संस्कृति की सशक्त प्रहरी बनीं सुरेशी दानू, दिल्ली में रहकर उत्तराखंड की विरासत को दे रहीं नई पहचान
अमर चंद | नई दिल्ली
लोकसंस्कृति के संरक्षण का लिया संकल्प
देवभूमि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, परंपराओं और विरासत को सहेजने का जुनून हो तो भौगोलिक दूरियां भी आड़े नहीं आतीं। इसका जीवंत उदाहरण हैं चमोली गढ़वाल के देवाल ब्लॉक स्थित वीरभूमि सवाड़ गांव की निवासी सुरेशी दानू, जो पिछले कई वर्षों से दिल्ली के विकासपुरी में रहकर उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।
अमर संदेश से बातचीत में सुरेशी दानू ने कहा कि उत्तराखंड की संस्कृति हमारी पहचान और पूर्वजों की अमूल्य धरोहर है। इसे केवल आयोजनों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि अपनी रोजमर्रा की जिंदगी और आने वाली पीढ़ियों के संस्कारों का हिस्सा बनाना जरूरी है। इसी उद्देश्य से वह कविताओं, लोकगीतों, मांगलगीतों, पारंपरिक वेशभूषा, आभूषणों और उत्तराखंड के पारंपरिक खानपान के माध्यम से लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं।
पर्वतीय सांस्कृतिक मंडल के माध्यम से महिलाओं को कर रहीं जागरूक
सुरेशी दानू विकासपुरी स्थित पर्वतीय सांस्कृतिक मंडल से जुड़ी हुई हैं। वर्ष 1988-89 में स्थापित इस संस्था में सांस्कृतिक सचिव के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके प्रयासों से महिलाओं में अपनी पारंपरिक वेशभूषा, आभूषणों, खानपान और बोली-भाषा के प्रति जागरूकता बढ़ाने का काम हुआ है।
उन्होंने अमर संदेश को बताया कि आज की नई पीढ़ी को अपनी मातृभूमि के इतिहास, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना बेहद जरूरी है। इसी सोच के साथ वह सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को एक मंच पर लाने और गीत-संगीत के जरिए युवाओं को अपनी संस्कृति से जोड़ने का प्रयास करती हैं। कई महिलाएं उन्हें अपनी प्रेरणास्रोत भी मानती हैं।
रामलीला के मंच से नई पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ने की पहल
सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ-साथ सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक क्षेत्रों में भी उनका सक्रिय योगदान रहा है। रामलीला मंचन में उनकी विशेष भूमिका रहती है। इस संबंध में उन्होंने कहा कि रामलीला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के आदर्शों, संस्कारों और जीवन मूल्यों को समाज तक पहुंचाने का सशक्त मंच है। उनका प्रयास रहता है कि अधिक से अधिक युवा और बच्चे रामलीला से जुड़ें, ताकि आने वाली पीढ़ी अपने सांस्कृतिक मूल्यों को समझ सके।
थिएटर और ऐतिहासिक प्रस्तुतियों में भी बनाई पहचान
थिएटर और अभिनय के क्षेत्र में भी सुरेशी दानू ने अपनी अलग पहचान बनाई है। तीलू रौतेली, सुमित्रानंदन पंत सहित उत्तराखंड की महान विभूतियों और ऐतिहासिक प्रसंगों पर आधारित विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उन्होंने भागीदारी की है। कई प्रतियोगिताओं में प्रथम स्थान प्राप्त करने के साथ उन्हें विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है।
लाल किला और इंडिया गेट पर किया उत्तराखंड की संस्कृति का प्रतिनिधित्व
अमर संदेश से बातचीत में उन्होंने बताया कि 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर लाल किला और इंडिया गेट जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर उत्तराखंड सरकार के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रमों में भी उन्हें अपनी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला है। मांगलगीतों के माध्यम से वह उत्तराखंड की पारंपरिक लोकविधाओं को पुनर्जीवित करने और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने में जुटी हैं।
फिल्मों और नाटकों के माध्यम से बोली-भाषा को दे रहीं बढ़ावा
खुशमिजाज, मिलनसार और मृदुभाषी व्यक्तित्व की धनी सुरेशी दानू फिल्मों और नाटकों के माध्यम से भी उत्तराखंड की बोली-भाषा और लोकजीवन को पहचान दिलाने का प्रयास कर रही हैं। अभिनय के दौरान विभिन्न किरदारों को पूरी जीवंतता के साथ निभाना उनकी विशेषता है।
निस्संदेह, सुरेशी दानू उन महिलाओं में शामिल हैं, जो अपनी संस्कृति को केवल यादों में नहीं, बल्कि अपने व्यवहार, पहनावे, कला और सामाजिक सहभागिता में जीवंत रखे हुए हैं। दिल्ली में रहते हुए भी अपनी मिट्टी से उनका अटूट जुड़ाव इस बात का प्रमाण है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने के लिए किसी भौगोलिक सीमा की जरूरत नहीं होती। उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित कर अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का उनका यह प्रयास समाज के लिए प्रेरणादायक है।

