प्रकृति और परमात्मा

लेखक- मनवर सिह रावत जी (सामाजिक कार्यकर्ता)

प्रकृति में परमात्मा दिखाई देता है, यह एक तथ्य है,परन्तु यह भी एक तथ्य है,कि प्रकृति का दर्शन ईश्वर में होता है,मनुष्य ग्यान सर्वोच्च ग्यान है, केवल मनुष्य ग्यान द्वारा हम ईश्वर को जान सकते हैं,यह भी एक तथ्य है,ईश्वर – ग्यान सर्वोच्च ग्यान है, केवल ईश्वर ग्यान से ही हम मनुश्या को जान सकते हैं, यद्यपि देखने मे ये दोनों आपस में विरोधी लगती हैं, परंतु ये मनुष्य की प्रकृति की आवश्यकता है,

समस्त विश्व ग्यान तत्व में एकत्व तथा एकत्व मे ज्ञानत्व का खेल है, समस्त विस्व भेद अभेद की भूमि है,समस्त असीम मे समीम की लीला है, दूसरे को ग्रहण किये बिना हम पहले अंगीकार नहीं कर सकते, लेकिन हम दोनों को न तो एक ही प्रत्यक्ष बोध के रूप में ग्रहण कर सकते हैं,ना एकही अनुभूति के तथ्यके रूपमें फिर भी इसी प्रकार यह क्रम चलता रहता है,
एक तत्व का अस्तित्व पहले से ही है, यह नहीं कि एकतत्व को बनाना है, वर्ना यह कि इसका अस्तित्व पहले से ही है, और उसके बिना तुम्हें नानतत्व का किनचित प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, जब कभी किसी ने ससीम का प्रत्यक्ष किया है? तब उसने असीम का भी प्रत्यक्ष किया है, कुछ ने ससीम पर बल दिया है, और पोसित किया कि उन्होंनेबाह्य ससीम का प्रत्यक्ष किया, अन्य ने असीम असीम पर बल दिया और पोषित किया, पर हम जानते हैं कि यह तार्किक आवश्यकता है, यह भी जानते हैं कि एक के बिना दूसरे का प्रत्यक्ष नहीं कर सकते अतः यह एकत्व परिपूर्ण जैसा कि इसे हम कह सकते हैं, बनने को नहीं है, इसका पहले से ही अस्तित्व है,, और इसे समझा है, चाहे उसे हम जानते हैं, या नहीं उसे हम स्पस्ट भाषा मे व्यक्त कर सकते है या नहीं, चाहे इस प्रत्यक्ष मे इंद्रिय – प्रत्यक्ष की स्पष्टता शक्ति हो या न हो पर वह है,अवश्य. अपने मनकी तार्किक आवश्यकता के करन हम यह स्वीकर करने के कारण बाध्य हैं कि वह यहीं विद्यमान है, अन्यथा ससीम का प्रत्यक्ष न हो पाता मैं प्रथा और गुणों के प्राचीन सिधांत की चर्चा नहीं कर रहा हूँ, वर्ना एकत्व की चर्चा कर रहा हूँ, यह सब दृष्टय प्रपंच समुह के बीच चेतना का यह तथ्य तो हृदयंगम होता ही है कि मैं और तुम एक दूसरे से भिन्न है और साथ यह चेतना कि मैं और तुम एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं,।

Share This Post:-
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *