प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रा नंदन पंत की 122वी जयंती तथा उत्तराखंड साहित्य रत्न सम्मान समारोह 2022 सम्पन्न

सी एम पपनैं

नई दिल्ली। प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रा नंदन पंत की 122वी जयंती के सु-अवसर पर, उत्तराखंड फिल्म एंव नाट्य संस्थान द्वारा, 22 मई को गढ़वाल भवन, नई दिल्ली मे, मुख्य अतिथि, कुमांऊनी, गढ़वाली, जौनसारी व हिंदी अकादमी दिल्ली सरकार सचिव, जीतराम भट्ट, विशिष्ट अतिथि अजय सिंह बिष्ट, अध्यक्ष गढ़वाल हितैषिणी महासभा, डाॅ विनोद बछेती (डीपीएमआई) तथा उत्तराखंड के साहित्यकारों, पत्रकारों, रंगकर्मियों व समाजसेवियो की उपस्थिति मे, सुमित्रा नंदन पंत के चित्र पर गुलाब की पंखुडिया अर्पित कर तथा उत्तराखंड के साहित्यकारों को, उत्कृष्ट साहित्य लेखन कार्यो हेतु, ‘साहित्य रत्न’ सम्मान से सम्मानित किया गया।

झुमैलो सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतरगत, संगीत निर्देशक कृपाल सिंह रावत तथा मधुबेरिया साह के निर्देशन मे, उत्तराखंड के लोकनृत्य व गीतों का मनोहारी मंचन किया गया। आयोजन के अंतिम सत्र मे, आयोजित, उत्तराखंड बोली-भाषा के कवियों द्वारा, प्रभावशाली व मनमोहक काव्यपाठ किया गया।

मुख्य, विशिष्ट, सम्मानित होने जा रहे साहित्यकारों व संस्थान पदाधिकारियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन तथा नाट्य संस्थान की सु-प्रसिद्ध गायिका मधुबेरिया साह द्वारा प्रस्तुत वंदना की प्रस्तुति के साथ, आयोजन का श्रीगणेश किया गया।

उत्तराखंड फिल्म एंव नाट्य संस्थान अध्यक्षा संयोगिता पंत ध्यानी व सचिव सुमित्रा किशोर द्वारा, सभागार में उपस्थित सभी प्रबुद्ध जनो का स्वागत, अभिनंदन किया गया। संस्थान की विगत दो वर्षो से बंद पडी गतिविधियों तथा आगामी योजनाओ व कार्यक्रमो के बावत अवगत कराया गया।

आयोजन मे सम्मानित किए जा रहे, तीनों साहित्यकारों के कृतित्व व व्यक्तित्व के बावत तथा विगत 2016 से प्रदान किए जा रहे ‘साहित्य रत्न’ सम्मान के बावत जानकारी दी गई। आयोजित आयोजन के मुख्य व विशिष्ट अतिथियों को पुष्पगुच्छ भैट कर, सम्मानित किया गया।

फिल्म एवं नाट्य संस्थान गायक कलाकारो, नरेंद्र बंगारी, महेंद्र रावत, राहुल जुयाल, चंद्रकांता शर्मा, कुसुम बिष्ट तथा उषा भट्ट पांडे द्वारा, मोती शाह (औरगैंन), सतेन्द्र (ढोलक), पवन रावत (तबला), खेम (आक्टोपैड) तथा कृपाल सिंह रावत (हारमोनियम), वाद्ययंत्रों की संगत में उत्तराखंड के लोकगीतो का प्रभावशाली मंचन किया गया। कोमल राना नेगी ग्रुप द्वारा उत्तराखंड के लोकगीतों व नृत्यों का दमखम भरा मंचन कर, श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।

उत्तराखंड फिल्म एवं नाट्य संस्थान जूरी द्वारा, विगत तीन वर्षो का ‘साहित्य रत्न’ सम्मान, साहित्यकार पूरन चंद्र कांडपाल, रमेश चन्द्र घिन्डियाल व मदन मोहन ढुकलान को, मुख्य व विशिष्ट अतिथियों के कर कमलो, शाल ओढा, पुष्पगुच्छ, स्मृति चिन्ह व पांच हजार एक रुपया, सम्मान स्वरूप, प्रदान कर सम्मानित किया गया।

सुमित्रा नंदन पंत की 122वी जयंती के सु-अवसर पर गढ़वाल महासभा अध्यक्ष अजय सिंह बिष्ट, संस्थान संरक्षक कुलदीप भंडारी, मुख्य अतिथि जीतराम भट्ट, सम्मानित साहित्यकार पूरन चंद्र कांडपाल, रमेश चन्द्र घिन्डियाल, मदन मोहन ढुकलान तथा डाॅ विनोद बछेती द्वारा, सुमित्रा नंदन पंत के जीवन पर प्रकाश डाल, व्यक्त किया गया, हिंदी साहित्य में छायावादी युग के प्रमुख स्तंभ सुमित्री नंदन पंत, आकर्षणशील व्यक्तित्व के धनी थे। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक विंब के रूप में प्रयोग, उनके काव्य की विशेषता रही। पंत के बिना हिंदी साहित्य की कल्पना भी नही की जा सकती है। हिंदी साहित्य के इतिहास में, उनका अमूल्य योगदान रहा है। काव्य रचना के माध्यम से उन्होंने समाज सुधार का प्रभावशाली कार्य किया था।

