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इंडिया हैबिटेट सेन्टर में मीडिया राउंडटेबल में जिम्मेदार पत्रकारिता विषय पर हुए मंथन में देशभर से जुटे मीडियाकर्मी और विशेषज्ञ
नई दिल्ली। बच्चों और किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं, सामाजिक भेदभाव और आत्महत्या की बढ़ती चुनौती के बीच मीडिया की भूमिका को अधिक जिम्मेदार, संवेदनशील और सकारात्मक बनाने के उद्देश्य से इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में यूनिसेफ ने विशेष मीडिया राउंडटेबल का आयोजन किया गया। इसका मुख्य विषय रिपोर्टिंग के दौरान शब्दों के अपने मायने होते है,रखा गया।
इस मीडिया राउंडटेबल का उद्देश्य पत्रकारों, मीडिया संस्थानों, डिजिटल मीडिया प्रतिनिधियों, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और इस क्षेत्र में अपने अनुभव साझा करने वाले लोगों को एक साझा मंच पर लाकर मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समाज में व्याप्त भ्रांतियों और भेदभाव को दूर करने में मीडिया की भूमिका पर गंभीर चर्चा करना रहा।
राउंडटेबल में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि मीडिया केवल घटनाओं की जानकारी देने का माध्यम नहीं है, बल्कि वह समाज की सोच, दृष्टिकोण और व्यवहार को प्रभावित करने की महत्वपूर्ण शक्ति भी है। समाचारों की भाषा, शीर्षक, तस्वीरें और रिपोर्टिंग का तरीका आम लोगों की मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समझ को प्रभावित करता है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी खबरों में सनसनीखेज प्रस्तुति, अपमानजनक शब्दों और बिना चिकित्सकीय पुष्टि के किसी व्यक्ति को मानसिक बीमारी से ग्रसित बताने से बचना आवश्यक है।
चर्चा में आत्महत्या से संबंधित खबरों की रिपोर्टिंग को विशेष रूप से संवेदनशील विषय बताया गया। विशेषज्ञ दिशा-निर्देशों के अनुसार आत्महत्या के तरीकों, स्थानों और अन्य संवेदनशील विवरणों का बार-बार उल्लेख करने, सनसनीखेज सुर्खियां बनाने तथा किसी एक घटना को आत्महत्या का एकमात्र कारण बताने से बचना चाहिए। ऐसी खबरों में सहायता, उपचार, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और जीवन में संघर्ष से उबरने की प्रेरक कहानियों को प्रमुखता देने से सकारात्मक सामाजिक प्रभाव पड़ सकता है।
राउंडटेबल में बच्चों और किशोरों से संबंधित खबरों में उनकी पहचान, गोपनीयता और गरिमा की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर बल दिया गया। किसी भी ऐसी रिपोर्टिंग से बचना चाहिए जिससे संबंधित बच्चे या उसके परिवार को दोबारा मानसिक पीड़ा, अपमान, सामाजिक बहिष्कार अथवा किसी प्रकार के प्रतिशोध का सामना करना पड़े। स्कूल, परिवार और आसपास के समुदाय की पहचान उजागर करने में भी विशेष सावधानी बरतने की जरूरत बताई गई।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यूनीसेफ की कम्युनिकेशन ऑफिसर (मीडिया) सोनिया सरकार ने देश की राष्ट्रीय नीति और पत्रकारिता के दिशा-निर्देशों और भारत सरकार की राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति (National Suicide Prevention Strategy), 2022 का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक आत्महत्या से होने वाली मौतों में 10 प्रतिशत की कमी लाना है। वहीं, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पत्रकारिता आचरण संबंधी मानदंड (2022) में भी आत्महत्या से जुड़ी खबरों में सनसनीखेज प्रस्तुति, आत्महत्या के तरीकों एवं स्थानों का विवरण और अनावश्यक तस्वीरों के प्रकाशन से बचने की सलाह दी गई है। इसके साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के MOSAIC टूलकिट के सिद्धांतों के तहत मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर काम करने वाले लोगों के अनुभवों को सम्मान देने, संवेदनशील भाषा के इस्तेमाल और समाज में पुनर्वास एवं सकारात्मक बदलाव की कहानियों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता रेखांकित की गई।
राउंड टेबल चर्चा में यह भी सामने आया कि डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया, ऑनलाइन पोर्टल और शॉर्ट वीडियो के दौर में खबरों के शीर्षक, थंबनेल और छोटे वीडियो कई बार मूल संदर्भ से अलग होकर प्रसारित होते हैं। इससे गलत धारणाएं और सामाजिक कुरीतियां बढ़ सकते हैं। ऐसे में मीडिया संस्थानों के संपादकों और पत्रकारों को तथ्यपरक रिपोर्टिंग, विशेषज्ञों से परामर्श, पत्रकारों के प्रशिक्षण और सकारात्मक कहानियों को प्राथमिकता देने की दिशा में ठोस पहल करनी होगी।
राउंडटेबल में इस बात पर सहमति व्यक्त की गई कि मानसिक स्वास्थ्य को सामाजिक कुरीतियों के बजाय एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानवीय संवेदना के विषय के रूप में देखा जाना चाहिए। जिम्मेदार पत्रकारिता न केवल समाज में जागरूकता बढ़ा सकती है, बल्कि जरूरतमंद बच्चों, किशोरों और परिवारों को समय पर सहायता एवं उपचार प्राप्त करने के लिए भी प्रेरित कर सकती है।
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