, महेश पंत, जितेंद्र, सचिन, हरीश पंत, प्रमोद भट्ट, प्रकाश पंत, भुवन पंत, लीलाधर पंत, प्रमोद पंत, निर्मल पंत, शेखर पंत, जगदीश पंत, गणेश पंत, पूर्व ग्राम प्रधान गिरीश भट्ट इत्यादि इत्यादि के नाम प्रमुख रहे।

अनेकों ऋषि मुनियों और तपस्वियों की तप स्थली रही तथा आस्था और विश्वास का संगम माने जाने वाले देवभूमि उत्तराखंड के केदारखंड और मानसखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में प्राचीन पूजा पद्धति, धार्मिक अनुष्ठानों व परंपराओं के पालन की प्रथा पीढ़ी दर पीढ़ी चलायमान रही है। आस्था और विश्वास के इस अनूठे सामूहिक धार्मिक अनुष्ठान का नाम है ‘बैसी’। उक्त सामूहिक रूप से आयोजित किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान के अंतर्गत अंचल के गांव-गांव के एकांत स्थल पर निर्मित धूणी में लोकदेवता पूजे जाते रहे हैं, जिनकी पूजा अर्चना हेतु विधि विधान और परम्पराएं प्राचीन काल से यथावत प्रचलित हैं।

प्रकृति से जुड़े हरेला संक्रान्ति के दिन ग्राम-देवताओं व लोक देवताओं को ग्रामवासी गांव के निकट निर्मित धूणी या मंदिर में हरेला तथा धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ा कर आयोजित की जाने वाली बैसी आयोजन की सामूहिक रूप से तैयारी में जुट जाते हैं।

आध्यात्मिक व वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाने वाली ‘बैसी’ आयोजन में भाग लेने वाले तपसी भगतों को ‘बैसी’ आयोजन प्रारम्भ होने के एक दिन पूर्व से लेकर उक्त आयोजन के समापन तक घर गृहस्थी के कार्यों व सांसारिक सम्बन्धों में निर्लिप्त रहकर धूणी में देव भक्ति करते हुए कई कड़े नियमों का पालन करना होता है। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए त्रिकाल स्नान के समय प्रातःकालीन स्नान में एक विशिष्ट विधान के तहत स्नान ग्रामीण जनों के उठने से पहले करना होता है। स्नान के लिए जाते-आते समय उन्हें किसी व्यक्ति, विशेषकर स्त्री के दर्शन नहीं होने चाहिए। इस सारे समय में उन्हें मौन रहना होता है। धूणी के लिए लाया गया जल किसी अन्य व्यक्ति से छूआ हुआ नहीं होना चाहिए। तपसी डंगरियों को प्रातः व सायं कम से कम एक या आधा घंटा ध्यानस्थ मुद्रा में तल्लीन होकर बैठना आवश्यक होता है। दिन में सिर्फ एक बार सात्विक भोजन करना। तामस भोज्य और पेय पदार्थों के सेवन से परहेज करना। स्त्री से दूरी बनाकर रखना होता है। त्रिकाल संध्या करना, नंगे पैर चलना, धूनी रमाकर रहना, सिर्फ धोती पहनकर ही पूजा स्थल पर रहना। बाइस दिनों तक धूणी में ही कठोर व संयमित जीवन जी कर रहना होता है। उन्हें समय- समय पर प्रज्वलित चौखंडी धूणी की परिक्रमा करते रहना होता है।

यदि धूणी एकान्त स्थान में न होकर गांव की आबादी के मध्य या किनारे पर है तो ध्यान काल से पूर्व आवाज लगाकर ग्रामीणों को शान्त रहने का अनुरोध किया जाता है। धूणी परिसर में यदि अन्य देवी-देवताओं को अर्पित देवस्थल हों तो उनमें भी प्रातः सायं भक्तों को दीप प्रज्जवलित करना होता है। कुछ अन्य श्रद्धालु भी बैसी के दिनों में मुंडन कराते हैं। लोक मान्यतानुसार भक्तों द्वारा नियमों का उल्लंघन किये जाने पर ‘अघोर’ हो जाने से गांव में अनेक प्रकार के असहनीय विघ्नों व आपदाओं का जन्म होने लगता है।

एक वर्ष में दो बार माह पौष (दिसंबर-जनवरी) या माह सावन (जून-जुलाई) में धूणी में आयोजित किए जाने वाले सामूहिक अनुष्ठान ‘बैसी’ में सबसे पहले सामूहिक रूप से अखंड दीप प्रज्वलित कर अंचल के देवताओं भूमिया, भोलनाथ, गंगनाथ, सैम, ग्वेल, ऐरी, हरज्यु, नरसिंह, काल बिष्ट, छुरमल और चौमू, कत्यूर इत्यादि इत्यादि के साथ-साथ कुल देवियों का भी आह्वान व अंचल के गांवों में प्रचलित अनेकों दंत कथाओं व लोकगाथाओं से जुड़ी शक्ति देवी, नाग देवता, महाभारत एवं धार्मिक स्थलों के कुछ चरित्रों तथा हनुमान जी का गायन के माध्यम से अपनी मनोकामना पूर्ति तथा गांव व समाज के लोगों की सुख, शांति और समृद्धि तथा अच्छी फसल की कामना के लिए ‘बैसी’ का आयोजन किया जाता है।

ग्यारह दिन की भक्ति में सुबह शाम जागर लगती है और बाइस जागर पूरी करनी होती है तभी वो बैसी कहलाती है। बैसी जागर में जिस किसी भी भगत पर पहली बार कोई भी देव अवतरित होता है उसे ग्यारहवे दिन परीक्षा देनी होती है जिससे उस अवतरित देव की प्रमाणिकता स्पष्ट हो सके। परीक्षा में धूनी में गर्म लाल की गई लोहे की किसी भी चीज को जीभ से चाट या सात या बाइस प्रज्वलित दीप खाकर प्रमाणिकता सिद्ध करनी होती है। अवतरित देव की प्रमाणिकता सिद्ध होने पर ही उक्त देव को गद्दी सौपी जाती है, उसके बाद उक्त देव की प्रमाणिकता ग्रामीण जन के मध्य बढ़ जाती है।

‘बैसी’ आयोजन के बीसवें दिन भिक्षाटन की परंपरा निभाई जाती है। अंतिम दिन की पूर्वरात्रि को अंचल की बोली-भाषा में जिसे ‘लग्याव’ या ’स्योंरात’ कहा जाता है, उक्त रात्रि जागर में देव अवतरण, देव आशीष इत्यादि सब विगत रात्रियों की भांति सम्पन्न होता है। तदुपरांत तपसी जगरियों की वाद्ययंत्र की थाप तथा जागर बोल के साथ अवतरित देवों व व्रत धारण किए वीरों को देवास्त्रों के साथ लग्याव सामग्री में कुल्हाड़ी, अन्य अस्त्र-शस्त्र, किलौंण, सरसों, माष (उड़द), चीड़ की ज्वलनशील मशालें सौंपी जाती हैं।

अवतरित देवता धूणी में प्रज्वलित चौखंडी की परिक्रमा कर रात्रि के घुप अंधेरे में जटिल पहाड़ी रास्तों, जंगलों, गाड़, गधेरो को नाचते व ‘हांकें’ छोड़ते हुए पार करने के लिए गांव के पूरब, पश्चिम व उत्तर, दक्षिण की चार दिशाओं के सीमान्त क्षेत्र के अंतिम सीमा पर किलौंण (कीले) गाड़ने के लिए दौड़ पड़ते हैं।

उक्त अवतरित देवों की वापसी तक जगरियों द्वारा बजाई जा रही वाद्ययंत्र की धुन निरंतर गूंजती रहती है। व्रत धारण किए वीर भगत धूणी में प्रज्वलित चौखंडी के चारों ओर घूम कर तथा बड़ी संख्या में उपस्थित आस्थावान ग्रामीणों के मध्य देवी रूप में अवतरित देवी निरंतर एक स्थान पर नाचते हुए अपनी दिव्य दृष्टि से चार दिशाओं में गए अवतरित देवों व वीरों को शक्ति प्रदान करती नजर आती है। उक्त अवतरित देवों की धूणी में सकुशल वापसी के बाद ही अवतरित हुई देवी शांत होती नजर आती है।

इस संदर्भ में लोक आस्था है कि ग्राम सीमा पर गाड़े गये स्तम्भों के अंदर गांव में किसी प्रकार की अनिष्टकारी भूत-पिशाच आदि दुष्ट शक्तियों व आधि-व्याधियों का प्रवेश नहीं होने पाता है। चारों दिशाओं में गए लोकदेवताओं और वीरों की धूणी में वापसी के पश्चात पुनः जागर लगाने का क्रम आरम्भ हो जाता है।

अंतिम दिन प्रातः से ही धूणी में नियमित पूजा अर्चना के बाद अवतरित देवी देवताओं का वाद्ययंत्रों की थाप पर नाचना आरम्भ हो जाता है। देवताओ के आदेशानुसार भोग लगने के बाद स्थानीय जन के मध्य प्रसाद वितरण व भंडारे का आयोजन किया जाता है।

