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लोकतंत्र का आधुनिक मंदिर है संसद, ज्ञान, अनुशासन और तकनीक से सशक्त बनें सांसद” — उपसभापति हरिवंश  नारायण सिंह 

राज्यसभा के नवनिर्वाचित सदस्यों के लिए आयोजित ‘प्रारंभ’ विषय-बोध कार्यशाला का समापन, संसदीय परंपराओं, प्रश्नकाल, बजट, समितियों और डिजिटल सुरक्षा पर दिया मार्गदर्शन

Amar sandesh नई दिल्ली। राज्यसभा के उपसभापति श्री हरिवंश नारायण सिंह ने रविवार को नवनिर्वाचित एवं नाम-निर्देशित राज्यसभा सदस्यों के लिए आयोजित दो दिवसीय विषय-बोध कार्यशाला ‘प्रारंभ’ के समापन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं, बल्कि लोकतंत्र का आधुनिक मंदिर है। उन्होंने कहा कि एक प्रभावी सांसद बनने के लिए संसदीय नियमों, प्रक्रियाओं, परंपराओं और आधुनिक तकनीक की गहरी समझ आवश्यक है।

श्री हरिवंश ने कहा कि दो दिवसीय विषय-बोध कार्यक्रम को इस प्रकार तैयार किया गया था ताकि नए सदस्य राज्यसभा की कार्यप्रणाली, नियमों, प्रक्रियाओं और सचिवालय के कामकाज को भली-भांति समझ सकें। उन्होंने विश्वास जताया कि यह प्रशिक्षण सदस्यों को संसदीय दायित्वों का प्रभावी निर्वहन करने में महत्वपूर्ण सहयोग देगा।

उन्होंने बताया कि कार्यक्रम के विभिन्न सत्रों में वरिष्ठ सांसदों और राज्यसभा सचिवालय के अनुभवी अधिकारियों ने संसदीय कार्यप्रणाली को तथ्यात्मक प्रस्तुतियों और व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से समझाया। साथ ही राज्यसभा सचिवालय द्वारा सदस्यों को उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं और सहयोग की विस्तृत जानकारी भी दी गई।

संसद की सुरक्षा का उल्लेख करते हुए हरिवंश ने कहा कि संसद एक प्रतिनिधि संस्था होने के साथ-साथ हाई-सिक्योरिटी ज़ोन भी है, इसलिए प्रत्येक सदस्य की जिम्मेदारी है कि वह सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने में पूरा सहयोग करे। उन्होंने संसद भवन को भारत की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का भव्य प्रतीक बताया‌।

उन्होंने कहा कि अरुण सिंह ने सदस्यों को बजट की बारीकियों और उसकी संसदीय समीक्षा के महत्व से अवगत कराया, जबकि डॉ. सस्मित पात्रा ने प्रश्नकाल की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि तारांकित और अतारांकित प्रश्न सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। प्रश्नकाल में व्यवधान लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करता है।

 श्री हरिवंश ने बताया कि सचिवालय के अधिकारियों ने विधायी प्रक्रिया की चरणबद्ध जानकारी दी, जबकि डॉ. जॉन ब्रिटास ने संसदीय नियमों और प्रक्रियाओं के प्रभावी उपयोग के व्यावहारिक पक्षों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि आज के समय में संसदीय कूटनीति भी सांसदों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है और जनप्रतिनिधियों को अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों तथा भू-राजनीतिक विषयों की जानकारी रखना आवश्यक है। भारत की आईपीयू, सीपीए, पी-20, सीएसपीओसी, ब्रिक्स सहित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संसदीय मंचों में सक्रिय भागीदारी का भी उन्होंने उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि घनश्याम तिवाड़ी ने संसदीय कूटनीति की अवधारणा पर प्रकाश डाला, जबकि भूपेंद्र यादव और डॉ. मेधा विश्राम कुलकर्णी ने विभाग-संबंधी संसदीय समितियों की भूमिका को विस्तार से समझाया। उन्होंने इन समितियों को “लघु संसद” बताते हुए कहा कि ये विभागों के कामकाज, बजट, वार्षिक रिपोर्ट और विधेयकों की गहन समीक्षा का महत्वपूर्ण मंच हैं तथा इनकी रिपोर्टें सांसदों के लिए विश्वसनीय संदर्भ होती हैं।

डिजिटल युग में संसद की बदलती कार्यप्रणाली पर चर्चा करते हुए हरिवंश ने कहा कि व्यापक डिजिटलीकरण से संसद का कामकाज काफी हद तक पेपरलेस हो गया है। सभी सदस्यों को डिजिटल उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं, जिन्हें साइबर हमलों और अनधिकृत पहुंच से सुरक्षित रखना प्रत्येक सदस्य की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि लॉगिन क्रेडेंशियल संसद की संपत्ति हैं और उनकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

समापन संबोधन में हरिवंश नारायण सिंह ने कहा कि सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती। उन्होंने सदस्यों से संसदीय इतिहास, महत्वपूर्ण बहसों और पूर्व सांसदों अटल बिहारी वाजपेयी, अरुण जेटली तथा चंद्रशेखर के संसदीय भाषणों का अध्ययन करने और दुनिया की संसदीय परंपराओं से सीख लेने का आह्वान किया।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि नवनिर्वाचित सदस्य अपने ज्ञान, अनुशासन और जनसेवा की भावना से राज्यसभा की गरिमा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएंगे और प्रभावी जनप्रतिनिधि के रूप में लोकतंत्र को और अधिक मजबूत बनाएंगे।

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