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नाटक, कविता और लेखनी में पहाड़ की बोली-भाषा एवं लोक संस्कृति को आगे बढ़ाने की रही सोच
अमर संदेश, नई दिल्ली। चाणक्यपुरी स्थित उत्तराखंड सदन में उत्तराखंड के वरिष्ठ रंगकर्मी, कवि, लेखक एवं पूर्व अभियंता हेम पन्त के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भावपूर्ण परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा में साहित्य, रंगमंच, संगीत, फिल्म, पत्रकारिता, कला, शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने हेम पन्त के जीवन, उनकी रचनात्मक यात्रा तथा उत्तराखंड की बोली-भाषा और लोक संस्कृति के प्रति उनके योगदान को याद किया।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के मीडिया कोऑर्डिनेटर मदन मोहन सती की पहल पर आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व महापौर एवं निगम पार्षद नीमा भगत ने की, जबकि फिल्म मेकर संजय जोशी मुख्य अतिथि रहे। मंच पर फिल्म निर्माता-निर्देशिका सुशीला रावत सहित साहित्य, रंगमंच और कला क्षेत्र से जुड़े अनेक लोग मौजूद रहे। दिल्ली प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष डॉ. विनोद बछेती, अमर संदेश के वरिष्ठ सलाहकार एवं समाजसेवी डॉ. के.सी. पांडे सहित अनेक गणमान्य लोगों ने परिचर्चा में सहभागिता की।
मुख्य अतिथि संजय जोशी ने कहा कि हेम पन्त केवल लेखक और रंगकर्मी नहीं हैं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना से गहराई से जुड़े रचनाकार हैं। उनके नाटकों में समाज का यथार्थ दिखाई देता है, जबकि उनकी कविताओं में प्रकृति, पहाड़ और मानवीय भावनाओं की गहरी छाप मिलती है। उनकी रचनात्मक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना महत्वपूर्ण है।
अध्यक्षता करते हुए पूर्व महापौर एवं निगम पार्षद नीमा भगत ने कहा कि हेम पन्त का जीवन अपनी जड़ों, संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है। उनके नाटकों और लेखन में पहाड़ की सादगी, संघर्ष और मानवीय भावनाएं दिखाई देती हैं। ऐसे रचनाकारों को याद करना अपनी सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देना है।
दिल्ली प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष डॉ. विनोद बछेती ने कहा कि हेम पन्त ने उत्तराखंड की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को साहित्य तथा रंगमंच के माध्यम से अभिव्यक्ति दी। उनकी कविताओं में भावनात्मक गहराई और लेखनी में सामाजिक सरोकार स्पष्ट दिखाई देते हैं।
शिक्षाविद् डॉ. शरत जोशी ने हेम पंत के सांस्कृतिक कार्यों का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया कि उनके नाटकों में लोक कला और संस्कृति का सुंदर समावेश होता है।
बेटी वंदना पाठक जोशी के संस्मरण ने किया भावुक
परिचर्चा का सबसे भावपूर्ण क्षण उस समय आया, जब हेम पन्त की बेटी वंदना पाठक जोशी ने अपने पिता से जुड़े संस्मरण साझा किए। उन्होंने कहा कि उनके पिता अपनी बोली, भाषा, लोक परंपराओं तथा कला-संस्कृति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने और उसे आगे बढ़ाने को लेकर हमेशा सजग रहते हैं।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड उनके पिता के लिए केवल जन्मभूमि नहीं, बल्कि उनकी रचनात्मक चेतना का आधार है। वे चाहते हैं कि पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान और लोक परंपराएं बदलते समय के बावजूद जीवंत रहें। उनके भावपूर्ण संस्मरण ने उपस्थित लोगों को भावुक कर दिया।
साहित्य, पत्रकारिता और रंगमंच से जुड़े लोगों ने रखे विचार
अमर संदेश के वरिष्ठ सलाहकार एवं मैजिक अकेडमी के अध्यक्ष डॉ. के.सी. पांडे ने कहा कि हेम पन्त के व्यक्तित्व में लेखक, कवि, रंगकर्मी और समाज के प्रति जागरूक व्यक्ति का सुंदर समन्वय था। उनके नाटकों में जीवन के विभिन्न रंग दिखाई देते हैं और उनकी कविताएं मनुष्य तथा प्रकृति के संबंध को अभिव्यक्त करती हैं।
वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवारी ने कहा कि हेम पन्त के साहित्य और रंगमंच को उत्तराखंड की लोक भावनाओं से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने पहाड़ के जीवन और समाज को मंच तथा लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्ति दी।
वरिष्ठ पत्रकार ब्योमेश जुगराण ने कहा कि हेम पन्त की लेखनी में पहाड़ के समाज और वहां के जीवन की सहज तस्वीर दिखाई देती है। उनकी रचनाओं को पढ़ते हुए उत्तराखंड की सामाजिक और सांस्कृतिक तस्वीर को करीब से महसूस किया जा सकता है।