उक्त कठोर व संयमित जीवन की राह को कई भक्त बैसी के भंडारे के बाद भी तीन माह या छह माह तक भी निरंतर जारी रखते हैं। परिजनों व मोह माया से दूर रह, गांव-गांव नंगे पैर चल, नियमित स्नान व भिक्षा मांग एक समय का भोजन ग्रहण कर कठिन तप को पूर्ण करते हैं।

आयोजित की जाने वाली बैसी का महत्वपूर्ण पहलू होता है रात्रि जागर, जो प्रथम रात्रि से आरम्भ होकर बाईस वे दिन तक चलायमान रहती है। नातक या सूतक होने की स्थिति में यह ग्यारहवे या अठारहवे दिन पूर्ण कर ली जाती है। बैसी में भक्त रूप में बैठने वाले भक्त स्थानीय विधि विधान के अनुसार वेषभूषा में साधु-सन्यासियों की तरह के वस्त्र धारण या सिर्फ धोती पहनते हैं। सिरोवस्त्र के रूप में पगड़ी भी धारण की जाती है।

जागर गायन में स्थानीय परंपराओं के अनुसार पारंपरिक वाद्य यंत्र हुड़का, ढोल, दमाऊ, थाली इत्यादि इत्यादि का वादन किया जाता है। उक्त वाद्ययंत्रों को बजाने और लोक देवताओ की महिमामई गाथाओं को जागर गायन के रूप में प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति को जगरिया कहा जाता है, जिसे जागर गायन के दौरान देव रूप माना जाता है। जगरिए द्वारा बजाई व गाई जा रही जागर धुन में अवतरित होने वाले देवता को डंगरिया कहा जाता है। अंचल के गांवों में इन्हें पस्वा भी कहा जाता है। धार्मिक शब्दावली में इन्हें ‘तपसी डंगरिया या भगत कहा जाता है। आपसी वार्तालाप में ये व्यक्ति विशेष का नाम न लेकर उसे भगत उपनाम से पुकारते हैं, धूणी में बैठे श्रद्धालुओं की बाधाओं के समाधान की दिशा के बावत अवगत कराते हैं। धूणी की सेवा करने वाले ग्रामीण सेवकों को स्योंक पुकारा जाता है।

बैसी आयोजन के अंतिम दिन जागर में सभी भगतों को नववस्त्र धारण करवाए जाते हैं। स्थानीय परंपराओं के विधि विधान के अनुसार पुराने केश अपर्ण कर दिए जाते हैं। हवन यज्ञ पूर्ण किया जाता है। तत्पश्चात बाइस दिनों तक तप धारण किए भक्त स्थानीय गांव के घर- घरों में स्थापित मंदिरों में नाचते हुए जाकर उक्त घरों और परिवारों के रहवासियों को सुख समृद्धि का आशीर्वाद देकर दान दक्षिणा ग्रहण कर धूणी में वापसी करते हैं। बैसी समापन के अगले दिन परंपरानुसार भक्तों को मान्य नियमों से मुक्त कर दिया जाता है। जिन-जिन गांवों की धूणी में बैसी आयोजन होता है विशाल भंडारा आयोजित कर उक्त तपसी भगतों को वाद्ययंत्रों की गूंज के साथ ससम्मान उनके घर गांव पहुंचाया जाता है।

अवलोकन कर ज्ञात होता है प्राचीन काल से बैसी अनुष्ठान में लगने वाली क्रियाएं शरीर की ऊर्जा प्रणाली के केंद्रों को सक्रिय करती हैं। जागर गायन में गुंजायमान वाद्ययंत्रों हुडका, ढोल, दमाऊ, थाली और रणसिंघा की गूंजती धुन वह माध्यम है जिससे देवताओं या आंतरिक आत्मा का आह्वान किया जाता है। जगरिया महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों के जिन वीर रसों का जागर गायन रूप में बखान करते हैं यह सब सर्वशक्तिमान के गुणों का बखान होता है, जो भक्तों के दिलों दिमांग में शक्ति का संचार करता है।

वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध है बाइस दिनों तक लगातार की गई कोई भी गतिविधि आदत रूप में बदल जाती है। सिद्ध होता है, हमारे पूर्वजों को इसके बावत पता था, बैसी अनुष्ठान मानव जीवन में पॉजिटिव बदलाव लाने में सक्षम है, लोग अपने आत्म को बेहतर ढंग से जान सकते हैं तथा अपने व्यक्तिगत जीवन में वांछित परिवर्तन ला सकते हैं। ज्ञात होता है हमारे देश में कहीं भी इस तरह का अनुष्ठान ढूंढने पर भी अन्यत्र नहीं मिलता है। पौराणिक काल से उक्त अनेकों धार्मिक लोक मान्यताओं के कारण ही उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है।

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