वक्ताओ द्वारा व्यक्त किया गया, सात वर्ष की उम्र से ही उन्होंने लिखना आरंभ कर दिया था। उनका काव्य लेखन का आरंभ प्रकृति चित्रण से हुआ था। उनके छोटे गीत, विराट व्यापक सौंदर्य तथा पवित्रता से साक्षात्कार कराते थे। अल्प समय में ही हिंदी की नवीन धारा के प्रवर्तक कवि के रूप में वे, पहचाने जाने लगे थे। सुमित्रा नंदन पंत सौंदर्य के उपासक थे। सौंदर्य अनुभूति के उनके तीन मुख्य केन्द्र रहे। प्रकृति नारी और कलात्मक सोंन्दर्य। उन्हे संस्कृत, अंग्रेजी, बांग्ला व हिंदी का ज्ञान था। 1942 मे, पंत जी का, महर्षि अरविंद घोष से सम्पर्क होने के बाद से, उनकी विचारधारा प्रभावित हो गई थी।

वक्ताओ द्वारा व्यक्त किया गया, पंत का सम्पूर्ण साहित्य सत्यम, शिवम, सुंदरम के आदर्शो से प्रभावित होते हुए भी, समय के साथ निरंतर बदलता रहा था। साहित्य यात्रा के उनके तीन प्रमुख पडाव रहे थे। प्रथम चरण का काव्य, प्रकृति के सुंदर रमणीय चित्र मिलते हैं। दूसरे चरण में छायावाद की सोच मे कोमल कल्पनाओ की तथा तीसरे व अंतिम चरण के काव्य में, प्रगतिवाद और विचारशील, जो अरविंद दर्शन व मानव कल्याण की भावनाओ से प्रेरित रही हैं, दृष्टिगत होता है।

वक्ताओ द्वारा व्यक्त किया गया, सुमित्रा नंदन पंत को साहित्य अकादमी पुरस्कार 1960 मे, ‘कला और बूढ़ा चांद’ काव्य पर।
पद्मभूषण 1961, ज्ञानपीठ 1968 मे, ‘चिदंबरा’ पर तथा सोवियत भूमि पुरस्कार 1977 मे, ‘लोकायतन’ पर प्रदान किया गया था।

व्यक्त किया गया, सुमित्रा नंदन पंत की 28 पुस्तके प्रकाशित हुई थी, जिनमे कविताऐ, पद्य-नाटक और निबंध शामिल हैं। कलात्मक कविताऐ, ‘पल्लव’ में संगृहित हैं। प्रगतिशील मासिक पत्रिका ‘रूपाभ’ के वे संपादक रहे थे और आकाशवाणी के परामर्शदाता। पंत परंपरावादी, प्रगतिवादी तथा प्रयोगवादी आलोचको के सम्मुख कभी झुके नहीं। पूर्व मान्यताओ को कभी नकारा नहीं। जीवन पर्यतं रचनारत रहे। अविवाहित पंत जी के अंतस्थल में नारी और प्रकृति के प्रति आजीवन सौंदर्यपरक भावना रही थी। वे काव्य में प्रकृति के कोमल भाव तथा मानवीय भागो का अत्यंत सूक्षम वर्णन करने मे, अद्वितीय रहे।उनका सम्पूर्ण काव्य साहित्य चेतना का प्रतीक रहा है। जिसमे धर्म दर्शन, नैतिकता, समाजिकता, भौतिकता, आधात्मिकता सभी का समावेश रहा है।

व्यक्त किया गया, उनकी शैली अत्यंत सरस एवं मधुर रही। बांग्ला तथा अंग्रेजी भाषा से प्रभावित होने के कारण पंत जी ने गीतात्मकता शैली अपनाई थी। सरलता, मधुरता, चित्रात्मकता, कोमलता और संगीतात्मकता पंत जी की शैली की प्रमुख विशेषताऐ हैं। व्यक्त किया गया, उन्होंने काव्य ही नहीं, नाटक, ‘रजत रश्मि’, ‘शिल्पी’, ‘ज्योत्सना’ तथा उपन्यास ‘हार’ की भी रचना की थी।

वक्ताओ द्वारा व्यक्त किया गया, प्रकृति से असीम लगाव रखने वाले तथा 1916 से जीवन के अंतिम समय, 28 दिसंबर 1977 तक, पंत जी की जन्मस्थली कौसानी गांव, जहा उनका बचपन बीता था, उनका घर ‘सुमित्रा नंदन पंत साहित्यिक वीथिका’ नामक संगृहालय बना हुआ है। पंत के कई महत्वपूर्ण दस्तावेज इस निर्मित संगृहालय मे सुशोभित किए गए हैं। प्रयागराज मे, एक पार्क का नाम ‘सुमित्रा नंदन पंत बाल उद्दयान रखा गया है। वक्ताओ द्वारा व्यक्त किया गया, सुमित्रा नंदन पंत से आज के साहित्यकारो व नई पीढी को प्रेरणा लेनी चाहिए। पंत का साहित्य लेखन अमर रहेगा।

आयोजन के अंतिम सत्र में उत्तराखंड बोली-भाषा के प्रख्यात कवियों व कवियित्रियों में, मीना खन्तवाल, रमेश घिन्डियाल, सुमित्रा किशोर, बृज मोहन शर्मा ‘वेदवाल’, पूरन चंद्र कांडपाल, दर्शन सिंह रावत, मदन ढुकलान, धीरज कोठियाल तथा भगवती प्रसाद जुयाल द्वारा विभिन्न विषयों पर, रोचक, ज्ञानवर्धक, प्रभाव शाली व मन-लुभावन काव्य पाठ कर, श्रोताओं को मनमुग्ध किया। कवि सम्मेलन की समाप्ति पर, आयोजन समाप्ति की घोषणा की गई।

आयोजन के प्रथम सत्र का संचालन बृज मोहन शर्मा ‘वेदवाल’ तथा दूसरे सत्र, कवि सम्मेलन का संचालन, दर्शन सिंह रावत द्वारा, बखूबी व प्रभावशाली अंदाज में किया गया।
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