अमर संदेश के संपादक एवं पत्रकार अमर चंद ने कहा कि हेम पन्त की रचनात्मक यात्रा उत्तराखंड के लोक जीवन और सांस्कृतिक चेतना से गहराई से जुड़ी रही। उनकी लेखनी, कविताओं और नाटकों में पहाड़ की बोली-भाषा, जीवन शैली, सामाजिक सरोकार और मानवीय भावनाएं दिखाई देती हैं। ऐसे रचनाकारों के जीवन और कृतित्व को सामने लाना नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
वरिष्ठ संगीतकार वीरेंद्र सिंह राई नेगी ने कहा कि हेम पंत की रचनात्मकता में उत्तराखंड की लोक संस्कृति और लोक जीवन की गहरी छाप दिखाई देती है। उनके साहित्य और रंगमंच में वही आत्मीयता महसूस होती है, जो पहाड़ के लोक संगीत और लोक जीवन की पहचान है।
फिल्म निर्माता-निर्देशिका सुशीला रावत ने कहा कि हेम पंत की रचनात्मक सोच साहित्य तक सीमित नहीं थी। उन्होंने रंगमंच और कला के माध्यम से उत्तराखंड के जीवन और संस्कृति को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। उनके लेखन में पहाड़ की सामाजिक परिस्थितियों, लोक जीवन और मानवीय रिश्तों की गहरी समझ दिखाई देती है।
वरिष्ठ रंगकर्मी खुशाल सिंह रावत ने कहा कि हेम पंत का रंगमंच उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और लोक जीवन से गहराई से जुड़ा रहा। उनके नाटकों में पहाड़ के आम आदमी का जीवन, संघर्ष, हास्य और भावनाएं एक साथ दिखाई देती थीं।
प्रज्ञा आर्ट की अध्यक्ष लक्ष्मी रावत ने कहा कि हेम पंत की रचनाओं में कला और जीवन का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। हिमालय सांस्कृतिक कला मंच के अध्यक्ष नीरज बवाड़ी ने कहा कि उनके रंगमंच में उत्तराखंड के लोक जीवन और सांस्कृतिक पहचान की स्पष्ट झलक मिलती है।
थियेटर कलाकार दीपिका पांडे और ममता कर्नाटक ने श्री पन्त के कुशल निर्देशन में किए गए नाटकों का विस्तार से वर्णन किया और इनसे रंगमंच की कलाओं को सीखने का आगाज भी करवाया। उद्योग जगत के नरेंद्र सिंह लडवाल ने उनको को अपना आदर्श मानते हुए उन्हें उत्तराखंड का अनमोल कला प्रहरी बताया।
हेम पन्त की पोती नित्या जोशी ने अपने नाना के उत्तराखंड संस्कृति पर किए कार्यों को आधार बना उत्तराखंड की सांस्कृतिक संपदा को जीवंत रखने का प्रण लिया।
आयोजन को सफल बनाने में कई लोगों की रही महत्वपूर्ण भूमिका
उत्तरायणी संस्था के तत्वावधान में आयोजित यह परिचर्चा कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम को सफल बनाने में कई लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विशेष रूप से श्रीमती तारा बवाड़ी, नित्या जोशी और उनके परिवार के सदस्यों का उल्लेखनीय सहयोग देखने को मिला। आयोजन की तैयारियों से लेकर कार्यक्रम के संचालन और अतिथियों के समन्वय तक परिवार के सदस्यों ने सक्रिय सहभागिता निभाई। उनके सहयोग और समर्पण ने कार्यक्रम को गरिमापूर्ण एवं सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
परिचर्चा में द सोल ऑफ हिमालया के अध्यक्ष मोहिंदर रावत, कारोबारी नरेंद्र सिंह लडवाल, पत्रकार महिपाल सिंह, राजू बोहरा, राजेश डंडरियाल, बी.एस. नेगी, कुसुम चौहान, सुरेंद्र हालसी, संस्थापक अध्यक्ष धुरी फाउंडेशन, केशव दत्त जोशी, मंजू बहुगुणा, ममता कर्नाटक, दीपिका पांडे, महेंद्र लटवाल, डॉ. शरद जोशी, रमेश कांडपाल और खुशहाल रावत सहित साहित्य, कला, पत्रकारिता और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े अनेक लोग उपस्थित रहे।
कविता के माध्यम से हेम पंत ने जताया सभी का आभार
कार्यक्रम के समापन पर वरिष्ठ रंगकर्मी, कवि एवं लेखक हेम पन्त ने उपस्थित सभी अतिथियों, आयोजकों और शुभचिंतकों के प्रति आभार एवं धन्यवाद व्यक्त किया। उन्होंने अपने भावों को कविता के माध्यम से व्यक्त करते हुए सभी के प्रति कृतज्ञता प्रकट की।
हेम पंत की भावपूर्ण कविता और उनकी आवाज में झलकती आत्मीयता ने पूरे वातावरण को भावुक कर दिया। उनकी कविता में अपनी मिट्टी, अपने लोगों, बोली-भाषा और सांस्कृतिक विरासत के प्रति गहरा जुड़ाव महसूस हुआ। कविता समाप्त होने के बाद सभागार में मौजूद लोगों ने आत्मीयता के साथ उनका उत्साहवर्धन किया। यह क्षण परिचर्चा के सबसे भावुक और यादगार पलों में शामिल रहा।
कार्यक्रम का संचालन नीरज बवाड़ी ने किया, जबकि कार्यक्रम के महत्वपूर्ण एवं भावपूर्ण क्षणों को जीवन चंद ने अपने कैमरे में कैद किया।
परिचर्चा में वक्ताओं ने कहा कि हेम पन्त की रचनात्मक विरासत केवल उनके साहित्य और नाटकों तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी बोली, भाषा, लोक कला और सांस्कृतिक जड़ों को जीवित रखने की उनकी सोच में भी दिखाई देती है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर हुई यह परिचर्चा उनकी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की सार्थक पहल बनी।
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